मैंने प्रेम किया, पर छुपाया नहीं। जब प्रेम में असफल हुआ तो दुख के आँसू भी नहीं छुपाए। जीवन का वो पहला प्रेम जिसमें एक लड़की के साथ घंटो बैठे रहे लेकिन उसे अपने दिल की बात नहीं बता पाए, वो भी सब जानते हैं। मेरा पहला चुम्बन, पहला आलिंगन और पहला सहवास भी लौह दीवार के पीछे नहीं हुआ। मैंने, जब किसी की आँखों में सपने बोये, या की उनकी आँखों से सपने उठाकर अपनी पलकों पर सजाए, किसी ने बालों में उंगलियां फेरीं या मैंने अपनी उंगलियों से किसी के गाल पर अपने नाम लिखे, ये सब दुनिया देख रही थी। प्रेम में असफल होकर मैंने भी दुख को कविताओं में उकेरा लेकिन फिर फिर प्रेम किया। बस इसलिए, की जीवन अगर प्रवाह है तो मुझे भी क्यों ठहरना।
इस सब की वजह से, कब सबकी नजरों में, मैं चरित्रहीन हुआ, इसका पता ही नहीं चला। कब मेरे प्रेम पर लोगों की हिकारतें बरस गईं, नहीं मालूम। कितना अजीब है न ! जब मैं प्रेम में जला तब भी और जब प्रेम में असफ़ल होकर दुख में जला तब भी लोगों ने मुझसे उठ रही लपटों से अपने दिए रोशन किये। हंसी भी आई, लेकिन अच्छा भी लगा। हम हर हाल में रोशनी बिखेर पाएं, इससे बेहतर और हो भी क्या सकता है ! अब वो कहते हैं कि मेरा प्रेम, एक अपराध था, दुनिया से बग़ावत थी, अनैतिक और अधार्मिक था, के मैंने धर्म की सत्ता, ईश्वर के नियम सबको चुनौती दी। और मैं, हैरान हूँ कि दो जोड़ी होंठो के मिलने से ईश्वर, धर्म, नैतिकता सब के सब कैसे हिल जाते हैं ! एक आलिंगन धरती को कैसे हिला सकता है ! मुझे भले ही ये समझ में न आये, लेकिन वो कहते हैं कि मैंने धरती और आसमान के खुदाओं को दुखी और नाराज़ किया है।
इन सब से बाख़बर भी हूँ और बेख़बर भी !
प्रेम बन किसी तप्त हृदय में बरस जाने को तत्पर भी हूँ तो ऐसी ही बारिस का मुन्तज़िर भी। आख़िर इस दुनिया में इससे बेहतर करने को है ही क्या ?
.. 10 अगस्त 2018