Friday, 16 September 2022

दास प्रथा गई, जाति प्रथा कब जायेगी !

भारतीय समाज, राजनीति, धर्म और दर्शन में समानता और स्वतंत्रता के भाव बेहद कमज़ोर हैं। समाज की तो पूरी आधारशिला ही असमानता और अन्याय पर आधारित जाति व्यवस्था पर सदियों से टिकी हुई है। 

 मानव सभ्यता के विकास का अध्ययन हमें बताता है कि निजी संपत्ति के उदय के साथ, संपत्ति हासिल करने और उसे सुरक्षित बनाये रखने की प्रक्रिया में अन्यायपूर्ण व्यवस्था पर आधारित समाज अस्तित्व में आया। पूरी दुनिया में ही धीरे धीरे श्रम करने वालों को हीन और इस श्रम से उत्पादित उत्पाद का उपभोग करने वालों को उच्च मानने का सिसलसिला भी पैदा हुआ। भले ही ये एक अन्यायपूर्ण व्यवस्था थी बावजूद इसके समाज ने इस व्यवस्था से भौतिक उन्नति भी की। इस पर विस्तार से अलग से जानने समझने की ज़रूरत है। लेकिन पिछले लगभग 5 सदियों में दुनिया बहुत तेज़ी से बदली है, और पिछले 100 सालों में तो ते बदलाव बहुत ही तेज़ हुआ है। 

भारतीय समाज में ये बदलाव ज़रूर बहुत धीरे धीरे हो रहा है इसलिए एक स्पेशल केस की तरह भारतीय समाज के पोस्टमार्टम की ज़रूरत है। 

भारत में असमानता और अन्याय को जस्टिफाई करने के लिए दार्शनिक तर्क गढ़ लिया गया कि सत्व, रज और तम के असमान मिश्रण से संसार की रचना हुई है। फिर  इन्हीं गुणों के असमान मिश्रण की कल्पना मनुष्य में कर लिया गया। इसके अनुसार सत्व गुण प्रधान ब्राह्मण सर्वोच्च शिखर पर है तो तमोगुण प्रधान शूद्र सबसे निचले पायदान पर। (इस विषय में ज़्यादा जानकारी के लिए कपिल का विकासवाद पढ़ना चाहिए।)  इस कल्पना के आधार पर भारतीय समाज को चार वर्णों में बांट दिया गया। यही नहीं, इस निहायत ही अमानुषिक और अन्यायपूर्ण विभाजन का महिमामंडन भी किया जा रहा है। 

जबकि ये सच है कि सत्व गुण प्रधान ब्राह्मण में ऐसे हर दुर्गुण विद्यमान हैं जिनकी कल्पना तम प्रधान शूद्र में की गई थी। इसी तरह सत्व गुण प्रधान ब्राह्मण के हर गुण तम प्रधान शूद्र में भी विद्यमान है। बावजूद इसके कुछ लोग मानने को तैयार नहीं हैं कि सत्व, रज और तम की कल्पना अन्यायपूर्ण व्यवस्था को न्यायसंगत ठहराने की एक धूर्त कोशिश थी। 

भारतीय दार्शनिक, आध्यात्मिक, धार्मिक एवम राजनीतिक व्यवस्था में मानवमेधा द्वारा अर्जित एवम सृजित ज्ञान एवम कौशल पर समाज के प्रभु वर्ग के एकाधिकार को सुनिश्चित करने के लिए ही वर्ण या जाति व्यवस्था की खोज हुई। हलांकि जातियों के बनने की प्रक्रिया सदियों तक जारी रही लेकिन दो चीजें कभी नहीं बदलीं, एक, चार वर्णों की व्यवस्था और इनके बीच विद्यमान अन्याय और असमानता।

दुनिया की हर सभ्यता में एक समय दास प्रथा व जातीय व्यवस्था से मिलती जुलती व्यवस्थाएं मौजूद थीं, लेकिन सभी समाजों ने इनका उन्मूलन किया, भारत ही अकेला ऐसा देश है जहाँ एक बड़ा वर्ग इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था को बनाये रखना चाह रहा है। 

दरअसल मनुष्य स्वाभाविकरूप से समानता, स्वतंत्रता और न्याय का तलबगार होता है। बिना इनके वो शांति के साथ जी नहीं पाता। इसलिए जहां असमानता है वहां अन्याय होगा ही, और जागरूक लोग इसका विरोध करेंगे।

अरब जगत में गुलामों के साथ प्रायः सम्मानजनक व्यवहार के उदाहरण मिलते हैं, यहाँ तक कि बादशाहों ने गुलामों से अपनी बेटियाँ व्याहीं और उन्हें उत्तराधिकारी भी चुना, इस्लाम ने गुलाम या दासी रखने को ग़लत भी नहीं माना, बावजूद इसके ग़ुलाम को आज़ाद करने या करवाने को बड़ा पुण्य क़रार दिया। आज हम देखते हैं कि पूरे अरब और अफ़्रीका से दासप्रथा करीब करीब खत्म हो गई है। यूरोप और अमेरिका के गुलामों ने भी लड़कर और विशेष सुधारों के ज़रिए आज अपनी स्थिति बदल डाली है। लेकिन भारत आज भी सदियों पुरानी इस अन्यायपूर्ण जाति व्यवस्था को बनाये रखने के लिए हर मुमकिन कोशिश कर रहा है। 

हम कह सकते हैं कि जातिगत अन्याय दासप्रथा के अन्याय से भिन्न है। हम ये भी कह सकते हैं कि आज़ाद भारत स्वम् को जातिगत अन्याय और असमानता से लगातार मुक्त करता हुआ दिखाई दे रहा है। लेकिन सच ये भी है कि इस व्यवस्था को बनाये रखने के हामियों की सत्ता और शक्ति के विभिन्न केंद्रों पर आज भी मज़बूत पकड़ है। यही कारण है कि हत्या का अपराधी अमीर और सवर्ण होने पर कोर्ट से ज़्यादा उम्र होने के कारण जमानत पा जाता है लेकिन एक मानवाधिकार कार्यकर्ता गंभीर रूप से बीमार होने के बावजूद जमानत पर नहीं छोड़ा जाता और जेल में उसकी मौत हो जाती है। अपराध समान होने पर भी धर्म के आधार पर एक को फांसी हो जाती है और दूसरे को सांसदी मिल जाती है। कहने का तातपर्य ये है कि अन्यायपूर्ण व्यवस्था में संस्कारित लोग अन्याय को ही प्राकृतिक न्याय मान बैठते हैं, फिर वो शिक्षक हों कि जज, अन्याय ही उन्हें न्याय लगने लगता है। आज भारतीय समाज अन्यायपूर्ण न्याय को समाज के हर तल पर स्थापित करने को बेचैन है तो इसका कारण सदियों का संस्कार ही है। 

जो समाज सदियों से अन्याय और असमानता में संस्कारित हो रहा है, उसके लिए ये बिल्कुल स्वाभाविक है। लेकिन जैसा कि मैंने पहले ही कहा, समानता और स्वतंत्रता मनुष्य की स्वाभाविक प्यास है और ये प्यास न्यायपूर्ण व्यवस्था के बिना संभव नहीं है, अतः हम देखते हैं कि सदियों के संस्कार के बावजूद जाति व्यवस्था के ख़िलाफ़ आवाज़ उठती ही रहती है। महत्वपूर्ण बात ये है कि गुज़रते वक़्त के साथ ये आवाज़ें मज़बूत होती जा रही हैं। 

लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि अन्याय और असमानता पर आधारित समाज का पूरी तरह बदलाव कैसे हो सकता है ?

मैंने शुरू में ही निवेदन किया कि निजी संपत्ति के उदय के साथ ग़ैरबराबरी पैदा हुई है। बाद में ग़ैरबराबरी उत्पादन की चूंकि एक व्यवस्था बन जाती है इसलिए इसे बनाये रखने के लिए धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक उपाय भी किये जाते हैं। लिहाज़ा एक बात तो बिल्कुल साफ है कि निजी संपत्ति के उन्मूलन के बिना असमानता को मिटाया नहीं जा सकता और जब तक असमानता है उसे बनाये रखने के लिए अन्याय की भी ज़रूरत रहेगी ही। 

अब दूसरा सवाल, निजी संपत्ति का उन्मूलन कैसे हो ?
एक रास्ता है कि समाज का जागरूक तबका पूरी सत्ता को पलट दे और बलात सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक व्यवस्था को बदल दे। अफ़सोस, देश में फिलहाल ऐसा कोई संगठन नहीं है जो इस जिम्मेदारी को पूरा कर सके। दूसरा रास्ता ये है कि मौजूदा सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढाँचे में भागीदारी एवम सुधार के ज़रिए एक न्यायपूर्ण समाज का निर्माण किया जाए। ये दूसरा रास्ता सुरक्षित ज़रूर लगता है लेकिन सह और मात का खेल इसमें लगातार चलता रहेगा और  न जाने कितने रोहित वेमुला और नजीब प्रभु वर्ग के अहंकार का शिकार होंगे। 

इन सबके बावजूद समानता, स्वतंत्रता और न्याय मानव मन की प्यास है, मनुष्य इस प्यास के होते हुए चैन से जी नहीं पायेगा। और उसकी ये बेचैनी एक दिन दावानल बनकर हर अन्यायपूर्ण व्यवस्था को फूंक देगी। 

~डॉ. सलमान अरशद

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Thursday, 15 September 2022

“भारत जोड़ो यात्रा” क्या बदलेगी देश की तश्वीर?

 आरएसएस और उनके कुनबे की हुकूमत से निराश देश की जनता राहुल गाँधी और उनकी पार्टी के भारत जोड़ो यात्रा को बड़ी उम्मीद के साथ देख रही है. लेकिन भावनाओं में बिना बहे और थोड़ी दूर खड़े होकर जब आप इस कार्यक्रम को देखते हैं तो दो मुख्य आकर्षण हमें नज़र आते हैं, पहली वो तस्वीरें हैं जिनमें राहुल गाँधी विभिन्न जातीय, धार्मिक, नस्लीय समूहों और महिलाओं से बड़ी सहजता से मिल रहे हैं और दूसरी सत्ताधारी दल और उनके समर्थकों की वो प्रतिक्रियाएं हैं जिन पर पहली बार कांग्रेस और उसके समर्थक भारी पड़ रहे हैं. लेकिन इन दोनों ही पहलुओं से ये अनुमान लगाना कठिन है कि भारत जोड़ो यात्रा देश में किस तरह के परिवर्तन का वाहक बनेगी या बिना किसी परिवर्तन के एक इवेंट बन कर रह जाएगी!

कुछ प्रश्न जिनके इर्द गिर्द इस पूरे कार्यक्रम को समझने की कोशिश की जा सकती है वो हैं, कांग्रेस की भारत जोड़ो यात्रा क्या देश की सियासत में किसी बड़े बदलाव का संकेत है? क्या देश की अर्थव्यवस्था जो कुछ खास पूंजीपतियों की चारागाह बन गयी है, उस पर भी किसी तरह की कोई रोक लगेगी? और, क्या जनता धार्मिक उन्माद से इतर जीवन से जुड़े मुद्दों पर सियासत को लौटाना चाहती है? भारत जोड़ो यात्रा पर बात करें, उससे पहले कुछ मुद्दे जो सीधे सीधे आपके और हमारे जीवन से जुड़ते हैं, उन्हें देख लीजिये!

भारत में शिक्षकों के 11 लाख पद खाली हैं, ये सिर्फ़ शिक्षकों का डाटा है, वरना हर सरकारी विभाग में ऐसे ही लाखों पद खाली हैं जिन्हें भरा नहीं जा रहा है. याद कीजिये कि इस देश में एक व्यक्ति के पीछे चार और लोग पलते हैं, इस तरह महज़ 11 लाख शिक्षकों का पद भरने से लगभग 50 लाख लोगों का जीवन यापन सुगम बनेगा, एक स्कूल में कम से कम 5 शिक्षक होते हैं, यानि दो लाख 20 हज़ार स्कूल बच्चों के पढ़ने लायक बनेगे, और लगभग तीन करोड़ बच्चों तक शिक्षा पहुंचेगी. लेकिन ये सरकारों की चिंता नहीं है, सरकार तो पुजारियों को ट्रेंड करेगी ताकि आप कर्मकांड ठीक से करवा सकें. आपके टैक्स का पैसा जिससे आपको तालीम और सेहत मिलनी चाहिए थी, उससे पुजारी तैयार किये जायेंगे ताकि आप और कूप मंडूक बन सकें. क्या ये और इसी तरह के जनसरोकार के मुद्दे भारत जोड़ो यात्रा के सन्दर्भ से बहस में जगह पा पाये हैं? इस पर विचार ज़रूर कीजिये !

राहुल गाँधी की मनमोहनी तश्वीर तो नज़र आ रही है पर क्या भारत जोड़ो यात्रा में देश के लोगों की टूटती बिखरती ज़िन्दगी को जोड़ने की भी कोई कोशिश हो रही है? इस सवाल का ज़वाब कम से कम मीडिया के हवाले से नहीं मिल रहा रहा है. भारत जुड़े और जुड़ा ही रहे अच्छी बात है पर भारतियों को शिक्षा, सेहत और रोज़गार अगर नहीं मिलता तो क्या भारत जुड़ कर भी जुड़ा रह पायेगा, इस सवाल पर शायद आने वाले दिनों में भारत जोड़ो यात्रा के हवाले से कोई ज़वाब आये और अगर नहीं आता है तो हमें ऐसे सवालों को बहस में लाने की कोशिश करनी चाहिए.  

ये भी सोचना होगा कि जातीय आधार पर समाज को सदियों से तोड़ा जा रहा है, अब धार्मिक आधार पर भी विध्वंस की इस परम्परा को भारतीय उच्च वर्ग आगे बढ़ा रहा है, ऐसे में कोई भी सियासत जो जातीय और धार्मिक धुर्वीकरण को हाथ भी नहीं लगाती, वो देश और समाज को क्या सच में जोड़ पायेगी, ये एक बड़ा प्रश्न है.

भारत जोड़ो यात्रा निश्चित रूप से भारत में बड़े सियासी बदलाव का संकेत है, आरएसएस अपने कुनबे के साथ सत्ता में तो पहुँच गया, लेकिन आर्थिक व सामाजिक मोर्चे पर उसने देश को बर्बाद कर दिया है. देश की हर वो संस्था जो इस समूह के कब्ज़े में पहुँची है, अपनी आत्मा की हत्या कर चुकी है, यहाँ तक कि न्यायपालिका तक में लोगों का रहा सहा भरोसा तेज़ी से टूट रहा है.

देश की आम जनता बदलाव चाहती है और जनता के सामने कांग्रेस ही एक मात्र विकल्प है जिसका दामन थाम कर जनता वर्तमान जनद्रोही हुकूमत से निजात पा सकती है. लेकिन यहीं पर ये सवाल भी ज़रूरी है कि क्या कांग्रेस जनता को उन मुसीबतों से छुटकारा दिलवा पायेगी जिनकी वजह से जीवन मुश्किल हो गया है? फ़िलहाल इस सवाल का कोई ज़वाब नहीं है क्यूंकि कांग्रेस ने अब तक ऐसा कोई कार्यक्रम साझा नहीं किया है.

चंद पूंजीपतियों के हक़ में सरकारों के निरन्तर काम करने और पूंजीपतियों के लूट को सुगम बनाने पर क्या कांग्रेस रोक लगाने का इरादा रखती है, इसका भी कोई ज़वाब फ़िलहाल कांग्रेस की ओर से नहीं आया है. इसी तरह साम्प्रदायिकता आधारित राजनीति भाजपा की ताक़त है लेकिन भाजपा के विकल्प के तौर पर जिस कांग्रेस को जनता देख रही है, उसने इस सियासत पर अब तक कोई हमला नहीं किया है और खुद उसका दामन भी इस सियासत के लिहाज़ से पाक साफ़ नहीं है.

राहुल गाँधी की मनमोहक तस्वीरों में निहाल होती जनता, कपड़ो पर बहस करती मीडिया एवं सोशल मीडिया अंत में क्या हासिल करेगी, ये प्रश्न अभी फ़िलहाल प्रश्न ही है. भारत जोड़ो यात्रा सचमुच टूटते बिखरते लोगों को जीवन देगी या एक सियासी इवेंट बन कर रह जायेगी, ये प्रश्न अभी फ़िलहाल अनुत्तरित है. 

कांग्रेस समर्थक मित्र एवं पत्रकार कांग्रेस से सवाल पूछने पर नाराज़गी जताते हैं, लेकिन हमें सोचना पड़ेगा कि सवाल पूछते हुए किसी पार्टी का समर्थन आपको समर्थक बनाता है लेकिन प्रश्न रहित समर्थन से आप भक्त बन जाते हैं. अफ़सोस भारतीय जनता सियासी दलों के समर्थक से भक्त में तेज़ी से बदल रही है.

इन सबके बावजूद राहुल गाँधी और उनकी पार्टी की फ़िलहाल की कोशिशों का मैं समर्थन करता हूँ और जो लोग भारत जोड़ो यात्रा में सहयोग दे रहे हैं उन्हें सलाम करता हूँ. लेकिन एक पत्रकार के रूप में मैं कांग्रेस से सवाल पूछने के हक़ का समर्पण नहीं करूंगा. जिन तीन सवालों से मैंने बात शुरू की थी, उन पर फ़िलहाल कांग्रेस के तरफ से कोई सकारात्मक पहल नज़र नहीं आती, लेकिन उनके साथ आम लोगों के जुड़ने की जो गति है, उसे देखते हुए उम्मीद की जानी चाहिए कि ये जनदबाव उन्हें शायद जनोन्मुख नेता भी बना ही डाले. (यूट्यूब पर लेखक से जुड़ने के लिए अपने यूट्यूब ऐप में सर्च कीजिये the peoples media)