Tuesday, 29 November 2016

मेरे बच्चों,

मेरे बच्चों

तुम ये मत मान लेना कि मनुष्य उड़ नही सकता बल्कि उड़ना कैसे होता है, इसे जानने की कोशिश करना फिर शायद तुम उड़ सको। माँ, बाप, भाई, बहन, और रिश्तेदारों को पुकारना, पुकारना भूत प्रेतों को , पुकारना जिन्न और फरिश्तों को, एक हांक खुदा को भी लगाना। जो तुम्हारी आवाज़ का जवाब दे उसे मानना, जो आवाज़ न दे उसे जानने और खोजने की कोशिश करना, इसके बाद भी जो न मिले उसे फिर हमेशा के लिए भूल जाना। तुम फूलों से प्रेम करना और तितलियों के पीछे भागना मत भूलना। जिस दिन तुम फूलों से प्रेम करना छोड़ दोगे उस दिन दुनिया से सौंदर्य गायब हो जायेगा, तितलियों के पीछे नहीं भागे तो ये भी गायब हो जाएंगी और फिर गायब होगा इस धरती से जीवन। 
तुम जान लेना कि चाँद एक रेगिस्तान है, पहाड़ है, के कोई बुढ़िया वहां नही है, फिर भी ये मत मानना के वो तुम्हारा मामा नही है, तुम जब भी उसे मामा कह कर पुकारोगे वो मोहब्बत से अपनी बाहें तुम्हारे लिए फैला देगा और उसकी गोद में सूत कातती बुढ़िया नानी नज़र आ जायेगी। इस तरह बड़े और समझदार होकर भी अपने भीतर थोड़ा सा बचपन और थोड़ी सी नासमझी बचाये रखना। फिर शायद बचा रह जाये धरती का सौंदर्य और हँसता खिलखिलाता जीवन ।

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मेरे बच्चों

तुम सभी ने गीत तो गाया होगा न ! तुम्हे मालूम है कि सृष्टि के कण कण में गीत बसा हुआ है. हैरानी हो रही है क्या ! एक काम करोअगर तुम्हारे आस पास कोई नदी बहती है तो उसे ध्यान से देखनाजब नदी उबड़ खाबड़ पत्थरों के बीच से बहती हो तो उसे ध्यान से देखना और सुनना. वो गीत गाती है कल कल कल कल की ध्वनि में. तुम इसे ध्यान से सुनोगे तो इस गीत में खो जाओगे. अगर तुम समुन्दर के किनारे रहते हो या कभी वहां जाते हो तो किनारों तक आती जाती लहरों की ध्वनि पर ध्यान लगानातुम्हे उनमें एक सुन्दर गीत की अनुभूति होगी.
तुम सभी बारिस में तो भीगते हो नमम्मी मना करती है इसके बावजूद भीपर क्या कभी बारिस के गीत भी सुने हैंअब सुनना. बारिस कभी तेज़ तो कभी धीमी होती हैऔर इसी के अनुरूप उसका गीत भी अलग अलग स्वर लहरियां पैदा करता है. अगली बार जब बारिस में भीगों तो अपनी आँखे बंद करके चेहरे को आसमान की ओर रखना और बाहें ऐसे फैला लेना जैसे आकाश से तुम्हारी ओर कोई मिलने के लिया आ रहा होफिर बारिस के स्पर्श के साथ उसके गीत को भी सुननातुम जरूर मंत्रमुग्ध हो जाओगे. तुममे से कुछ लोग खेती भी करते होंगेया अपने माता पिता के साथ खेत में जाते होंगे. कभी खेत में तब जाओं जब गेहूं की फसल पूरी तरह पक के तैयार होबस खेत की मेड पर बैठ जाओआंखे बंद कर लो और ध्यान से आसपास की ध्वनि को महसूस करोतुम पाओगे कि जब हवा गेहूं की बालिओं से टकराती है तो एक संगीत पैदा होता है. ऐसा ही तब भी होता है जब धान की बालियाँ पकी होतीं हैं और हवा के साथ मिलकर लिपट-चिपटी करती हैंइस तरह एक गीतप्रकृति का गीत पैदा होता है. तुम प्रकृति के इन गीतों को तब भी सुनना जब बड़े हो जाओसमझदार हो जाओबड़ों की दुनिया के तमाम काम करने लगोअगर तुम ऐसा कर पाओगेतो पाओगे की तुम्हारे भीतर सौन्दर्य का कोई सोंता अनवरत बह रहा है. सच कहूँतो मैं ये कहना चाहता हूँ कि बड़े होकर भी खुद को कभी बड़ा मत होने देनाफिर तुम देखना ये दुनिया ज़रा और खूबसूरत हो जाएगी.

मेरे बच्चों,

प्रेम सृजन का आधार है, तुम्हारे माता-पिता ने एक दुसरे से अगाध प्रेम किया है यही कारण है कि वे तुम्हारे जीवन में प्रेम की वर्षा कर पा रहे हैं. तुम भी प्रेम करो, सबसे पहले खुद से, फिर परिवार से, समाज से, देश और दुनिया से. मनुष्यों से प्रेम करो, प्रेम करो अन्य प्राणियो से, वनस्पतिओं से, नदी, तालाब और पहाड़ों से प्रेम करो. चाँद और सितारों से प्रेम करो. तुम्हारा प्रेम सतत प्रवाहित रहना चाहिए. अगर तुम ऐसा कर सको तो पूरी क़ायनात में नफ़रत के लिए जगह नही मिलेगी. फिर सब तरफ़ सब जगह प्रेम होगा, आनंद होगा.
अब सोचो कि प्रेम करोगे कैसे ! ये बात समझना जरूरी है. हमारे पास एक शारीर है. ये शारीर ही हमारा सबसे बड़ा दोस्त है और यही हमारा सबसे बड़ा साधन है. तो जरूरी है कि ये शारीर स्वस्थ हो, शक्तिशाली हो और साफसुथरा भी. इसके लिए जरूरी है कि हम जो भोजन करते हैं वो शक्ति देने वाला हो, स्वादिष्ट हो तो और भी अच्छा है, लेकिन स्वादिष्ट न भी हो लेकिन शक्ति देने वाला हो तो ऐसा भोजन जरूर करना चाहिए. हमारे भोजन में सब्जियां, दालें, मांस और मछली सभी का समावेश होना चाहिए. खाने के तुरंत पहले या तुरंत बाद में तो पानी नही पीना चाहिए, लेकिन बाद में खूब पानी पीना चाहिए. स्वस्थ शरीर के लिए खेलना और व्यायाम करना भी बहुत जरूरी है.
आपके शरीर में ही एक और चीज़ होती है जिसे मन कहते हैं. इसका कोई रूप या आकार तो नहीं होता लेकिन ये अपने कार्यों से अपनी मौजूदगी का एहसास कराता है. मन स्वभाव से चंचल होता है. इसकी चंचलता को कम करने के लिए आपको प्रयास करना पड़ता है. इसके लिए अलग से कुछ करने कि जरूरत तो नही है लेकिन जो कुछ भी आप करते हैं अगर उसे पूरी सजगता से करने लगें तो मन की चंचलता को कम किया जा सकता है. उदाहरण के लिए आप स्नान करते हैं तो पूरी सजगता से इसे महसूस कीजिये. शारीर पर पानी की शीतलता को और अपने भीतर उठने वाले मनोभावों को महसूस करते हुए स्नान करें. शुरू में थोड़ी मुश्किल होगी, मन इधर उधर भटकेगा, लेकिन धीरे धीरे अभ्यास से इसमें आपको मज़ा आने लगेगा. ऐसे ही बाकी के काम भी करें. जैसे मन की एकाग्रता बढ़ेगी आप पायंगे की आप लोगों से अब और प्रेम करने लगे हैं, यही नही आपको ये भी लगेगा कि और लोग भी अब आपसे पहले से ज्यादा प्रेम करते हैं. तो हो गयी ने खुद से प्रेम की शुरुआत ... बस ऐसे ही करते जाइये !


Saturday, 12 November 2016

फूल कमल के

फूल कमल के
-डॉ सलमान अरशद

हम जिस दुनिया में रहते हैं वो ऊपर ऊपर सिर्फ एक दुनिया नज़र आती है. पर क्या यही सच है? आइये थोडा सोचते हैं कि हम हमारी दुनिया से कितना वाकिफ़ हैं. यहाँ यह कहना जरूरी है, कि मैं जिस और जितनी दुनिया की बात करूंगा वही सच हो ये जरूरी नही है. बस मैं कोशिश कर रहा हूँ कि जो कुछ मुझे दिखाई दे रहा है उस तरफ इशारा कर दूँ तो हो सकता है आप भी उसे देख सकें. अगर हम सब उस तरफ़ देख सकें तो उसको बेहतर करने की दिशा में भी मिल कर सोचा जा सकता है.
हमारी दुनिया में बड़े बड़े उद्योगपति रहते हैं जिनके बारे हर साल हम अख़बारों में पढ़ते हैं कि उनकी दौलत और कितनी बढ़ गयी. इसी दुनिया में किसान रहते हैं जो अनाज पैदा करते हैं, अनाज के बिना हम एक रोज़ भी नही जी सकते, अनाज न हो तो शेयर मार्किट, बैंक, कलकारखाने और विलासिता की तमाम चीज़ें बेमानी हो जएगी, फिर भी किसान रोज़ रोज़ मर रहे हैं. कारखानों में आपनी हड्डियाँ पिघला कर विभिन्न वस्तुओं को आकार देने वाले मजदूर भी इसी दुनिया में रहते हैं. इसी दुनिया में स्टेशनों और शहर की तमाम सड़कों पर बिना किसी खास सुविधा के लोग रहते हैं, जो शायद जनगणना के रजिस्टर में दर्ज भी नही होंगे. हमारी ही दुनिया में ऐसे बच्चे भी रहते हैं जिनके माँ बाप का या तो पता ही नही है या फिर अब वो इस दुनिया में नही रहते.
ये सभी लोग जिनका ज़िक्र ऊपर किया गया है, एक ही दुनिया में रहते जरूर हैं लेकिन सबकी अपनी अलग अलग दुनिया है. कमाल तो ये है इनका आपस में मेल जोल न के बराबर है, वो भी तब जब कि एक दुसरे की रोटी के लिए ये एक दुसरे पर निर्भर है. आज हम आपसे बात करेंगे ज्योतिमाला की और उसकी उस दुनिया की जो हमारी ही दुनिया का हिस्सा है.
ज्योतिमाला कहाँ पैदा हुई, उसके माँ बाप कौन थे, जब वो पैदा हुई थी तब किसी ने सोहर गया था कि नही, उसके पडोसी कौन थे, वो पैदा ही क्यों हुई? इन तमाम सवालों का जवाब किसी के पास नही है, यहाँ तक कि खुद ज्योतिमाला के पास भी नही. सच तो ये है कि ज्योतिमाला नाम भी उसे एक भिखारिन ने दिया है. बस इतना पता है कि एक रोज़ कोई मंदिर में दो बच्चिओं को छोड़ गया था. जिनमे से एक ज्योतिमाला भी है. एक बच्ची जो इससे थोड़ी बड़ी थी उसे कोई और ले गया. कहाँ ले गया और क्यूँ ले गया इसका कोई जवाब मौजूद नहीं है. मालूम है तो बस इतना कि ज्योतिमाला को एक भिखारिन ने पाला. भिखारिन सुबह शाम दातून बेचती थी और बाकी वक्त भीख मांगती थी. जिस दिन ज्योतिमाला भिखारिन को मिली उस दिन दिवाली थी, चूँकि चारो ओर उजाला था इसलिए भिखारिन ने बच्ची को उसी उजाले से प्रेरित होकर एक नाम दिया. हो सकता है इससे सचमुच भिखारिन की ज़िन्दगी में उजाले का एहसास हुआ हो, हो सकता है भिखारिन को लगा हो कि ये बच्ची दुनिया में रौशनी बिखेरेगी या शायद उसने ये ख्वाब देख लिया हो के ये बच्ची दुनिया को रोशन करे. जो भी हो हर बच्चे की तरह इस बच्चे को एक नाम मिला.
मैं सोचता हूँ क्या पहले भी उसका कोई नाम रहा होगा ! क्या पहले भी उसे प्यार से पुकारा गया होगा ! अगर हाँ तो फिर किस नाम से ! क्या हर बच्चे का ये हक़ नही है कि उसका एक नाम हो, उसको प्यार से पुकारा जाए, उसको प्यार से जीने का हक़ मिले, उसे इस खूबसूरत दुनिया में कुछ और खूबसूरती जोड़ने का अवसर मिले ! पर क्या ये सब हर बच्चे को मिल पाता है, अगर नही तो फिर ऐसा क्यों है, क्या ये दुनिया इतनी कंजूस है कि इसके पास एक मासूम बच्चे को देने के लिए थोडा सा प्यार भी नहीं है ! हाँ ये दुनिया कंजूस तो है. किसी के पास इतना ज़्यादा है कि वो संभाल नही पा रहा है और किसी के पास इतना भी नही कि वो ज़िन्दा रह सके. लेकिन इस दुनिया की बदसूरती के बीच आज भी खूबसूरत लोग रहते हैं. जैसे कि ये भिखारिन. इस भिखारिन का नाम भी है, पर नाम से होगा भी क्या. फिर भी आपकी सुविधा के लिए हम उसे एक नाम देते हैं, सोना देवी. तो सोना देवी ने इस बच्ची को अपनी उंगली पकड़ा दी और उसे अपनी बदसूरत दुनिया का हिस्सा बना लिया, पर शयद इस बच्ची ने उसकी बदसूरत दुनिया को थोडा तो सुन्दर बना ही दिया था. यही वजह थी उसने मरते दम तक उसे अपनी ऊँगली पकडाए रखा और जब इस दुनिया से जाने लगी तो इस मासूम बच्ची को अपने भाई की ऊँगली पकड़ाकर गयी. भिखारन बुढिया एक सरकारी भवन के सामने खाली पड़े ज़मीन के टुकड़े पर एक झोपडी में रहती थी. वैसे तो उसने इस बेकार पड़े ज़मीन दे टुकडो को एक अर्थ दिया था, उस टुकड़े को उपयोगी बनाया था, उस बेकार पड़े जमीन के टुकड़े को आबाद किया था. लेकिन हमारी दुनिया की सभ्य भाषा में इसे अतिक्रमण कहा जाता है.
अजीब बात है, जब एक अमीर और अधिक दौलत कमाने के लिए गरीब की दुनिया पर क़ब्ज़ा करता है तो इसे तरक्की कहते हैं, विकास कहते हैं लेकिन जब एक गरीब बस रोटी, कपडा और मकान के लिए बेकार पड़ी ज़मीनों को आबाद कर देता है तो इसे अतिक्रमण कहते हैं. खैर सोना की झोपडी में एक दिन आग लग गयी. इसमें कुछ भी नया नही था, प्रकृति हो या इस दुनिया का “पुरुष” सभी की मार हमेशा गरीब पर ही पड़ती है. सोना जो एक मासूम बच्ची की ज़िन्दगी में उजाले की उम्मीद पाले इस छोटी सी झोपडी में एक पूरी दुनिया आबाद किये हुए रहती थीं, वो दुनिया जल चुकी थी. सोना के पास कोई और ठिकाना नही था तो वो स्टेशन पर आ गईं. स्टेशन वैसे तो सभ्य दुनिया के बासिंदों के लिए बस एक पड़ाव भर है जहाँ उन्हें न चाहते हुए भी कभी- कभार कुछ पल मजबूरी में गुजरना पड़टा है, लेकिन सोना और ज्योतिमाला जैसों के लिए ये उनकी दुनिया है. एक दुनिया जहाँ से वो कभी कचरा चुन कर, कभी भीख मांगकर, कभी जूठन चुनकर, छोटे-मोटे सामान बेचकर तो कभी चोरियां करके अपना पेट भरते हैं. पेट जिससे वो हमेशा हारते आये हैं और जो उन्हें वह सब करने को मजबूर करता है जिसके लिए वो सभ्य दुनिया की उपेक्षा और नफरत सहते हैं.
ज्योतिमाला अभी स्टेशन पर ही थी जब एक दिन सोना इस खूबसूरत या बदसूरत दुनिया को अलविदा कह गयी. बच्ची अकेली थी लेकिन तभी उसे एक पापा मिल गये. ये थे सोना के भाई बलवीर जो उसी की तरह छोटी-छोटी चीज़ें स्टेशन पर बेचकर अपना गुज़ारा करते थे. सोना ने मरने से पहले ज्योतिमाला की जिम्मेदारी अपने भाई को दे दी थी. ज्योतिमाला को उम्र की गणित तो ठीक से नहीं आती, लेकिन वो कहती है कि उस वक्त वो यही कोई पांच साल की रही होगी. मम्मी यानि कि सोना मर चुकी थी. बलवीर ज्योतिमाला को अपने साथ सीतामढ़ी ले गये. जहाँ वो करीब एक साल रही. यहाँ वो खेतों में जाती थी और बकरियां भी चराती थी. लेकिन उसे ये नही मालूम कि पापा के पास अपना खेत था कि नही, जिस घर में वो रही थी वो भी उन्ही का था या किसी और का.
पापा के बेटा और बहु भी थे. हाँ, ऐसे लोग भी हमारी इस दुनिया में बेघरबार ज़िन्दगी गुज़ारने को विवश हैं जिन्होंने ने अपने जीवन भर की पूँजी अपने बेटों को दे दी है. .....खैर वो ज्योतिमाला को घरेलु कामों के लिए अपने साथ ले गये. छ: साल की बच्ची घर के कितने और कैसे काम कर पायेगी, इसका अनुमान लगाना कोई मुश्किल काम नही है. ज्योतिमाला कहती है कि उसे यहाँ खाना तो पूरा नही मिलता था पर पिटाई भरपूर होती थी. आज भी उसके जिस्म पर उस मारपीट के निशानांत मौजूद हैं. ज्योतिमाला यहाँ से भाग कर एक बार फिर स्टेशन पर आ गयी और पापा के साथ रहने लगी.
स्टेशन पर उसे अपने जैसी और लड़कियां मिल गईं, ये लड़कियां कचरे के डिब्बे से एसी चीज़ें चुनती थी जिनसे अभी भी कुछ बन सकता है. इन्हें कबाड़ी वाले के पास बेच दिया जाता था. कबाड़ी वाला इनका बैंकर भी था. पैसे उसी के पास जमा रहते थे और ज़रूरत पर लड़कियां उससे पैसे लेती थीं. उसका हिसाब सही था या गलत इस बारे में ज्योतिमाला को कुछ नही मालूम. खाने पर अक्सर पैसा खर्च नही किया जाता था. ये ज़रूरत मंदिर के प्रसाद या फिर यूँ ही मिले खाने की चीज़ों से पूरी हो जाती थी. इस पैसे को कपडे और सजने-संवरने वाले सामानों को लिए खर्च किया जाता था. ज्योतिमाला झिझकते हुए ये भी बताती है कि इस पैसे का बड़ा हिस्सा नशा करने में जाता था. नशे के लिए इनकी दुनिया में शराब या अमीरों की दुनिया की चीज़ें नहीं हैं. यहाँ नशे के लिए व्हाइटनर या फिर सेलुशन (जिससे पंचर जोड़ा जाता है) का इस्तेमाल किया जाता है.
 आप स्टेशन पर थोडा वक्त गुजारें और आवारा घुमते हुए बच्चों को गौर से देखें तो आप देखेंगे कि कुछ बच्चे कपडे की एक पोटली बार बार मुंह में लगाते हैं. अगर आप ध्यान से न देखे और पहले से इसके बारे में मालूम न हो तो आप जान भी नही पाएंगे. लेकिन इसके नशे की लत वाले ये बच्चे बहुत जल्दी ही अपनी ज़िन्दगी से हाथ धो बैठते हैं. पापा चाहते थे कि ज्योतिमाला इस दुनिया का हिस्सा न बने. शायद यही वजह थी कि अपने बेटे और बहु की मांग पर उन्होंने तीन बार ज्योतिमाला को उनके पास भेजा और हर बार ज्योतिमाला वहां से भाग आयी. आखिर में पापा ने ज्योतिमाला को अपनी बहन के पास रखा जहाँ वो लगभग दो साल तक रही लेकिन उसको ये दुनिया भी रास नहीं आयी और एक दिन फिर वो भाग कर स्टेशन आ गयी. अब तक वो जीवन कि प्रथम दहाई पार कर चुकी थी.
एक रोज़ जब वो स्टेशन पर मंदिर परिसर में बैठी थी तभी कुछ लोग उसे उठा ले गये. उसे एक बाज़ार में बेच दिया गया. बाज़ार का नाम नहीं लिखा जा रहा है. लेकिन आप सभी इस बाज़ार को जानते हैं. पापा जो इस बदसूरत दुनिया के हर गली मोहल्ले से वाकिफ थे, उन्हें अपनी बेटी को ढूँढने में कोई समस्या नही हुई. वो वहां पहुँच गये, स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल किया और सौभाग्य से पुलिस ने भी इनकी मदद की और बच्ची को छुड़ा लिया गया.
ज्योतिमाला ऐसी बच्चिओं के बारे में बताती है जिन्हें अलग अलग मौकों पर एक खास औरत ने किसी को बेचा है. ये लड़कियां आज अगर होंगी तो कहाँ होंगी और हमारी सभ्य दुनिया के लोग उनके साथ क्या कर रहे होंगे, इसका बस अनुमान लगाया जा सकता है.
पापा को एक स्वम् सेवी संस्था, रेनबो होम फाउंडेशन इंडिया के बारे में पता चला जहाँ बेघर-बार और गरीब लड़किओं को आवास, भोजन और शिक्षा उपलब्ध कराया जाता है. आज ज्योतिमाला उसी संस्था में कक्षा 8 की छात्रा है. उम्र के अनुसार तो उसे अब तक 12 वीं में होना चाहिए था लेकिन ये नियम उस दुनिया में लागु नही होते हैं जिसकी अब तक वह रहवासी थी. मैंने पूछा कि वो यहाँ से निकल कर क्या करेगी तो बताया कि वो अपने कुछ दोस्तों के साथ मिलकर होटल खोलेगी. ये दोस्त भी वहीँ पढ़ती हैं, इस होटल की कमाई से एक घर बनाएगी जहाँ उसके जैसी दुनिया से आने वाले लड़के लड़किओं को रखा जायेगा.
ये हम सबके सोचने की बात है कि क्या हम ये ज़िम्म्देदारी ज्योतिमाला और उसके दोस्तों को अकेले उठाने दें, क्या हम एक ऐसी दुनिया बना सकते हैं जिसमे इसकी जरूरत ही न हो? सोचियेगा.

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गुलशन फिर महकेगा

गुलशन फिर महकेगा

- डॉ सलमान अरशद

ये कहानी है फुटपाथ पर बिखरे एक परिवार की, ये कहानी है बर्बाद हो रहे बचपन की, ये कहानी है पल पल दम तोडती इंसानियत की, ये कहानी है उस सिस्टम के नाकामी की जिसमे लाखों घरों के खरीददार नहीं हैं लेकिन लाखों को घर नसीब नही होता. ये कहानी है उस विकास की जो हजारों लोगों से उनके जीने का हक़ छीन कर उन्हें सडकों पर मरने के लिए छोड़ देती है. इसके साथ ही ये कहानी है अँधेरे के गर्भ से पैदा होती हुई रौशनी की, ये कहानी है उम्मीद की, ये कहानी कहती है की सपने कभी नही मरते, उम्मीदों के लिए जगह हर हाल में बची रहती है. ये कहानी कहती है की अँधेरा चाहे जितना घना हो वो रौशनी को रोक नही सकती. ये कहानी कहती है कि ऐसे लोग हमेशा रहेंगे जो उम्मीदों की दुनिया को तबाह होने से ठीक पहले बचा ले जायंगे. ये कहानी कहती है कि ये मुश्किल दौर है फिर भी खूबसूरत दुनिया के ख्वाब देखे जा सकते हैं.
इस कहानी में एक 16 वर्षीय किशोर ने अपने बचपन से लेकर अब तक की ज़िन्दगी के बिखरे हुए टुकड़ों को इकठ्ठा करके हमारे सामने रखने की कोशिश की है. हमने आपके लिए उसे तरतीब दी है पढ़िए उसकी कहानी उसी की ज़बानी.
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कहने के लिए बाकि सभी लोगों की तरह मेरा भी एक परिवार है, कभी कभी मन भी करता है कि सबसे मिलूं, सबसे अपना प्यार साझा करूं, पर किसी के पास न जाता हूँ और न ही कोई मेरे पास आता है. परिवार, खानदान और रिश्तेदारों के सदस्यों में से कुछ की तश्वीरें अब धुंधली हो गईं हैं. मैं जो हूँ इसकी बुनियाद कहाँ से शुरू होती है, ये कहना मुश्किल है, फिर भी दादा तक की कुछ बातें मुझ तक मेरे पापा के ज़रिये पहुंची हैं, वही से बात शुरू करता हूँ.
मेरे दादा खाते पीते खानदान से रहे होंगे. उनके पास 52 बीघा खेत और भरा पूरा परिवार था. उनके दो बेटे और चार बेटियां थीं. इन्हीं में से एक मेरे पापा भी हैं.
दादा को कब और कैसे नशा करने की आदत पड़ गयी ये मुझे नहीं मालूम, ये भी नही मालूम कि वो किस चीज़ का नशा करते थे. हाँ इतना जरूर मालूम है कि इस नशे की वजह से उन्हें ज़मीन जायदाद सब से हाथ धोना पढ़ा और वो पूरे परिवार के साथ सड़क पर आ गये. यही से शुरू होता है परिवार के बिखरने और जीने के लिए जद्दोज़हद का दौर. परिवार के हर सदस्य का अब यही मकसद था कि दो वक्त कि रोटी इज्ज़त के साथ मिल जाये और इज्ज़त की रोटी की चाहत ने एक एक करके सभी को जद्दोज़हद करने पर मजबूर कर दिया. सभी लोग अपने अपने तरीके से रोटी कमाने में लग गये. दादा के अब नशे करने की औकात नही रही लिहाज़ा वो सुधर गये और अल्लाह मियां के घर में पनाह ले ली, यानि कि मस्जिद के इमाम बन गये. यही काम करते हुए उन्हें एक शरीफ आदमी की मौत नसीब हुई.
पापा एक बन्दूक की दुकान में काम करते थे. आते जाते रास्ते में एक खातून से देखा देखी शुरू हुई, देखा देखी जल्दी ही कसमे वादे प्यार मुहब्बत तक पहुच गयी. दोनों ही परिवार इनके रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे लिहाज़ा इन्होने भाग कर शादी कर ली. पापा ने घर परिवार चलाने के लिए खूब मेहनत किया, कभी रिक्शा चलाया, कभी मजदूरी की तो कभी किसी कारखाने में काम किया. धीरे धीरे परिवार भी बढ़ता रहा. हम तीन भाई और एक बहन के साथ एक भरे पूरे परिवार के मालिक बने. जैसे तैसे हमारी गाड़ी चल रही थी. जब मैंने होश संभाला तो मामा ने हमे अपने कारखाने में रख लिया जिसमे ब्लेज़र बनते थे. मामा का परिवार पापा मम्मी से अभी तक नाराज़ था लेकिन हम लोगों से हमदर्दी भी थी. बात शायद 2004 की है, एक दिन जब मैं मामा के कारखाने में काम कर रहा था तो माँ के मरने कि खबर मिली. मम्मी लोगों से रिश्ते बना के चलती थीं और सब के दुःख दर्द में शामिल होतीं थी, एक रोज़, जब मकान मालिक के घर शादी होने वाली थी, मम्मी उनके घर काम में हाथ बटा रही थीं. पापा इस बात से नाराज़ हुए कि पहले घर का काम करो फिर किसी की मदद. दोनों में झगडा शायद ज़यादा बढ़ गया होगा. उसी रात मम्मी ने खुद पर तेल डाल कर आग लगा ली, अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गयी. कहने के लिए तो मौत सिर्फ मम्मी की हुई थी लेकिन इसके साथ ही हम लोगो के लिए “परिवार” की मौत हुई थी, हमारी खुशिओं की मौत हुई थी और किसी हद तक हमारे सपने देखने की क़ूवत की मौत हुई थी.
भारतीय परिवारों में माएं परिवार की धुरी होती हैं, पूरा परिवार उन्ही के इर्द गिर्द घूमता रहता है. माँ कि मौत के बाद परिवार अहिस्ता अहिस्ता बिखरने लगा. पापा ने शराब पीना शुरू कर दिया जो अभी हॉल में शराब बंदी तक जारी था, आजकल शराब नही मिलता तो तम्बाकू से ही काम चलाते है.
परिवार के हालात तो पहले से ही ठीक नही थे लेकिन माँ की मौत के बाद हालात और तेज़ी से ख़राब होने लगे. कई महीनों के किराये के बकाये की वजह से एक दिन मकान मालिक ने हमें घर से निकाल दिया और गृहस्ती के नाम पर हमारे पास जो कुछ भी थोडा बहुत था उसे जब्त कर लिया. इस हालत में हम लोगों ने फुटपाथ को अपना आशियाना बनाया और गाँधी मैदान पटना में एक फुटपाथ पर रहने लगे. लगभग दो महीने फुटपाथ पर रहने के बाद पापा के दोस्त जिनका रिक्शा लेकर पापा चलाते थे, अपने घर में रहने की जगह दे दी. इनके खेत में ही घर था वहीं एक कोने में पापा ने भी एक झोपडी बना ली. यहाँ करीब एक साल तक रहना हुआ, एक बार तेज़ बारिस की वजह से खेत में इतना पानी भर गया कि हमे अपना आशियाना छोड़ना पड़ा, कोई और सहारा न देख हम लोग पटना रेलवे स्टेशन पर आ गये. क्या और कैसे किया जाये इसका कोई रास्ता दिखाई नही दे रहा था. पापा ने हम तीन भाइयों और एक बहन को स्टेशन पर छोड़ दिया और कुछ आर्थिक मदद की उम्मीद लेकर दादी के पास चले गये. दादी उस वक्त एक बुआ के घर पर रहती थीं और ये बुआ खुद बच्चों को पढ़ा कर अपना गुजारा करती थीं. पापा शाम तक नहीं लौटे तो मुझे लगा के जाकर देखना चाहिए कि क्या हुआ. अपने से छोटे भाई को एक भाई और बहन की जिम्मेदारी देकर मैं चला गया. जब मैं पापा की खोज में बुआ के घर पंहुचा तो पाया कि उन लोगों ने मकान बदल लिया है. वही मुझे एक आदमी मिला, उसने कहा कि वो मुझे दादी के पास पंहुचा देगा. मैं उसके साथ साथ चल दिया. वो मुझे लेकर त्रिपोलिया बाज़ार गया और वहां एक दूसरे खाते-पीते परिवार के हवाले कर दिया. मेरे बहुत रोने और परेशान होने के बावजूद उन्होंने मुझे नही छोड़ा. मेरे हालात जानने के बावजूद उन्हें मुझ पर दया नहीं आयी. यहाँ मैं घरेलू नौकर बन गया, एक ऐसा नौकर जो कैदी भी था. (अगर हम ध्यान से देखें तो पूरे देश दुनिया के कई हिस्सों में हमें ऐसे मासूम बच्चे जो क़ैदी भी हैं और नौकर भी. कैदी ऐसे कि जिन्होंने कोई गुनाह नही किया है. लेकिन सफेदपोश जो ऐसे बच्चों की ज़िन्दगी नरक बनाते हैं वो हमारे ही बीच शान से रहते हैं, बिना किसी भय के.)  दो महीना मैंने इस परिवार की गुलामी की और एक शाम यहां से भागने में कामयाब हुआ.
भाग कर एक बार फिर पटना स्टेशन पर आ गया. भाईयों व बहन की तलाश की, पापा के बारे में जानने की कोशिश की पर किसी का कुछ पता नही चला. स्टेशन मेरे जैसे बेघर बार बच्चों का घर ही है. जहाँ हम रोटी के एक-एक टुकड़े के लिए जान पर खेलते हैं, हमने लोगों के झूठन खाए, कचरे में से अनाज निकाल कर खाया. फेंकी गयी पानी की बोतलों में दुबारा पानी भर के 5-5 या 10-10 रूपये में बेचा, कचरा चुना और बेचा. बस किसी तरह जी रहा था. यहीं एक बुराई कब मेरे ज़िन्दगी का हिस्सा बन गयी पता ही नही चला. बाकि सभी बच्चों की तरह मैंने भी नशा करना शुरू कर दिया. व्हाइटनर और स्लूशन का इस्तेमाल करने लगा. आये दिन पुलिस पकडती, मारती-पीटती सुधरगृह ले जाती, जब वहां से छूटते तो फिर उसी पुरानी दुनिया में वापस आ जाते. इसी तरह स्टेशन पर कुछ साल गुज़र गये.
पापा से कैसे मिला ये आगे बताऊंगा, लेकिन ये जानते हैं कि मेरे स्टेशन से जाने के बाद क्या हुआ.
पापा दादी से मिलकर जब स्टेशन वापस आये तो मैं तो गायब था लेकिन दो भाईओं और बहन को वो अपने साथ लेकर नानी के घर गये. पापा की हालत देख कर सभी दुखी हुए, मामा के एक दोस्त जिनकी कोई औलाद नही थी, ने मेरे एक भाई को गोद लेने की ख्वाहिश का इज़हार किया. सबने आपस में मशवरा किया और सबसे छोटे भाई जिसकी उम्र लगभग पांच साल रही होगी, को उन्हें दे दिया गया. पापा एक भाई और एक बहन को लेकर पटना सिटी स्टेशन पर रहने लगे और रिक्शा चलाकर अपना गुज़ारा करने लगे. एक रोज़ बहन को प्यास लगी तो भाई उसके लिए पानी लेने गया जब वो पानी लेकर वापस आया तो देखा एक मर्द और एक औरत बहन को लेकर भाग गये, वो उनके पीछे भगा लेकिन वो स्कूटर पर बैठ कर भाग गये. इसी वक्त एक भिखारन ने भाई को पकड़ लिया, भिखारन के डरावने चेहरे से भाई इस कदर डर गया कि बोल न सका, उस वक्त उसकी उम्र यही कोई 7 साल के लगभग होगी. एक बार फिर पूरा परिवार एक-एक कर बिखर गया.
महीनों बाद ऐसे ही एक बार जब मैं सुधारगृह से निकला और स्टेशन के लिए चला तो पीछे से किसी ने भैया भैया पुकारा. देखा तो मेरा छोटा भाई था. उसके साथ एक भिखारन थी. भिखारन उसे अपना बेटा बताकर साथ ले जाना चाहती थी, उसने मुझे पुलिस का डर भी दिखाया, लेकिन हम दोनों भाई एक दुसरे को पहचान रहे थे और आसपास के लोगों ने भी साथ दिया, इसलिए मुझे मेरा भाई मिल गया. भिखारन भाई को लेकर पश्चिम बंगाल चली गयी थी, करीब सात महीने तक वो भाई के साथ इधर उधर घूमती रही पर उसने भाई को कोई तकलीफ नही दिया था.
भाई को लेकर एक बार फिर मैं पटना स्टेशन पर आ गया. जैसे तैसे ज़िन्दगी चल रही थी. एक बार जब मैं फिल्म देखने जा रहा था, रास्ते में पापा दिखाई पड़ गये. वो रिक्शे पर एक सवारी लेकर कहीं जा रहे थे. उन्हें पुकारा, वो रुके, हम लगभग दो साल बाद मिले थे. हम दोनों ही एक दुसरे से मिलकर बहुत खुश हुए. भाई मुझे पहले ही मिल चुका था. इस तरह आधा-अधूरा परिवार फिर साथ हुआ. पापा हमे अपने साथ लेकर फुटपाथ पर ही रहने लगे. लेकिन नशे की लत की वजह से मैं बार बार स्टेशन भाग आता था. पापा ने बालसखा के लोगों से हमारे लिए बात की. उन्होने हमारे सोने और खाने की व्यवस्था की. हम रोज़ वहाँ जाते खाते सोते और सुबह स्टेशन आ जाते. ये लोग साल में दो बार किसी खास स्थान पर हमें घुमाने भी ले जाते थे. 2007 से लेकर 2013 तक इस संस्था से जुड़ा रहा. इन्होने हमें सिलाई सिखाया और एक जगह काम पर भी लगा दिया. लेकिन मेरी नशे की लत मुझे कहीं रुकने न देती और मैं भाग कर स्टेशन आ जाता जहाँ मेरी नशे की लत पूरी होती थी. बालसखा के संजय भैया को लगा के सिलाई में मेरा मन नहीं लगता है तो उन्होंने अपने एक दोस्त जो इमेरजेंसी लाइट का कम करते थे, के पास काम पर रख दिया. यहाँ खाने सोने का इंतजाम था और सप्ताह में 100 रुपया जेब खर्च के लिए मिलता था. यहाँ काम में बहुत मेहनत करनी पड़ती थी और नशे की लत तो थी ही, इसलिए डेढ़ महीने में ही यहाँ से भी भाग निकला. संजय भैया डांटेंगे, इस डर से न तो उनसे मिला और न ही बालसखा वापस गया. बालसखा ने मेरे छोटे भाई को भीटी नेपाल भेज दिया जहाँ उसने सिलाई सीखी और अब वो बंगलौर में सिलाई करता है. उसे 8000 रूपये महीने मिलते हैं. नशे की लत मुझे कहीं भी ठहरने न देती थी और बार बार स्टेशन पर शरण लेने को मजबूर करती थी. इसी तरह भटकते हुए एक दिन मेरी मुलाकात रेनबो होम की नीलू और नीतू मम्मा से हो गयी और मैं रेनबो होम आ गया. नशे की लत छुड़ाने के लिए संस्था ने नशामुक्ति केंद्र में इलाज करवाया और फिर मेरी पढाई शुरू हुई. इस साल मैंने आठवी का एग्जाम दिया है. पापा पत्तल बनाने वाले कारखाने में काम करते हैं और वहीँ खाना खाकर सो जाते हैं. भाई बंगलौर में काम करता है, कभी कभी हम फोन पर एक दुसरे के साथ बात करते हैं. हम चाहकर भी कभी इकठ्ठा नही हो पाते क्योंकि हमारे पास घर नही है. मैं अपनी पढाई पूरी करके फैशन डिजाईनर बनना चाहता हूँ. मैं अपनी मेहनत से पैसा कमाऊंगा और एक घर बनाऊंगा जिसमे अपने भाई और पापा के साथ रहूँगा. इसके साथ ही रेनबो होम की मदद करूंगा ताकि मेरे जैसे और लोग भी फुटपाथ की ज़िन्दगी से आज़ादी हासिल कर सकें, ताकि कुछ और लोग मेरी तरह सपने देख सकें, ताकि कुछ और बिखरे परिवार एक हो सकें ताकि कुछ और लोगों को मोहब्बत की ज़िन्दगी नसीब हो सके.
ये कहानी एक किशोर की ही नहीं है बल्कि उन लाखों किशोरों की है जो वक्त और हालात की मार से बिखर जाते हैं, कुछ कभी एक दुसरे से मिल पाते हैं तो कुछ नहीं भी मिलते. ये मासूम किशोर आज भी अपनी बहन के लिए तड़पता है. वो कहाँ होगी, किस हाल में होगी, इसका तो अनुमान लगाना भी मुमकिन नही.
हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त के रहवासी हैं, हम हमारे हुक्मरान चुनते हैं जो हम तक पहुँचने के लिए धन दौलत की कुर्सी पर बैठ कर धन दौलत की सड़क से चलते हुए वोट मांगने आते हैं और जीत कर हमारी ज़िन्दगी में कुछ और गरीबी, कुछ और बदहाली जोड़ जाते हैं, जिसके नतीजे में कुछ और परिवार इसी तरह बिखरने को मजबूर होते. लेकिन जब ये सब हो रहा होता है तो कुछ मुट्ठी भर लोग और अमीर हो जाते हैं उनका कुछ और विकास हो जाता है. 

क्या एक ऐसी दुनिया का सपना देखा जा सकता है जिसमे कोई परिवार फुटपाथ पर रहने को मजबूर न हो, किसी को अपना बच्चा सिर्फ इसलिए किसी और को न देना पड़े कि उसके पास अपने बच्चे को खिलाने के लिए रोटी नहीं है, कोई बेटी न मारी जाए न उठाई जाए. मैं ऐसे सपने देखता हूँ और जानता हूँ मेरी तरह बहुत से लोग ऐसे ही सपने देखते हैं. क्या आप और हम मिलकर ये सपना देख सकते हैं? 

Wednesday, 2 November 2016

आइये घरों से निकालिए अमन के लिए

ये बात परेशान करती है कि मुसलमानों से नफरत करने वालों की संख्या लगातार बढ़ रही है... इसके साथ ही जीने के लिए बुनियादी सुविधाये आम आदमी की पहुच से दिन बदिन दूर हो रही है लेकिन इनको लेकर अवाम की नाराजगी दिखाई नही पड़ रही है। 
इन दोनों ही हालात का विश्लेषण कीजिये। सालो से एक नियमित अंतराल पर देश में आतंकवादी घटनाएं हो रही हैं और इन घटनाओं के घटित होने के फ़ौरन बाद मुस्लिम नौजवान गिरफ्तार किये जाते हैं जिनको भरपूर मिडिया कवरेज़ मिलता है। इस तरह धीरे धीरे यह मानस बनाया जाता है कि मुसलमान आतंकवादी कौम है। यहाँ ये देखना भी ज़रूरी है कि जब कुछ लोग न्यायालयों से सबूत के अभाव में या निर्दोष साबित होकर बाहर आते हैं तो मीडिया खामोश रहती है।
अब जरा हिंदुस्तानी मुसलमानो पर गौर कीजिए। ये क़ौम दुनिया के किसी भी जेहादी आंदोलन में शामिल नही होती, यहाँ तक कि कश्मीर में भी देश के अन्य भागों से मुसलमान कभी लड़ने नही गये। कितना हैरान करने वाली बात है  की जब यूरोप और अमेरिका के मुसलमान पाकिस्तान, अफगानिस्तान और दुनिया के दुसरे इलाकों मे जेहाद के नाम पर लड़ रहे हैं उस वक्त हिंदुस्तान का मुसलमान कहीं भी लड़ने नही जाता. यहाँ यह भी कहना जरूरी है की हिंदुस्तान के मुसलमान की मज़हबी समझ दुनिया के किसी भी अन्य मुस्लिम मुल्क से किसी भी लिहाज़ से कम नही हैं, देश के कई दारउलउलूम
हैं जहाँ अरब और बाकि दुनिया के छात्र मज़हबी तालीम के लिए आते हैं, ये जग ज़ाहिर है की मदीना में भारत के  मौलाना का सम्मान होता रहा है. इस सब के बावजूद अगर यहाँ का मुसलमान दुनिया भर में कहीं भी जेहाद के नाम पर लड़ने नही गया तो ये सोचना जरूरी हो जाता है कि कुछ तो है जो हिंदुस्तान के मुसलमानों के अमनपरस्ती की बुनियाद है, इसके कारणों पर फिर कभी चर्चा करूंगा. लेकिन यह कमाल की बात है की यही मुसलमान अपने देश में आये दिन ब्लास्ट करता रहता है.
हर आतंकवादी घटना का कोई न कोई राजनीतिक एजेंडा होता है, अगर ऐसा होता है तो उस एजेंडे के लिए काम करने वाले कई मोर्चों पर एक साथ काम करते हैं, जैसे हमारे देश में आरएसएस को लिया जा सकता है. सोचने वाली बात है कि जो मुसलमान रोज़ बम फोड़ रहा है आखिर वो चाहता क्या है? जाहिर सी बात है इस पर सिर्फ कयास लगाया जा सकता है, अब या तो मुस्लिम नौजवान पागल हो गये है जो निरुद्देश्य बम फोड़ते हैं या फिर मुसलमानों के नाम पर कोई और ही गैंग है जो किसी रास्ट्रीय या अंतरास्त्रिय साजिश के तहत ये सब कर रहा है. इस मुद्दे पर मेरी जो समझ है उस पर अलग से कभी लिखूंगा.
मुस्लिम क़यादत पर भी सोचना ज़रूरी है, ये सड़कों पर तब उतरे जब किसी कार्टून, किसी किताब, किसी विचार का वरोध करना था, यहाँ तक कि गली के किसी चम्पक का भी देश के पैमाने पर विरोध किया लेकिन भूलकर भी कभी मुसलमानो के होक़ूक़ के लिए आंदोलित नही हुए, ये भी घ्यान देने की बात है कि मुसलमानो के जीवन से कटे इन आंदोलनों को मीडिया ने खूब कवरेज़ दिया लेकिन जिंदगी से जुड़े मुद्दे पर कहीं कोई सराहनीय काम हुआ तो मिडिया ने उधर ध्यान नही दिया. मिसाल के तौर पर रिहाई मंच पिछले कई सालो से झूठे आरोपों में गिरफ्तार मुस्लिम नौजवानों के लिए लड़ रही है, और कई लोग अब तक इनकी कोशिशों से छूटे भी हैं, लेकिन ऐसा कई बार हुआ कि इनको मुसलमानों के लिए जमानतदार तक नही मिले. जो लोग शरीयत के नाम पर सड़कों पर सीना पीट रहे हैं उनमे से ज़यादातर लोग इस ग्रुप को जानते तक नहीं होंगे. जो मौलाना नेताओं को चेतावनी दे रहे हैं कि वे शरीयत के मामले में किसी भी तरह की तबदीली हरगिज़ नही होने देंगे वे भाड़े टट्टू भी कौम के असली दर्द के मामले में ज़बाने सिले बैठे है. ये टुकड़खोर मौलाना ही हैं, जिन्होंने मुसलमानों की एसी इमेज बनाई है कि ये कौम शरीयत के मामले को छोड़ कर कभी भी नहीं उठेगी, कोई भी जितना चाहे इस कौम पर जुल्म व सितम कर सकता है.
एक तीसरी बात जिस पर गौर करना बहुत जरूरी है. आज आम मुसलमानों को लगता है की बीजेपी के आने से उसके लिए मुश्किलें बढ़ गयी हैं, सपा बसपा और दूसरी कई पार्टियाँ इस कौम का वोट यही कह कर लेती रही कि अगर उन्हें वोट नही दिया तो बीजेपी जीत जाएगी. इस देश में भी एक धारणा कयाम थी की बिना मुसलमानों के कोई भी पार्टी सरकार नही बना सकती. बीजेपी ने इसका तोड़ निकाल लिया. वो यह की जो वोट उन्हें नही मिल रहे हैं उसे टुकड़ों में बाँट दिया जाये. और नतीजा हमारे सामने है, पहली बार देश में अल्पमत की बहुमत वाली सरकार बन गयी. अब जो मुसलमान बीजेपी से डरे हुए हैं उन्हें सोंचना चाहिए की क्या उनका कत्लेआम पहले नही हुआ, बिहार, उत्तर प्रदेश और देश के कई अन्य भागों में मेरे अंदाज़ से अब तक 500 से ज्यादा साम्रदायिक दंगे हुए हैं जिनमे दंगे कम कत्लेआम ज्यादा थे. अब जरा रिकॉर्ड देखिये की सजा कितनों को हुई. हासिम पूरा का फैसला अभी बहुत पुराना नही हुआ है. ये सब तब हुआ जब बीजेपी सरकार में नही थी.
अब इस कौम को सोचना होगा कि कब तक किसी मसीहा का इंतजार किया जाये, कब अबाबील आयेंगी और आपके कातिलों का सामना करेंगी. अभी भी वक्त है कि आपने होकूक के लिए घरों से बाहर निकला जाए, निकला जाए कि अधिकार भीख में मांगने से नही मिलता, निकला जाये के अब नही निकले तो फिर निकलने के काबिल न रहेंगे, निकला जाये की इस दुनिया को अदल व इंसाफ की ज़रूरत है, निकला जाये कि अदलो इंसाफ के लिए अब लड़ना जरूरी है, निकला जाए की दुनिया को अगली पीढ़ी के लिए गुलज़ार बनाये रखना है. निकला जाए के अब इसके अलावा और कोई रास्ता नही है. आइये घरों से निकालिए अमन के लिए, इंसाफ के लिए, मुहब्बत के लिए, लोकतंत्र की हिफाज़त के लिए.

                                                        


Saturday, 30 July 2016

मूर्तिकार

एक मूर्तिकार को एक खूबसूरत पत्थर की चट्टान मिलीउसकी पारखी नज़र ने पत्थर को संभावना भरी नज़रो से नापा तौला और उसके चेहरे पर मुस्कान  तैरने लगी मूर्तिकार   ने  पत्थर   के   इस  टुकड़े  में कुछ  देख लिया था  जिसे वो दुनिया  के सामने लाना  चाहता थाउसको   बस   एक   ही  काम  आता था  ..उबड़  खाबड़ पत्थरों से मूर्तियां अनावृत्त करना।  वो  अपने  औजार  लेकर  काम में  जुट   गया।   दिन  पर   दिन  गुजरते   रहे  और   वह  अपने   औजारों   के  साथ   पत्थर  काटता रहा , पत्थर  धीरे धीरे  एक खूबसूरत  स्त्री  की मूर्ति  में तब्दील  होने  लगा।  कई साल लगे जब पत्थर का ये टुकड़ा एक खूबसूरत मूर्ति में तब्दील हुआ। मूर्तिकार हर पल बस अपनी इस कृति को निहारा करता.. ! मूर्ति ही  खूबसूरत कि जो  उसे  देखतादेखता   ही रह   जाता।  मूर्ति  की  कीर्ति  देवताओं  तक पहुंच  गयी  देवतागण  भी   मूर्ति देख  कर  प्रसन्न  हुए  और  मूर्तिकार की प्रशंसा करते हुए उससे वर मांगने को कहा...!  मूर्तिकार अपने ही कृति के प्रेम पड़ गया थाउसने देवताओं से कहा कि वे मूर्ति में जान  डाल दें ! देवताओं ने कहा कि कल सूर्योदय के साथ इसमें जान  जायेगीमूर्तिकार पूरी रात इस खुशी में सो  सका , सूर्योदय  के  पहले  ही  इस  चमत्कार  को  देखने  के  लिए  लोंगो  की  भीड़ इकट्ठी हो गयी। सूर्य की पहली  किरण  के  साथ ही  मूर्ति में  हरक़त शुरू  हुई और चंद  पलों में ही मूर्ति  की जगह एक सुन्दर  स्त्री खड़ी थी।  मूर्तिकार ने  स्त्री को गोद में  उठा लिया और  ख़ुशी से नाचने लगा   नई  नई  जन्मी  स्त्री ने चारों ओर कौतूहल से देखा फिर मूर्तिकार पर उसकी नज़रे ठहर गयी... जिसके चेहरे पर खिचड़ी दाढ़ी थीसिर पर चाँद दिखाई देने लगा था और चेहरे पर कुछ लकीरें उग आयीं थी। स्त्री मूर्तिकार की गोद से उतर गई और रंग बिरंगी दुनिया को कौतूहल से देखा और एक ओर चल पड़ी  मूर्तिकार ने कई बार उसे अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश की पर सब बेकार ... वो चली गयी  मूर्तिकार को शायद पता ही नही था की जिंदा मूरत अपनी नज़र से दुनिया को देखती है. आखिर  इस रंग  बिरंगी  दुनिया में एक मूर्तिकार ही तो नही हैं  !
... अब मूर्तिकार एक बेजान पत्थर की मूरत है जिसकी ओर कोई नहीं देखता