मेरे बच्चों,
तुम ये मत मान लेना कि
मनुष्य उड़ नही सकता बल्कि उड़ना कैसे होता है, इसे जानने की कोशिश करना फिर शायद तुम उड़ सको।
माँ, बाप, भाई, बहन, और रिश्तेदारों को पुकारना, पुकारना
भूत प्रेतों को , पुकारना जिन्न और फरिश्तों को, एक
हांक खुदा को भी लगाना। जो तुम्हारी आवाज़ का जवाब दे उसे मानना, जो
आवाज़ न दे उसे जानने और खोजने की कोशिश करना, इसके बाद भी जो न मिले उसे फिर हमेशा के लिए भूल
जाना। तुम फूलों से प्रेम करना और तितलियों के पीछे भागना मत भूलना। जिस दिन तुम
फूलों से प्रेम करना छोड़ दोगे उस दिन दुनिया से सौंदर्य गायब हो जायेगा, तितलियों
के पीछे नहीं भागे तो ये भी गायब हो जाएंगी और फिर गायब होगा इस धरती से जीवन।
तुम जान लेना कि चाँद एक
रेगिस्तान है, पहाड़
है, के कोई बुढ़िया वहां नही है, फिर
भी ये मत मानना के वो तुम्हारा मामा नही है, तुम जब भी उसे मामा कह कर पुकारोगे वो मोहब्बत
से अपनी बाहें तुम्हारे लिए फैला देगा और उसकी गोद में सूत कातती बुढ़िया नानी नज़र
आ जायेगी। इस तरह बड़े और समझदार होकर भी अपने भीतर थोड़ा सा बचपन और थोड़ी सी नासमझी
बचाये रखना। फिर शायद बचा रह जाये धरती का सौंदर्य और हँसता खिलखिलाता जीवन ।
(2)
मेरे बच्चों,
तुम सभी ने गीत तो गाया होगा न ! तुम्हे मालूम
है कि सृष्टि के कण कण में गीत बसा हुआ है. हैरानी हो रही है क्या ! एक काम करो, अगर तुम्हारे आस पास कोई नदी बहती है तो उसे ध्यान से देखना, जब नदी उबड़ खाबड़ पत्थरों के बीच से बहती हो तो उसे ध्यान से देखना और
सुनना. वो गीत गाती है कल कल कल कल की ध्वनि में. तुम इसे ध्यान से सुनोगे तो इस
गीत में खो जाओगे. अगर तुम समुन्दर के किनारे रहते हो या कभी वहां जाते हो तो
किनारों तक आती जाती लहरों की ध्वनि पर ध्यान लगाना, तुम्हे
उनमें एक सुन्दर गीत की अनुभूति होगी.
तुम सभी बारिस में तो भीगते हो न, मम्मी मना करती है इसके बावजूद भी, पर क्या कभी
बारिस के गीत भी सुने हैं, अब सुनना. बारिस कभी तेज़ तो
कभी धीमी होती है, और इसी के अनुरूप उसका गीत भी अलग
अलग स्वर लहरियां पैदा करता है. अगली बार जब बारिस में भीगों तो अपनी आँखे बंद
करके चेहरे को आसमान की ओर रखना और बाहें ऐसे फैला लेना जैसे आकाश से तुम्हारी ओर
कोई मिलने के लिया आ रहा हो, फिर बारिस के स्पर्श के
साथ उसके गीत को भी सुनना, तुम जरूर मंत्रमुग्ध हो
जाओगे. तुममे से कुछ लोग खेती भी करते होंगे, या अपने
माता पिता के साथ खेत में जाते होंगे. कभी खेत में तब जाओं जब गेहूं की फसल पूरी
तरह पक के तैयार हो, बस खेत की मेड पर बैठ जाओ, आंखे बंद कर लो और ध्यान से आसपास की ध्वनि को महसूस करो, तुम पाओगे कि जब हवा गेहूं की बालिओं से टकराती है तो एक संगीत पैदा होता
है. ऐसा ही तब भी होता है जब धान की बालियाँ पकी होतीं हैं और हवा के साथ मिलकर
लिपट-चिपटी करती हैं, इस तरह एक गीत, प्रकृति का गीत पैदा होता है. तुम प्रकृति के इन गीतों को तब भी सुनना जब
बड़े हो जाओ, समझदार हो जाओ, बड़ों
की दुनिया के तमाम काम करने लगो, अगर तुम ऐसा कर पाओगे, तो पाओगे की तुम्हारे भीतर सौन्दर्य का कोई सोंता अनवरत बह रहा है. सच
कहूँ, तो मैं ये कहना चाहता हूँ कि बड़े होकर भी खुद को
कभी बड़ा मत होने देना, फिर तुम देखना ये दुनिया ज़रा और
खूबसूरत हो जाएगी.
मेरे बच्चों,
प्रेम सृजन का आधार है, तुम्हारे माता-पिता ने एक दुसरे से अगाध प्रेम किया है यही कारण है कि वे
तुम्हारे जीवन में प्रेम की वर्षा कर पा रहे हैं. तुम भी प्रेम करो, सबसे पहले खुद से, फिर परिवार से, समाज से, देश और दुनिया से. मनुष्यों से प्रेम करो,
प्रेम करो अन्य प्राणियो से, वनस्पतिओं से,
नदी, तालाब और पहाड़ों से प्रेम करो. चाँद और
सितारों से प्रेम करो. तुम्हारा प्रेम सतत प्रवाहित रहना चाहिए. अगर तुम ऐसा कर
सको तो पूरी क़ायनात में नफ़रत के लिए जगह नही मिलेगी. फिर सब तरफ़ सब जगह प्रेम होगा,
आनंद होगा.
अब सोचो कि प्रेम करोगे कैसे ! ये बात समझना
जरूरी है. हमारे पास एक शारीर है. ये शारीर ही हमारा सबसे बड़ा दोस्त है और यही
हमारा सबसे बड़ा साधन है. तो जरूरी है कि ये शारीर स्वस्थ हो, शक्तिशाली हो और साफसुथरा भी. इसके लिए जरूरी है कि हम जो भोजन करते हैं
वो शक्ति देने वाला हो, स्वादिष्ट हो तो और भी अच्छा है,
लेकिन स्वादिष्ट न भी हो लेकिन शक्ति देने वाला हो तो ऐसा भोजन जरूर
करना चाहिए. हमारे भोजन में सब्जियां, दालें, मांस और मछली सभी का समावेश होना चाहिए. खाने के तुरंत पहले या तुरंत बाद
में तो पानी नही पीना चाहिए, लेकिन बाद में खूब पानी पीना
चाहिए. स्वस्थ शरीर के लिए खेलना और व्यायाम करना भी बहुत जरूरी है.
आपके शरीर में ही एक और चीज़ होती है जिसे मन
कहते हैं. इसका कोई रूप या आकार तो नहीं होता लेकिन ये अपने कार्यों से अपनी
मौजूदगी का एहसास कराता है. मन स्वभाव से चंचल होता है. इसकी चंचलता को कम करने के
लिए आपको प्रयास करना पड़ता है. इसके लिए अलग से कुछ करने कि जरूरत तो नही है लेकिन
जो कुछ भी आप करते हैं अगर उसे पूरी सजगता से करने लगें तो मन की चंचलता को कम
किया जा सकता है. उदाहरण के लिए आप स्नान करते हैं तो पूरी सजगता से इसे महसूस
कीजिये. शारीर पर पानी की शीतलता को और अपने भीतर उठने वाले मनोभावों को महसूस
करते हुए स्नान करें. शुरू में थोड़ी मुश्किल होगी, मन इधर उधर भटकेगा, लेकिन धीरे धीरे अभ्यास से इसमें आपको मज़ा आने लगेगा. ऐसे ही बाकी के काम
भी करें. जैसे मन की एकाग्रता बढ़ेगी आप पायंगे की आप लोगों से अब और प्रेम करने लगे
हैं, यही नही आपको ये भी लगेगा कि और लोग भी अब आपसे पहले से
ज्यादा प्रेम करते हैं. तो हो गयी ने खुद से प्रेम की शुरुआत ... बस ऐसे ही करते
जाइये !
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