Saturday, 12 November 2016

गुलशन फिर महकेगा

गुलशन फिर महकेगा

- डॉ सलमान अरशद

ये कहानी है फुटपाथ पर बिखरे एक परिवार की, ये कहानी है बर्बाद हो रहे बचपन की, ये कहानी है पल पल दम तोडती इंसानियत की, ये कहानी है उस सिस्टम के नाकामी की जिसमे लाखों घरों के खरीददार नहीं हैं लेकिन लाखों को घर नसीब नही होता. ये कहानी है उस विकास की जो हजारों लोगों से उनके जीने का हक़ छीन कर उन्हें सडकों पर मरने के लिए छोड़ देती है. इसके साथ ही ये कहानी है अँधेरे के गर्भ से पैदा होती हुई रौशनी की, ये कहानी है उम्मीद की, ये कहानी कहती है की सपने कभी नही मरते, उम्मीदों के लिए जगह हर हाल में बची रहती है. ये कहानी कहती है की अँधेरा चाहे जितना घना हो वो रौशनी को रोक नही सकती. ये कहानी कहती है कि ऐसे लोग हमेशा रहेंगे जो उम्मीदों की दुनिया को तबाह होने से ठीक पहले बचा ले जायंगे. ये कहानी कहती है कि ये मुश्किल दौर है फिर भी खूबसूरत दुनिया के ख्वाब देखे जा सकते हैं.
इस कहानी में एक 16 वर्षीय किशोर ने अपने बचपन से लेकर अब तक की ज़िन्दगी के बिखरे हुए टुकड़ों को इकठ्ठा करके हमारे सामने रखने की कोशिश की है. हमने आपके लिए उसे तरतीब दी है पढ़िए उसकी कहानी उसी की ज़बानी.
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कहने के लिए बाकि सभी लोगों की तरह मेरा भी एक परिवार है, कभी कभी मन भी करता है कि सबसे मिलूं, सबसे अपना प्यार साझा करूं, पर किसी के पास न जाता हूँ और न ही कोई मेरे पास आता है. परिवार, खानदान और रिश्तेदारों के सदस्यों में से कुछ की तश्वीरें अब धुंधली हो गईं हैं. मैं जो हूँ इसकी बुनियाद कहाँ से शुरू होती है, ये कहना मुश्किल है, फिर भी दादा तक की कुछ बातें मुझ तक मेरे पापा के ज़रिये पहुंची हैं, वही से बात शुरू करता हूँ.
मेरे दादा खाते पीते खानदान से रहे होंगे. उनके पास 52 बीघा खेत और भरा पूरा परिवार था. उनके दो बेटे और चार बेटियां थीं. इन्हीं में से एक मेरे पापा भी हैं.
दादा को कब और कैसे नशा करने की आदत पड़ गयी ये मुझे नहीं मालूम, ये भी नही मालूम कि वो किस चीज़ का नशा करते थे. हाँ इतना जरूर मालूम है कि इस नशे की वजह से उन्हें ज़मीन जायदाद सब से हाथ धोना पढ़ा और वो पूरे परिवार के साथ सड़क पर आ गये. यही से शुरू होता है परिवार के बिखरने और जीने के लिए जद्दोज़हद का दौर. परिवार के हर सदस्य का अब यही मकसद था कि दो वक्त कि रोटी इज्ज़त के साथ मिल जाये और इज्ज़त की रोटी की चाहत ने एक एक करके सभी को जद्दोज़हद करने पर मजबूर कर दिया. सभी लोग अपने अपने तरीके से रोटी कमाने में लग गये. दादा के अब नशे करने की औकात नही रही लिहाज़ा वो सुधर गये और अल्लाह मियां के घर में पनाह ले ली, यानि कि मस्जिद के इमाम बन गये. यही काम करते हुए उन्हें एक शरीफ आदमी की मौत नसीब हुई.
पापा एक बन्दूक की दुकान में काम करते थे. आते जाते रास्ते में एक खातून से देखा देखी शुरू हुई, देखा देखी जल्दी ही कसमे वादे प्यार मुहब्बत तक पहुच गयी. दोनों ही परिवार इनके रिश्ते के लिए तैयार नहीं थे लिहाज़ा इन्होने भाग कर शादी कर ली. पापा ने घर परिवार चलाने के लिए खूब मेहनत किया, कभी रिक्शा चलाया, कभी मजदूरी की तो कभी किसी कारखाने में काम किया. धीरे धीरे परिवार भी बढ़ता रहा. हम तीन भाई और एक बहन के साथ एक भरे पूरे परिवार के मालिक बने. जैसे तैसे हमारी गाड़ी चल रही थी. जब मैंने होश संभाला तो मामा ने हमे अपने कारखाने में रख लिया जिसमे ब्लेज़र बनते थे. मामा का परिवार पापा मम्मी से अभी तक नाराज़ था लेकिन हम लोगों से हमदर्दी भी थी. बात शायद 2004 की है, एक दिन जब मैं मामा के कारखाने में काम कर रहा था तो माँ के मरने कि खबर मिली. मम्मी लोगों से रिश्ते बना के चलती थीं और सब के दुःख दर्द में शामिल होतीं थी, एक रोज़, जब मकान मालिक के घर शादी होने वाली थी, मम्मी उनके घर काम में हाथ बटा रही थीं. पापा इस बात से नाराज़ हुए कि पहले घर का काम करो फिर किसी की मदद. दोनों में झगडा शायद ज़यादा बढ़ गया होगा. उसी रात मम्मी ने खुद पर तेल डाल कर आग लगा ली, अस्पताल में इलाज के दौरान उनकी मौत हो गयी. कहने के लिए तो मौत सिर्फ मम्मी की हुई थी लेकिन इसके साथ ही हम लोगो के लिए “परिवार” की मौत हुई थी, हमारी खुशिओं की मौत हुई थी और किसी हद तक हमारे सपने देखने की क़ूवत की मौत हुई थी.
भारतीय परिवारों में माएं परिवार की धुरी होती हैं, पूरा परिवार उन्ही के इर्द गिर्द घूमता रहता है. माँ कि मौत के बाद परिवार अहिस्ता अहिस्ता बिखरने लगा. पापा ने शराब पीना शुरू कर दिया जो अभी हॉल में शराब बंदी तक जारी था, आजकल शराब नही मिलता तो तम्बाकू से ही काम चलाते है.
परिवार के हालात तो पहले से ही ठीक नही थे लेकिन माँ की मौत के बाद हालात और तेज़ी से ख़राब होने लगे. कई महीनों के किराये के बकाये की वजह से एक दिन मकान मालिक ने हमें घर से निकाल दिया और गृहस्ती के नाम पर हमारे पास जो कुछ भी थोडा बहुत था उसे जब्त कर लिया. इस हालत में हम लोगों ने फुटपाथ को अपना आशियाना बनाया और गाँधी मैदान पटना में एक फुटपाथ पर रहने लगे. लगभग दो महीने फुटपाथ पर रहने के बाद पापा के दोस्त जिनका रिक्शा लेकर पापा चलाते थे, अपने घर में रहने की जगह दे दी. इनके खेत में ही घर था वहीं एक कोने में पापा ने भी एक झोपडी बना ली. यहाँ करीब एक साल तक रहना हुआ, एक बार तेज़ बारिस की वजह से खेत में इतना पानी भर गया कि हमे अपना आशियाना छोड़ना पड़ा, कोई और सहारा न देख हम लोग पटना रेलवे स्टेशन पर आ गये. क्या और कैसे किया जाये इसका कोई रास्ता दिखाई नही दे रहा था. पापा ने हम तीन भाइयों और एक बहन को स्टेशन पर छोड़ दिया और कुछ आर्थिक मदद की उम्मीद लेकर दादी के पास चले गये. दादी उस वक्त एक बुआ के घर पर रहती थीं और ये बुआ खुद बच्चों को पढ़ा कर अपना गुजारा करती थीं. पापा शाम तक नहीं लौटे तो मुझे लगा के जाकर देखना चाहिए कि क्या हुआ. अपने से छोटे भाई को एक भाई और बहन की जिम्मेदारी देकर मैं चला गया. जब मैं पापा की खोज में बुआ के घर पंहुचा तो पाया कि उन लोगों ने मकान बदल लिया है. वही मुझे एक आदमी मिला, उसने कहा कि वो मुझे दादी के पास पंहुचा देगा. मैं उसके साथ साथ चल दिया. वो मुझे लेकर त्रिपोलिया बाज़ार गया और वहां एक दूसरे खाते-पीते परिवार के हवाले कर दिया. मेरे बहुत रोने और परेशान होने के बावजूद उन्होंने मुझे नही छोड़ा. मेरे हालात जानने के बावजूद उन्हें मुझ पर दया नहीं आयी. यहाँ मैं घरेलू नौकर बन गया, एक ऐसा नौकर जो कैदी भी था. (अगर हम ध्यान से देखें तो पूरे देश दुनिया के कई हिस्सों में हमें ऐसे मासूम बच्चे जो क़ैदी भी हैं और नौकर भी. कैदी ऐसे कि जिन्होंने कोई गुनाह नही किया है. लेकिन सफेदपोश जो ऐसे बच्चों की ज़िन्दगी नरक बनाते हैं वो हमारे ही बीच शान से रहते हैं, बिना किसी भय के.)  दो महीना मैंने इस परिवार की गुलामी की और एक शाम यहां से भागने में कामयाब हुआ.
भाग कर एक बार फिर पटना स्टेशन पर आ गया. भाईयों व बहन की तलाश की, पापा के बारे में जानने की कोशिश की पर किसी का कुछ पता नही चला. स्टेशन मेरे जैसे बेघर बार बच्चों का घर ही है. जहाँ हम रोटी के एक-एक टुकड़े के लिए जान पर खेलते हैं, हमने लोगों के झूठन खाए, कचरे में से अनाज निकाल कर खाया. फेंकी गयी पानी की बोतलों में दुबारा पानी भर के 5-5 या 10-10 रूपये में बेचा, कचरा चुना और बेचा. बस किसी तरह जी रहा था. यहीं एक बुराई कब मेरे ज़िन्दगी का हिस्सा बन गयी पता ही नही चला. बाकि सभी बच्चों की तरह मैंने भी नशा करना शुरू कर दिया. व्हाइटनर और स्लूशन का इस्तेमाल करने लगा. आये दिन पुलिस पकडती, मारती-पीटती सुधरगृह ले जाती, जब वहां से छूटते तो फिर उसी पुरानी दुनिया में वापस आ जाते. इसी तरह स्टेशन पर कुछ साल गुज़र गये.
पापा से कैसे मिला ये आगे बताऊंगा, लेकिन ये जानते हैं कि मेरे स्टेशन से जाने के बाद क्या हुआ.
पापा दादी से मिलकर जब स्टेशन वापस आये तो मैं तो गायब था लेकिन दो भाईओं और बहन को वो अपने साथ लेकर नानी के घर गये. पापा की हालत देख कर सभी दुखी हुए, मामा के एक दोस्त जिनकी कोई औलाद नही थी, ने मेरे एक भाई को गोद लेने की ख्वाहिश का इज़हार किया. सबने आपस में मशवरा किया और सबसे छोटे भाई जिसकी उम्र लगभग पांच साल रही होगी, को उन्हें दे दिया गया. पापा एक भाई और एक बहन को लेकर पटना सिटी स्टेशन पर रहने लगे और रिक्शा चलाकर अपना गुज़ारा करने लगे. एक रोज़ बहन को प्यास लगी तो भाई उसके लिए पानी लेने गया जब वो पानी लेकर वापस आया तो देखा एक मर्द और एक औरत बहन को लेकर भाग गये, वो उनके पीछे भगा लेकिन वो स्कूटर पर बैठ कर भाग गये. इसी वक्त एक भिखारन ने भाई को पकड़ लिया, भिखारन के डरावने चेहरे से भाई इस कदर डर गया कि बोल न सका, उस वक्त उसकी उम्र यही कोई 7 साल के लगभग होगी. एक बार फिर पूरा परिवार एक-एक कर बिखर गया.
महीनों बाद ऐसे ही एक बार जब मैं सुधारगृह से निकला और स्टेशन के लिए चला तो पीछे से किसी ने भैया भैया पुकारा. देखा तो मेरा छोटा भाई था. उसके साथ एक भिखारन थी. भिखारन उसे अपना बेटा बताकर साथ ले जाना चाहती थी, उसने मुझे पुलिस का डर भी दिखाया, लेकिन हम दोनों भाई एक दुसरे को पहचान रहे थे और आसपास के लोगों ने भी साथ दिया, इसलिए मुझे मेरा भाई मिल गया. भिखारन भाई को लेकर पश्चिम बंगाल चली गयी थी, करीब सात महीने तक वो भाई के साथ इधर उधर घूमती रही पर उसने भाई को कोई तकलीफ नही दिया था.
भाई को लेकर एक बार फिर मैं पटना स्टेशन पर आ गया. जैसे तैसे ज़िन्दगी चल रही थी. एक बार जब मैं फिल्म देखने जा रहा था, रास्ते में पापा दिखाई पड़ गये. वो रिक्शे पर एक सवारी लेकर कहीं जा रहे थे. उन्हें पुकारा, वो रुके, हम लगभग दो साल बाद मिले थे. हम दोनों ही एक दुसरे से मिलकर बहुत खुश हुए. भाई मुझे पहले ही मिल चुका था. इस तरह आधा-अधूरा परिवार फिर साथ हुआ. पापा हमे अपने साथ लेकर फुटपाथ पर ही रहने लगे. लेकिन नशे की लत की वजह से मैं बार बार स्टेशन भाग आता था. पापा ने बालसखा के लोगों से हमारे लिए बात की. उन्होने हमारे सोने और खाने की व्यवस्था की. हम रोज़ वहाँ जाते खाते सोते और सुबह स्टेशन आ जाते. ये लोग साल में दो बार किसी खास स्थान पर हमें घुमाने भी ले जाते थे. 2007 से लेकर 2013 तक इस संस्था से जुड़ा रहा. इन्होने हमें सिलाई सिखाया और एक जगह काम पर भी लगा दिया. लेकिन मेरी नशे की लत मुझे कहीं रुकने न देती और मैं भाग कर स्टेशन आ जाता जहाँ मेरी नशे की लत पूरी होती थी. बालसखा के संजय भैया को लगा के सिलाई में मेरा मन नहीं लगता है तो उन्होंने अपने एक दोस्त जो इमेरजेंसी लाइट का कम करते थे, के पास काम पर रख दिया. यहाँ खाने सोने का इंतजाम था और सप्ताह में 100 रुपया जेब खर्च के लिए मिलता था. यहाँ काम में बहुत मेहनत करनी पड़ती थी और नशे की लत तो थी ही, इसलिए डेढ़ महीने में ही यहाँ से भी भाग निकला. संजय भैया डांटेंगे, इस डर से न तो उनसे मिला और न ही बालसखा वापस गया. बालसखा ने मेरे छोटे भाई को भीटी नेपाल भेज दिया जहाँ उसने सिलाई सीखी और अब वो बंगलौर में सिलाई करता है. उसे 8000 रूपये महीने मिलते हैं. नशे की लत मुझे कहीं भी ठहरने न देती थी और बार बार स्टेशन पर शरण लेने को मजबूर करती थी. इसी तरह भटकते हुए एक दिन मेरी मुलाकात रेनबो होम की नीलू और नीतू मम्मा से हो गयी और मैं रेनबो होम आ गया. नशे की लत छुड़ाने के लिए संस्था ने नशामुक्ति केंद्र में इलाज करवाया और फिर मेरी पढाई शुरू हुई. इस साल मैंने आठवी का एग्जाम दिया है. पापा पत्तल बनाने वाले कारखाने में काम करते हैं और वहीँ खाना खाकर सो जाते हैं. भाई बंगलौर में काम करता है, कभी कभी हम फोन पर एक दुसरे के साथ बात करते हैं. हम चाहकर भी कभी इकठ्ठा नही हो पाते क्योंकि हमारे पास घर नही है. मैं अपनी पढाई पूरी करके फैशन डिजाईनर बनना चाहता हूँ. मैं अपनी मेहनत से पैसा कमाऊंगा और एक घर बनाऊंगा जिसमे अपने भाई और पापा के साथ रहूँगा. इसके साथ ही रेनबो होम की मदद करूंगा ताकि मेरे जैसे और लोग भी फुटपाथ की ज़िन्दगी से आज़ादी हासिल कर सकें, ताकि कुछ और लोग मेरी तरह सपने देख सकें, ताकि कुछ और बिखरे परिवार एक हो सकें ताकि कुछ और लोगों को मोहब्बत की ज़िन्दगी नसीब हो सके.
ये कहानी एक किशोर की ही नहीं है बल्कि उन लाखों किशोरों की है जो वक्त और हालात की मार से बिखर जाते हैं, कुछ कभी एक दुसरे से मिल पाते हैं तो कुछ नहीं भी मिलते. ये मासूम किशोर आज भी अपनी बहन के लिए तड़पता है. वो कहाँ होगी, किस हाल में होगी, इसका तो अनुमान लगाना भी मुमकिन नही.
हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतन्त के रहवासी हैं, हम हमारे हुक्मरान चुनते हैं जो हम तक पहुँचने के लिए धन दौलत की कुर्सी पर बैठ कर धन दौलत की सड़क से चलते हुए वोट मांगने आते हैं और जीत कर हमारी ज़िन्दगी में कुछ और गरीबी, कुछ और बदहाली जोड़ जाते हैं, जिसके नतीजे में कुछ और परिवार इसी तरह बिखरने को मजबूर होते. लेकिन जब ये सब हो रहा होता है तो कुछ मुट्ठी भर लोग और अमीर हो जाते हैं उनका कुछ और विकास हो जाता है. 

क्या एक ऐसी दुनिया का सपना देखा जा सकता है जिसमे कोई परिवार फुटपाथ पर रहने को मजबूर न हो, किसी को अपना बच्चा सिर्फ इसलिए किसी और को न देना पड़े कि उसके पास अपने बच्चे को खिलाने के लिए रोटी नहीं है, कोई बेटी न मारी जाए न उठाई जाए. मैं ऐसे सपने देखता हूँ और जानता हूँ मेरी तरह बहुत से लोग ऐसे ही सपने देखते हैं. क्या आप और हम मिलकर ये सपना देख सकते हैं? 

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