Wednesday, 24 August 2022

कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष का सवाल और अशोक गहलौत

देश एक बड़े राजनीतिक संकट से गुज़र रहा है, इस संकट की बुनियाद में पूंजीवादी लूट को सहज और सुगम बनाने की साजिश है जिसे अमूमन सियासी बहसों से बाहर रखने की कोशिश की जाती है. कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष कौन बने और कौन भारतीय जनता पार्टी के एकाधिकारवादी रवैये का मुकाबला करे और कैसे करे, ये दोनों सवाल आपस में जुड़े हुए हैं.

कांग्रेस पार्टी को एक वंशवादी पार्टी कहा जाता है और ये अनुशंसा की जाती है कि गाँधी नेहरू परिवार को कांग्रेस की लीडरशिप से अलग हो जाना चाहिए, इससे कांग्रेस पार्टी का प्रदर्शन अच्छा होगा, क्या इस अनुशंसा में कोई दम है? इस पर आगे चर्चा करेंगे.

एक राजनीतिक दल क्या सिर्फ़ अपने संगठन और लीडरशिप की बदौलत किसी देश में हुकूमत करने की सलाहियत पैदा कर सकता है? क्या सियासी नज़रिए और सियासी प्रोग्राम का भी एक पार्टी की तरक्क़ी में कोई भूमिका है, इस पर भी विचार किया जायेगा.

गाँधी नेहरू परिवार से बाहर कई लोग हैं जिन्हें कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष बनाये जाने पर चर्चा हो रही है, इन चर्चाओं में राजस्थान के मुख्यमंत्री जनाब अशोक गहलौत साहब का नाम सबसे ऊपर है. इसलिए ये देखना ज़रूरी है कि आज के सियासी परिप्रेक्ष्य में अशोक गहलौत को कांग्रेस की कमान सौंपना सही फ़ैसला होगा या नहीं!

कांग्रेस पार्टी की आलोचना में ये बात अक्सर कही जाती है कि इसे गाँधी नेहरू परिवार से आज़ाद किया जाना चाहिए, या कि कांग्रेस पार्टी एक ही परिवार की जागीर बनकर रह गयी है. लेकिन ये आलोचना पक्षपातपूर्ण भी है. देश की सभी पार्टियों में कुछ ख़ानदानों के ही लोग मुख्य सियासत कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह के बाद उनके बेटे अखिलेश, राजद में लालू के बाद उनके बेटे तेजस्वी, इसी तरह दक्षिण की भी पार्टियों को देखा जा सकता है. ये तो वंशवाद की एक शक्ल है. वंशवाद की दूसरी शक्ल है जिसमें एक सांसद या विधायक की संतान अपने पिता के सहयोग से सियासत में करियर बनाती है. सभी पार्टियों के नेताओं को देखें, आप पाएंगे कि उनकी संतानों ने सियासत में जो मुकाम हासिल किया है वो अपने बल पर नहीं बल्कि अपने पिताओं के बल पर ही हासिल किया है. इसलिए ये तर्क कि बस नेहरू गाँधी परिवार को वंशवाद से दूर रहना चाहिए, नेहरू गाँधी परिवार के ख़िलाफ़ साजिश के सिवा और कुछ नहीं है.

वंशवाद को लेकर ये भी देखना ज़रूरी है कि क्या आम जनता को इससे कोई परेशानी है? अगर ऐसा होता तो सभी राजनेताओं की संतानें जनता का वोट हासिल कर सियासत में शानदार मुक़ाम हासिल नहीं कर पाती. इसलिए ऐसा लगता है कि नेहरू गाँधी परिवार को लेकर वंशवाद की बहस करने वाले कांग्रेस पार्टी के ही वो नेता हैं जिन्हें लगता है कि नेहरू गाँधी परिवार को रिप्लेस करके वो और उनका खानदान पार्टी पर कब्ज़ा कर सकता है.

इसके बावजूद वंशवाद है तो ग़लत ही, तमाम पार्टियों में काबिल और योग्य कार्यकर्ताओं को आगे बढ़ने का अवसर नहीं मिल पता क्योंकि बड़े नेता अपने ही संतानों को आगे बढ़ाने की कोशिश करते हैं. लेकिन इस बीमारी को पूरे राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखना होगा और देश के स्तर पर इस बहस को आगे बढ़ाना होगा, ताकि जनता तय करे कि उसे वंशवादियों को सपोर्ट करना है या नहीं, अकेले कांग्रेस के सन्दर्भ में इस बहस को उचित नहीं ठहराया जा सकता. इसके बावजूद भी क्या वंशवाद ख़त्म हो सकता है? दरअसल राजनीति अब सेवा नहीं व्यवसाय है. एक नोकरी करने वाला आदमी जीवन भर इतने पैसे नहीं जोड़ पाता है कि वो अपने लिए एक ढंग का मकान भी बना ले, लेकिन सांसद और विधायक अपनी आमदनी से हज़ार गुना ज़्यादा संपत्ति इकठ्ठा कर लेते हैं और उनसे जनता, मीडिया और सियासत कोई सवाल नहीं करता. ऐसे में हजारों करोड़ का लाभ देने वाले व्यवसाय को कोई अपनी संतान के बजाय किसी और को सौपेंगा, ये सोचना ही बेमानी है. हाँ, जिस दिन देश की जनता इस मुद्दे पर सोचने लगेगी, हालात बदल जायेंगे.

पिछले लगभग तीन दहाई का राजनीतिक इतिहास कांग्रेस के तेज़ी से डाउनफाल का इतिहास है. इस दौर की दो मुख्य धाराएँ हैं जिन पर विचार किये बिना कांग्रेस के डाउनफाल को नहीं समझा जा सकता. ये वही वक्त है जब देश में आर्थिक संकट बढ़ा है लेकिन कांग्रेस पार्टी इन हालात से निपटने का कोई माकूल तरीका इजाद नहीं कर पायी है, हलांकि उसके पास मनमोहन सिंह जैसे अर्थशास्त्री भी थे. ये वही दौर है जब जीवन से जुड़े मुद्दों पर बहस को दरकिनार करने के लिए जाति और धर्म के मुद्दे पर सियासत हुई और इसे जनता का व्यापक समर्थन मिला, आगे चलकर जाति आधारित सियासत को धर्म आधारित सियासत निगल गयी. साम्प्रदायिक सियासत को जन जन तक पहुँचाने में कॉर्पोरेट मीडिया ने भी भरपूर योगदान दिया. इस पूरे दौर में साम्प्रदायिकता के ज़रिये राजनीतिक धुर्वीकरण का मुकाबला करने का कोई तरीका कांग्रेस नहीं निकाल पाई. दरअसल कांग्रेस के दामन पर भी साम्प्रदायिक सियासत के दाग हैं जिन्हें मिटाने की उसने कोई कोशिश नहीं की बल्कि समय समय पर इस दाग को और गाढ़ा ही किया है ताकि लोग इसे देख सकें. इसके अलावा पिछले कुछ दशकों में जिस तेज़ी से बहुसंख्यक जनता का साम्प्रदायिक सियासत ने धुर्वीकरण किया है, उसने जहाँ भाजपा को फ़र्स से अर्स पर पहुँचाया वहीँ दूसरी पार्टियों से “चुनाव जिताऊ” मुद्दे भी छीन लिए.

हिन्दुव की सियासत को छोड़ दिया जाए तो दूसरी सभी पार्टियाँ तात्कालिक जीत को मद्देनज़र रखकर सियासत करती हैं, ऐसे में बहुसंख्यक तुष्टिकरण के मैदान में ही सभी खेलने लगते हैं, नतीजा सबके सामने है. उग्र हिंदुत्व के सामने कांग्रेस सहित सभी दूसरी पार्टियों का नर्म हिंदुत्व लगातार परास्त हो रहा है लेकिन इससे सबक लेने को कोई तैयार नहीं है.

आज कांग्रेस देश को जोड़ने के लिए बड़े पैमाने पर कार्यक्रम बना रही है, राहुल गाँधी देश के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पैदल यात्रा करने जा रहे हैं, लेकिन उन्होंने या उनकी पार्टी ने साम्प्रदायिक धुर्वीकरण और कॉर्पोरेट लूट के विरुद्ध कोई कार्यक्रम जनता से साझा नहीं किया है. ऐसे में कांग्रेस पार्टी का अध्यक्ष कोई भी हो देश पर उसका कोई असर नहीं पड़ेगा. नेहरू गाँधी परिवार कांग्रेस में रहे या पार्टी ही छोड़ दे, कांग्रेस की सेहत पर सकारात्मक असर नहीं पड़ेगा हाँ पार्टी ज़रूर बिखर जाएगी, क्योंकि तब पार्टी हथियाने के लिए कई नेता आपस में ही लड़ने लगेंगे.

अंतिम सवाल, क्या अशोक गहलौत कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बनकर कांग्रेस को प्रगति पथ पर ले जा सकेंगे? हलाँकि नीति और कार्यक्रम पर काम किये बिना सिर्फ़ नेता बदलने से बहुत ज्यदा फ़र्क नहीं पड़ता, बावजूद इसके किसी पार्टी का नेता पार्टी को दिशा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. उदहारण के लिए बिहार के सन्दर्भ में माना जाता है कि लालू यादव के जेल जाने से बिहार ही नहीं केंद्र की सियासत में भी भाजपा को आसानी हुई है और विपक्ष कमज़ोर हुआ है. इसलिए ये बहुत महत्वपूर्ण है पार्टी का नेता ऐसा हो जो तात्कालिक चुनौतियों का सामना भी करे और पार्टी को एकजुट रखकर निश्चित दिशा में आगे बढे. इन मापदंडों पर अशोक गहलौत साहब को देखा जाना चाहिए.

ये बात बहुत दिलचस्प है कि 1971 में जब अशोक गहलौत पर श्रीमती इंदिरा गाँधी की नज़र पड़ी तब वो बंगलादेशी शरणार्थियों की सेवा में लगे हुए थे, गहलौत साहब की सांगठनिक क्षमता ने श्रीमती गाँधी को बहुत प्रभावित किया था और इसी वजह से उन्होंने गहलौत साहब को NSUI का राज्याध्यक्ष बनाया था. इसके बाद वे लगातार सियासत में एक के बाद एक कामयाबी हासिल करते रहे, पार्टी में भी समय समय पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. बावजूद इसके पार्टी और पार्टी के बाहर से उन्हें चुनौतियाँ भी मिलीं लेकिन इनका उन्होंने बड़ी कामयाबी से  सामना किया, राजनीति एवं कूटनीति दोनों के इस्तेमाल में इन्होंने ख़ुद को साबित किया है.

हाल के दिनों में कांग्रेस पार्टी के भीतर सचिन पायलट की ओर से इन्हें ज़ोरदार चुनौती मिली है, जनता के भी एक खेमे की ओर से कहा जा रहा था कि गहलौत साहब को खुद सचिन जैसे युवा को नेतृत्व सौंप कर खुद उनका मार्गदर्शक बनना चाहिए, लेकिन गहलौत साहब न सिर्फ़ आज भी मुख्यमंत्री हैं बल्कि पार्टी में भी एकता बनाये रखने में सफल हुए हैं. गहलौत साहब के राजनीतिक जीवन को देखने से ये बात तो बिलकुल साफ़ है कि वे अच्छे संगठनकर्ता हैं और अपने विरोधियों से भी तालमेल मिलाकर चलना जानते हैं. लेकिन इन सबके बावजूद उनके प्रशासन पर कुछ दाग धब्बे भी हैं.

राजस्थान उन राज्यों में से है जहाँ दलितों में पर आये दिन जातिगत अत्याचार होते रहते हैं, भंवरी देवी के केस ने तो अन्तराष्ट्रीय स्तर पर सुर्खियाँ बटोरी थीं. लेकिन राज्य की सत्ता कांग्रेस के हाथ में हो या भाजपा के, दलितों के उत्पीड़न पर प्रशासन का रवैया एक जैसा रहता है. पानी का मटका छू लेने से एक बच्चे की पिटाई और परिणामस्वरूप उसकी मौत के मामले में भी गहलौत प्रशासन पर सवाल उठे हैं. इसी तरह कांग्रेस के ही दौरे हुकूमत में हिन्दू-मुसलमान दंगे हुए, (ऐसे हर दंगे में मुख्यतः मुसलमानों का ही जानमाल का नुकसान होता है, इसलिए इसे दंगा कहने के बजाय हमला कहना चाहिए, लेकिन ऐसे हर मामले को दंगा ही कहने का चलन है.) ऐसे मामलों में मुसलमानों के प्रति कांग्रेस प्रशासन का रवैया न्यायसंगत नहीं रहा है, पिछले साल की घटना जो पहलु खान के साथ घटित हुई, उस मामले में भी कांग्रेस के इस पुराने रवैये को देखा जा सकता है.

यानि देश के स्तर पर जो हालत कांग्रेस की है, यानि साफ्ट हिंदुत्व का दामन पकड़े हार्ड हिंदुत्व से पिटते रहना, गहलौत साहब भी उसी राह के राही हैं. इसलिए विचारधारात्कम तल पर अशोक गहलौत कांग्रेस पार्टी में कोई बदलाव कर पाएंगे, इसकी दूर दूर तक कोई संभावना नज़र नहीं आती. संगठनिक स्तर पर काम करते हुए उन्होंने अपने को बार बार साबित किया है, लेकिन जब वो राज्य से बाहर देश के स्तर पर नेतृत्व देंगे तब उनका मुक़ाबला सियासत के बड़े खिलाड़ियों से होगा, ऐसे में उनकी सांगठनिक क्षमता क्या रंग लाएगी, ये तो वक्त ही बताएगा.

देश की मुख्य सियासी पार्टी इस वक्त भाजपा है जिसके बहुत से बड़े नेता आरएसएस में लम्बे समय तक काम करने के बाद भाजपा में आये हैं, ये देश की जनता से सहजता से जुड़ते हैं, इनके पास अच्छी भाषा और आक्रामक शैली है, कई नेता ऐसे हैं जिनके पास अच्छी भाषा नहीं है लेकिन अपनी आक्रामक शैली से वो अपनी दूसरी कमियों को छुपा ले जाते हैं. दूसरी तरफ कांग्रेस के पास ऐसे नेता कम हैं जो भाजपा के उग्र सियासत का मुक़ाबला कर पायें, अशोक गहलौत को भी इनका सामना करना होगा. इस लिहाज़ से देखने पर गहलौत साहब भाजपा नेताओं से कमज़ोर नज़र आते हैं.

सियासी दलों में पार्टी के ताक़तवर नेताओं के प्रति वफ़ादारी भी एक बहुत बड़ा गुण माना जाता है, अभी सोशल मीडिया में एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें एक सांसद गृहमंत्री के जूते उठाकर उनके पैरों के पास रख रहा है. इस तरह के हरकत की कोई ज़रूरत नहीं है लेकिन सार्वजनिक रूप से एक सांसद का ऐसा करना पार्टी के ताक़तवर नेताओं की कृपा और पार्टी लोकतंत्र के बारे में बहुत कुछ कहता है. कांग्रेस पार्टी में भी कई नेता ऐसे हैं जिन्हें गाँधी परिवार के सदस्यों के प्रति वफ़ादार बताया जाता है, अशोक गहलौत साहब के बारे में माना जाता है कि वो सोनिया गाँधी के कृपा पात्र हैं, सच क्या है पता नहीं, पर ऐसा है तो ये उनकी ताक़त में इज़ाफा ही करेगा.

कुल मिलकर अशोक गहलौत की सांगठनिक क्षमता ही वो महत्वपूर्ण तत्व है जो उनके कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष बनने की सूरत में पार्टी के काम आ सकती है, हलांकि राष्ट्रीय स्तर पर उनकी ये क्षमता कितना कारगर साबित होगी, ये तो भविष्य ही बताएगा, लेकिन कांग्रेस पार्टी की चुनौतियों को देखते हुए ऐसा बिलकुल नहीं लगता कि अशोक गहलौत के आने से पार्टी को भीतर या बाहर से कोई बड़ा लाभ मिलेगा. बाकी सियासत अनिश्चितताओं का खेल है, किस बाल पर कब कौन छक्का जड़ दे कुछ कहा नहीं जा सकता.

 - डॉ. सलमान अरशद 

Tuesday, 23 August 2022

अडानी, NDTV और पत्रकारिता


NDTV की लगभग 29 प्रतिशत हिस्सेदारी अडानी समूह ने ख़रीद ली है, ख़रीदने के लिए जो तरीक़ा अपनाया गया, उसे फ़िलहाल ग़लत कहा जा रहा है, मुमकिन है मामला कोर्ट में जाये, ऐसा होने पर फैसला किसके पक्ष में होगा, इसका अनुमान आप लगा सकते हैं. ये भी भारतीय न्याय व्यवस्था का अद्भुत विकास है कि हाई प्रोफाइल केस के फ़ैसलों का आप अपने तौर पर अनुमान लगा लेते हैं, न्याय देने के मामले में पारदर्शिता का ये भी एक स्टेज़ है जिसका बहुत से लोग सम्मान करते हैं और जिससे बहुत से लोगों को सम्मान मिलता है.

NDTV बिक गया या बिक जाएगा, इन दोनों ही तरह की ख़बरों से सोशल मीडिया में अजीब सी प्रतिक्रिया होती है, कुछ लोग ऐसे खुश हो जाते हैं जैसे उनकी अपनी ज़िन्दगी में कुछ बहुत अच्छा हो गया है और इसके विपरीत कुछ लोग ऐसे दुखी हो जाते हैं जैसे उनकी आख़िरी उम्मीद का क़त्ल कर दिया गया. दरअसल ये दोनों ही तरह की प्रतिक्रियाएं हमारे समाज के बारे में बहुत कुछ कहती हैं. खुश होने वाले वो लोग हैं जो हर हाल में सत्ताधारी दल के साथ खड़े हैं, इनकी नोकरी चली जाये, इलाज के बिना घर में किसी की मौत हो जाये, बच्चों के लिए तालीम ख़रीदना इनकी औक़ात से बाहर की बात हो जाये, लेकिन सत्ताधारी दल के प्रति इनके प्रेम या यूँ कहें दीवानगी में कोई कमी नहीं आती.

इनके प्रेम का आधार न तो कोई उपलब्धि है और न ही ऐसी कोई उम्मीद जिसके पूरा होने पर इनके जीवन में कुछ अच्छा हो जायेगा, बल्कि एक धार्मिक समूह के प्रति इनकी नफ़रत ही इस प्रेम का आधार है, ये बड़ी अजीब बात है कि प्रेम का आधार नफ़रत हो. लेकिन जो लोग NDTV बिकने से दुखी हैं, उनके दुःख का कारण जेनुविन है, सूचना प्रसारण के सभी संसाधनों पर सत्ताधारी दल के समर्थक पूँजीपतियों के कब्ज़े के बाद NDTV और रवीश कुमार ‘निष्पक्ष या जनपक्ष’ सूचना के स्रोत बने हुए थे, अब ये इकलौता स्रोत भी जनता के विरुद्ध सत्ता के पक्ष में खड़ा हो जायेगा जैसा कि दूसरे चैनल कर रहे हैं या बंद हो जायेगा, लेकिन NDTV अपनी मौलिकता में तो अस्तित्व में नहीं रहेगा. हलांकि NDTV के अलावा रवीश कुमार स्वं में भी एक ब्रांड बन चुके हैं और वो जब तक NDTV में हैं उनसे वाबस्ता उम्मीदें ज़िन्दा रहेंगी.

अडानी समूह आज इतना अमीर हो चुका है कि वो चाहे तो देश के सारे मीडिया संस्थान खरीद सकता है, उन्हें अपने गुणगान में लगा सकता है या बंद भी कर सकता है, इससे उसके ऊपर कोई विशेष फ़र्क नहीं पड़ेगा, लेकिन देश की जनता एवं नागरिक के तौर पर क्या हमें ऐसे मीडिया संस्थानों की ज़रूरत है जिन पर सरकारों का कब्ज़ा न हो और जो जनता की भी सुनें !

इस सवाल पर मुझे यकीन है कि सबकी राय अलग अलग होगी, लेकिन सूचनाओं के महत्व पर ज़रूर सोचने की ज़रूरत है. अफ़सोस हमारे देश में अभी इस पर बहुत कम विचार हो रहा है जबकि आपके मोबाइल में ऐसे कम से कम 20 ऐप हैं जो आपकी सूचनाएँ “आपकी मर्जी” से हासिल कर रहे हैं और उन्हें अपनी मर्जी से बेच रहे हैं, इन्हें कौन और कितने कीमत में खरीद रहा है, ये तो पता नहीं, लेकिन इतना तो साफ़ है कि आज सूचनाओं का बहुत महत्व है, इनका इस्तेमाल किसी घातक हथियार से भी घातक हो सकता है और इसका उल्टा भी. सूचनाओं को ज्ञान निर्माण के एक टूल के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है और इस टूल को भोथरा करके ज्ञान निर्माण के मार्ग को अवरुद्ध भी किया जा सकता है, यही नहीं ज्ञान को अन्धविश्वास में भी बदला जा सकता है. सूचनाओं को कब्ज़ाने, उन्हें मनमाफ़िक ढालने और लक्षित लोगों को तक पहुँचाने में आज पहले के किसी भी समय से बहुत ज़्यादा ख़र्च किया जा रहा है.

ये सूचनाओं का ही इस्तेमाल है कि आज पीले चेहरे, आक्रोश से भरे और मरियल से दिखने वाले हथियारबंद नौजवान धर्म मिटाने और धर्म बचाने निकलते हैं, जबकि इनकी ज़रूरत एक अदद नोकरी और दो वक्त का ढंग का खाना है, लेकिन ये रोटी और रोज़ी के लिए नहीं बल्कि धर्म की रक्षा के लिए अपने ही जैसे दूसरे धार्मिक समूहों से लड़ते हैं. ये लड़ते हैं, लड़ते जाते हैं और अमीर इन्हें बेख़ौफ़ लूटते रहते हैं.

ये लूट इतनी व्यवस्थित है कि बैंकों का लगभग 38 अरब डॉलर एक राजदुलारे पूंजीपति के पास क़र्ज़ के रूप में पहुँच जाता है और इस पर कहीं कोई चर्चा नहीं होती, इतने रूपये से देश में एम्स के टक्कर के लगभग 140 अस्पताल खोले जा सकते हैं, यही नहीं पिछले लगभग 5 सालों में दस लाख करोड़ रूपया बट्टेखाते में चला गया है. सूचनाओं के विभिन्न स्रोतों पर कब्ज़ा इसी लिए ज़रूरी है कि राजसत्ता की मर्जी के बिना कोई सूचना आप तक न पहुँचे.

सूचनाओं से ही वो जनमत भी बनता है जो अपनी ज़रूरतों के आधार पर नहीं बल्कि धर्म और जाति के नाम पर उन्हें वोट देता है जो हत्या, बलात्कार जैसे अपराधों में शामिल होते हैं, लेकिन ये विडंबना ही है कि आज महिलाएं ही बलात्कारियों का टीका लगाकर स्वागत करती हैं.

रवीश कुमार के लिए फ़िक्रमंद लोग कह रहे हैं कि वो youtube पर आ जायेंगे और फिर लाखों लोग उन्हें सुनेंगे, बिलकुल ऐसा हो सकता है और इससे कम से कम रवीश कुमार या उनके जैसे लोगों को रोज़ी रोटी का कोई संकट नहीं होगा. लेकिन youtube क्या मीडिया संस्थानों का विकल्प हो सकता है! आप गौर कीजियेगा कि youtube पर भी जो लोग बोलते हैं वो भी अपना कंटेंट किसी प्रिंट मीडिया की दी हुई सूचनाओं के आधार पर ही तैयार करते हैं. अधिकांश यूट्यूबर अमूमन अकेले काम करते हैं, एक वीडियो बनाने के लिए अक्सर एक पूरा दिन लग जाता है और अगर कंटेंट ज़्यादा शोध की मांग करे तो कई दिन भी लग सकता है. ऐसे में youtube मीडिया संस्थानों का विकल्प नहीं हो सकता.

प्रिंट मीडिया का तो पूरा कांसेप्ट ही यही है कि पत्रकार सूचनाओं पर काफ़ी शोध करके उन्हें प्रिंट के तल पर लाते हैं. इस तरह के मीडिया संस्थान पत्रकारों और दूसरे कर्मियों को तनख्वाह देते हैं, जिसका खर्च विज्ञापन से निकाला जाता है. लेकिन पिछले लगभग 40 सालों में “सबसे तेज़” मार्का ख़बरों ने शोध के महत्व को नाकारा है, इसी तरह विज्ञापन रिश्वत में बदल गया और सूचनाओं की पवित्रता को भंग करने लगा. ये सब तब हो रहा था जब सूचना संसाधनों पर सत्ताएं सीधे क़ाबिज़ नहीं हो रही थीं. लेकिन अब वक्त बदल रहा है. राजसत्ता, पूँजी सत्ता और धर्म सत्ता ने मिलकर लूट की जो अन्धेरदर्दी मचाई है उसके लिए ज़रूरी है कि जनता तक “व्यवस्थित एवं सकारात्मक” सूचना ही पहुँचे, ये “देश हित” में है, “देश हित” से बड़ा कुछ भी नहीं, न लोकतंत्र, न जनमत, न न्याय और न आजादी. देश हित में NDTV बिकेगा, देश हित में देश के तमाम संस्थान बिकेंगे, देश हित में पूंजीपतियों की मर्जी से हुकूमत होगी और देश हित में लोग एक दूसरे का गला भी काटेंगे, देश हित ही आज सर्वोपरि है. हाँ कभी समय मिले तो ये ज़रूर जाँच लीजियेगा कि “देश” क्या है और कौन है और इसी तरह “हित” किसका सध रहा है.

-    डॉ. सलमान अरशद 

Sunday, 21 August 2022

सावरकर देशभक्त भी हैं और देशद्रोही भी


आज कल सावरकर ज़ेरे बहस हैं, एक समूह उनका महिमामंडन कर रहा है तो दूसरा उन्हें कायर, डरपोक और भारत की आज़ादी की लड़ाई का गद्दार समझता है. दरअसल भारत में इतिहास को बेहद भावुक अंदाज़ में लिखने, पढ़ने और डिस्कस करने का चलन है और ये इतिहासदृष्टि कत्तई नहीं है.

आज़ादी के आन्दोलन की मुख्यतः तीन धाराएँ थीं, एक धारा जिसका नेतृत्व कांग्रेस कर रही थी, उसका लक्ष्य अंग्रेज़ों को देश से निकालना और उनकी जगह भारतियों का शासन कायम करना था, इसमें ये बात भी निहित थी कि देश के संसाधनों का इस्तेमाल देश के विकास में होगा और ये विकास देशवासियों के श्रम और मेधा के ज़रिये होगा.

एक दूसरी धारा थी, जिसका कोई एक नेतृत्व तो नहीं था लेकिन भगत सिंह और उनके साथी तथा वामपंथी संगठन इस धारा के प्रतिनिधि थे. भगत सिंह और उनके साथियों का आन्दोलन बहुत आगे नहीं बढ़ा,  और वामपंथी संगठन भारतीय समाज की समझ और आन्दोलन की दिशा को लेकर कोई एक राय नहीं बना पाए, यही नही किसी रेडीमेड सेलेबस की चाह में वो सोवियत समाजवादी खेमे की तरफ़ भी देखते रहे. यही वजह थी कि 1942 में उन्होंने एक ऐसा स्टैंड लिया जिसके लिए कम्युनिस्ट विरोधी आज भी वामपंथियों को कोसते हैं. देश आज़ाद हुआ तो भी वामपंथी संगठन भारतीय समाज के विश्लेषण एवं आन्दोलन की दिशा को लेकर एक नहीं हो पाए, आज तो खैर वो दर्जनों खेमो में बंट चुके हैं.

एक तीसरी धारा थी जो भारत में हिन्दू राष्ट्र का निर्माण करना चाह रही थी, पिछली सदी के शुरू में ही इस धारा के लोगों ने समझ लिया था कि देश जल्दी ही आजाद हो जायेगा, इसलिए इस धारा के लोगों ने हिन्दुओं की एकता के लिए काम किया. जातीय आधार पर बंटे हिन्दू समाज को एक करना कठिन कार्य था, खासतौर पर जब संपत्ति एवं सम्मान पर सवर्ण हिन्दुओं का कब्ज़ा हो और शूद्र के हिस्से केवल श्रम हो, वो भी बिना किसी मानवीय गरिमा के, लेकिन इसका तोड़ निकाल लिया गया. हिंदुत्व की सियासत ने मुस्लिमों को दुश्मन घोषित किया और इस दुश्मनी का डर दिखाकर हिन्दू एकता की कोशिश करने लगे. (आज मुसलमान विरोधी हिन्दू एकता काफी हद तक मुकम्मल हो चुकी है) जब देश आज़ाद हुआ तो इस खेमे की ताक़त इतनी नहीं थी कि इनकी मर्जी का मुल्क बनता, ऐसे में देश वैसा बना जैसा कांग्रेस चाहती थी.

धर्म आधारित देश के निर्माण की एक कोशिश मुसलमानों की ओर से भी हुई, मुस्लिम लीग ने इसको लीड किया, चूँकि हिन्दुओं और मुस्लिमों दोनों का ही एक एक समूह ऐसी सियासत के लिए कोशिश कर रहा था, इसलिए दोनों में कुछ समानताएं भी थीं, जैसे दोनों कांग्रेस और कम्युनिस्ट को दुश्मन मानते थे, दोनों को राजाओं और नवाबों का समर्थन हासिल था, दोनों ही धर्म आधारित पुरातन मूल्यों वाला देश बनाना चाहते थे, यही कारण था कि दोनों ने एक दूसरे का समर्थन किया और एक साथ मिलकर सरकार भी बनाई और दंगे भी करवाए.

देश में हुए तमाम हिन्दू-मुसलमान दंगों का सञ्चालन दोनों ने मिलकर किया और इस तरह इन दो राजनीतिक समूहों की वजह से लगभग 10 लाख लोग मारे गये. दो धार्मिक समूहों की प्रतिद्वन्दात्मक सियासत में मारकाट की ऐसी मिसाल दुनिया में और कहीं शायद ही मिले, मुस्लिम लीग ने जिस देश का निर्माण किया वो पहले दो हिस्सों में बंटा और इस बंटवारे में एक बार फिर भरी मारकाट हुई, और देश के कुछ हिस्से आज भी अपनी अलग पहचान के लिए लड़ रहे हैं, यही नहीं पाकिस्तान में एक लोकतान्त्रिक निजाम आज तक मज़बूत नहीं हो पाया है. इसे भारतियों का सौभाग्य ही समझिये कि हिन्दुत्व की सियासत करने वालों को शुरू में सफ़लता नहीं मिली वरना भारत की हालत पाकिस्तान से भी बुरी होती, समाज जाति आधारित राजनीतिक व्यवस्था में वैसे ही बंट चुका होता जैसे कुछ सदी पहले था, ऐसा होने पर देश का जो विकास आज दिखाई दे रहा है वो नहीं होता।

बात सावरकर को लेकर शुरू हुई थी, क्या सावरकर को सीधे सपाट तरीके से अच्छा या बुरा कहा जा सकता है? इस सवाल का कोई एक ज़वाब नहीं हो सकता, हिन्दुत्व की सियासत को पसंद करने वाले के लिए सावरकर देशभक्त, वीर और स्वतंत्रता सेनानी हैं, जो लोग हिंदुत्व की सियासत को पसंद नहीं करते उनके लिए सावरकर कायर, डरपोक और देशद्रोही हैं. लेकिन बात इतनी साफ़ है नहीं. सावरकर एक समय देश की आज़ादी के लिए लड़े, इसलिए उन्हें स्वतंत्रता सेनानी कहने में कोई बुराई नहीं है, सावरकर इसी देश की आज़ादी के लिए लड़े, इसलिए उन्हें देशभक्त कहने में भी कोई बुराई नहीं है, लेकिन देखना होगा कि सावरकर जिस देश के लिए लड़े या जिस देश का उन्होंने सपना देखा, वो क्या था !

सावरकर का देश एक हिन्दू देश है, हिन्दू माने जाति आधारित समाज व्यवस्था, जिसमें श्रम तो शूद्र करेगा लेकिन उससे उत्पादित सम्पदा और सम्मान पर उसका नहीं सवर्ण का हक़ होगा, सवर्ण का अर्थ ब्राह्मण समझें क्योंकि हिन्दू धर्म में सर्वोच्च वही है. इसलिए हिन्दू राष्ट्र जब बनकर मुकम्मल होगा तो उसमें यही व्यवस्था लागू होगी और मनुस्मृति संविधान की जगह लेगा. इसलिए गुजरात में बिलकिस बानो के बलात्कारियों और उनकी बेटी के हत्यारों के साथ ब्राह्मण होने को आधार बनाकर जो हमदर्दी दिखाई गयी है, उसे आने वाले भविष्य की एक झलक समझना चाहिए.

सावरकर ने जब जाति प्रथा का विरोध किया, जब गाय के “माता” वाली अवधारणा का विरोध किया, जब बलात्कार को लड़ाई का टूल कहा, राष्ट्र को लेकर जो अवधारणात्मक बहसे की, उन सबके मूल में उनकी हिन्दू देश और हिन्दू राष्ट्र की जरूरतें थीं. महात्मा गाँधी की हत्या करना भी उनके हिन्दू राष्ट्र के निर्माण की दिशा में की गयी कारवाही ही थी. ये बात आपको अच्छी लगे या बुरी, लेकिन जब आप उनके सियासी ज़मीन पर खड़े होकर इसे देखेंगे तो ये आपको एक ज़रूरी राजनीतिक कार्यवाही नज़र आएगी.

आज अगर आप सावरकर की आलोचना और समीक्षा करने की कोई कोशिश करेंगे तो उनकी पूरी सियासी यात्रा को एक साथ लेना पड़ेगा और उनका मूल्यांकन उनकी सियासत के ही परिप्रेक्ष्य में करना होगा. आप एक सेक्युलर राष्ट्र की चाहत रखते हैं तो सावरकर आपके दुश्मन हैं, आप एक समाजवादी मुल्क की चाहत रखते हैं तो फिर सावरकर और पूरी भगवा पलटन ही नहीं कांग्रेसी भी आपकी दुश्मन है. लेकिन कांग्रेस किसी से खुल कर दुश्मनी नहीं कर पायी और न कर पायेगी क्योंकि उसे एक समावेशी राष्ट्र का निर्माण करना था, जो उदारवादी पूंजीवादी निजाम के तहत संचालित हो. बावजूद इसके कांग्रेसी हुकूमतों के दौर में हिन्दुत्व की सियासत फलती फूलती रही क्योंकि कांग्रेस लीडरशिप मुख्यतः सवर्ण हिन्दुओं के हाथ में थी जो हिन्दुत्व की सियासत के लिए सॉफ्ट थे और मुसलमानों के लिए द्वेष भी रखते थे.

सावरकर की राजनीतिक धारा पर चलने वालों का भी देश और राष्ट्र की अवधारणा अलग है, वो देश के लगभग 20 करोड़ मुसलमानों को देश मानने को तैयार नहीं हैं. उनकी यही धारणा इसाइयों के प्रति भी है. इसलिए हिन्दुत्व का देश, कांग्रेस का देश, वामपंथी का देश या मुस्लिम राष्ट्र की सोच रखने वालों का देश एक ही नही है. आप जब सावरकर जैसे किसी व्यक्तित्व की समीक्षा करेंगे तो दो बातें देखनी होंगी, एक ये कि आपकी राजनीतिक ज़मीन क्या है दूसरे जिसकी आलोचना या समीक्षा की जा रही है उसकी राजनीतिक ज़मीन क्या है. आज जो लोग सावरकर में हिन्दू राष्ट्र का पितामह देख रहे हैं उनकी राजनीतिक ज़मीन हिंदुत्व है और जो उन्हें गद्दार और देशद्रोही कह रहे हैं उनकी रजनीतिक ज़मीन उदारवादी पूंजीवाद या फिर वामपंथी सियासत है.

एक नागरिक के रूप में आपका हित हिन्दुत्व के राष्ट्र या देश में सुरक्षित है, लिबरल पूंजीवादी देश में सुरक्षित है (जो फ़िलहाल चल रहा है) या समाजवादी देश में सुरक्षित है, इसकी पड़ताल आपको करनी होगी, ये बहुत मुश्किल नहीं है, बस तीनों तरह के देशों की अवधारणा को समझ लीजिये और तय कीजिये कि आपके लिए कौन सा देश बेहतर है. बाकि इस बहस में कुछ नहीं रखा है कि सावरकर देशभक्त थे या देशद्रोही, मेरे विचार से वे दोनों थे और दोनों ही नहीं थे. आपको क्या होना है ये तय करना आज भी आपके हाथ में हैं.
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~ डॉ. सलमान अरशद 

Thursday, 18 August 2022

क्यों अजर अमर है भ्रष्टाचार?

 


देश और समाज को लेकर फ़िक्रमंद हर इन्सान भ्रष्टाचार को लेकर बहुत परेशान होता है, ये परेशानी जायज़ भी है. पिछले 20 सालों में देश से जितना पैसा लेकर अमीर लोग भागे हैं, उतने में मोटामोटी चार करोड़ लोगों को ठीक ठाक पक्के मकान बनाकर दिए जा सकते थे. ये तो भ्रष्टाचार के बड़े नमूने हैं, लेकिन भ्रष्टाचार कम या ज़्यादा पूरी दुनिया में आम जनजीवन का हिस्सा है. ज्ञात इतिहास में भारत का समाज कभी भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं रहा, हाँ इसके रूप बदलते रहे हैं. सदियों पहले जब समाज के एक छोटे से हिस्से ने बड़ी चालाकी से समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को सम्मान और सम्पदा से वंचित कर दिया, फिर इस अन्याय के पक्ष में धर्म शास्त्र गढ़े, तब एक ऐसा भ्रष्टाचार वजूद में आया जिससे सदियां लहू-लुहान हैं. इस भ्रष्टाचार की जो सबसे अनोखी बात है वो ये कि एक समूह को श्रम और उत्पादन का जिम्मा दिया गया और इसी समूह को सम्मान और सम्पदा से वंचित भी किया गया जबकि तथाकथित उच्च वर्ग ने सम्मान और सम्पदा तो हथिया ली लेकिन श्रम से खुद को दूर रक्खा. इस भ्रष्टाचार को हम जाति व्यवस्था के रूप में जानते हैं.

भ्रष्टाचार का ये रूप भारतीय समाज का अटूट हिस्सा है, भले ही कुछ लोगों का धर्म इसकी इजाज़त न देता हो. सदियों तक असमानता एवं अन्याय के माहौल में पले भारतीय लोगों के लिए बेईमानी या भ्रष्टाचार का ये रूप अब सहज लगने लगा है. कमल तो ये है कि जो इस समाज व्यवस्था से पीड़ित हैं, वो भी इसे छोड़ना नहीं चाहते बल्कि उनकी कोशिश होती है कि किसी तरह उनकी हैसियत भी पीड़क, दलक या सवर्ण जैसी हो जाये. इस लिए भ्रष्टाचार को भारत की नैतिकता भी सपोर्ट करती है और राजनीति भी. भारत जैसे देश में भ्रष्टाचार को ख़त्म करना बेहद कठिन है, कम से कम आज की सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में इसके मिटने की कोई संभावना नहीं है क्यूंकि भ्रष्टाचार आज के राजनीति एवं समाज व्यवस्था का अभिन्न अंग है.

बहुत से लोग जाति व्यवस्था को एक सामाजिक समस्या तो मानते हैं लेकिन इसे आर्थिक समस्या के रूप में बिलकुल भी देखना नहीं चाहते. आप एक छोटा सा प्रयोग करें, पिछले 30 सालों में भ्रष्टाचार के जितने मामले मीडिया में आये हैं, उनमें शामिल लोगों की जाति और धर्म पर नज़र डालें, खासतौर पर उस मामले के मुख्य लाभार्थी और उसके निटक सहयोगियों की, महज़ इतनी सी पड़ताल ऊपर कही गयी बातों की सत्यता प्रमाणित कर देगी, इसके बाद उनके राजनीतिक झुकाव को देखें, फिर ये भी देखें कि वो भारत के किस इलाके में रहते हैं, उस इलाके के लोगों के सामाजिक एवं धार्मिक व्यवहार का भी थोड़ा अध्ययन करें, आपको समझ में आएगा कि भारत के आर्थिक अपराधों से जाति व्यवस्था और इसकी ऐतिहासिकता का कोई सम्बन्ध है या नहीं !

जाति व्यवस्था में सम्मान एवं सम्पदा पर एक खास समूह ने कब्ज़ा कर लिया तो श्रम एवं उत्पादन का काम दूसरे समूह को दिया और इसे सामान्य मानवीय गरिमा तक से वंचित रखा. अब आप अतीत को लेकर कही गयी मेरी बात से सहमत न भी हों तो भी आज के समाज को देखिये. शासन, प्रशासन, न्याय-तंत्र एवं राजनीति आदि में उन पदों पर नज़र डालें जिनसे समाज में सम्पदा एवं प्रतिष्ठा मिलती है, अब देखें कि जो लोग इन पदों में पर बैठे हैं, उनकी जातीय एवं धार्मिक पृष्ठिभूमि क्या है !

इसी तरह श्रम के तमाम इलाकों की पड़ताल करें और देखें कि वहां काम करने वालों की जातीय एवं धार्मिक पृष्ठिभूमि क्या है! महज़ इतने से पड़ताल से आपको समझ में आयेगा कि सदियों पहले जाति व्यवस्था के रूप में “धर्म सम्मत भ्रष्टाचार” की जो नींव रक्खी गयी थी वो आज भी कितनी मज़बूत है! भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से से कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं क्यूंकि जातिव्यवस्था से समर्थित होने के कारण भ्रष्टाचार यहाँ ज़्यादा “स्वीकार्य” है.

न सिर्फ़ देश बल्कि दुनिया के सन्दर्भ में भ्रष्टाचार का रूट सदियों पहले निजी सम्पदा के उदय के साथ जुड़ता है. निजी सम्पदा ने दुनिया को बहुत कुछ दिया भी है, बल्कि दुनिया में क्रन्तिकारी बदलाव किये हैं, लेकिन पिछली लगभग पांच सदियों में निजी सम्पदा ने भ्रष्टाचार को पूरी दुनिया के लिए एक महामारी बना दिया है. दिक्क़त ये है कि भ्रष्टचार के इस रूप को देखना आसान नहीं है. दुनिया की तमाम महामारियां, आर्थिक संकट, ग़रीबी और इसके कारण होने वाली समस्याएं दरअसल भ्रष्टाचार के ही उत्पाद हैं, लेकिन आज के दुनिया की गणित इसे भ्रष्टाचार मानने या कहने के तर्क को ही भोथरा कर देती है.

आज का समाज कैसे भ्रष्टाचार के इर्द गिर्द चक्कर लगाता है कैसे समाज व्यक्ति को उसकी नैतिकता की हत्या के लिए मजबूर करता है, इसे समझने के लिए आम आदमी के जीवन को ही बारीकी से देखिये. आपको शिक्षा, सेहत, सम्मान और रोज़गार पाने के लिए बहुत सारे पैसे खर्च करने पड़ते हैं, पैसों के बिना इनमें से कुछ भी आज हासिल होने वाला नहीं है. इसके अलावा आज अगर आपके पास पैसा है तो कल भी रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है, यहाँ तक कि अब तो बैंकों में भी पैसों के बचे रहने की गारंटी नहीं रही. इस असुरक्षा ने जो असुरक्षाबोध पैदा किया है उससे ‘और ज़्यादा’ हासिल करने की ललक पैदा होती है, जाहिर सी बात है कि आम आदमी के पास जायज़ या नाजायज़ तरीक़े से सम्पदा अर्जित करने के अवसर बहुत ज़्यादा नहीं होते, नतीजे में वो ऑफिस में छोटे छोटे घूस लेता है, अपने दूसरे तमाम कामों में नाजायज़ तरीक़े से कुछ बचा लेने की कोशिश करता है, पर सोच कर देखें कि अगर असुरक्षाबोध के कारणों को ख़त्म कर दिया जाये तो क्या भ्रष्टाचार यथावत बना रहेगा !

दो पहलुओं पर कुछ और बातें कर लेते हैं. पूँजीपति कानूनी तरीक़े से व्यापार करते हुए भी करोड़ो रूपये लूट लेता है. मसलन वो कोई सामान 10 रूपये प्रति पीस एक देश से आयात करता है, उसे दूसरे देश में स्थित अपनी ही कम्पनी को 20 रूपये में बेच देता है फिर इस दूसरी कम्पनी से देश में स्थित अपनी कम्पनी में 50 रूपये में खरीद लेता है. सामान पहली कंपनी से सीधे इस तीसरी कंपनी के पास आता है, दूसरी के पास कभी जाता ही नहीं, इस तरह दुनिया भर में अनेकों लोग जनता को लूटते हैं. इसी उदहारण को देखें तो जो सामान लोगों को सौ ये इससे ज़्यादा में मिला उसकी वास्तविक कीमत 20 या 30 रूपये हो सकती थी. इसी तरह बैंकों के सबसे बड़े कर्ज़दार अगर दुनिया के अमीरतरीन लोग हैं तो ये अपने आप में हमारे और आपके जैसे लोगों के चौंकने के लिए काफ़ी है कि सबसे बड़े क़र्ज़दार और टॉप लेवल के अमीर के बीच कुछ तो लोचा है !

आइये थोड़ी बात सियासत की कर लेते हैं, आप किन्हीं 10 नेताओं को लीजिये जो कम से कम 10 या 20 साल से सियासत में हैं और सांसद या विधायक रहे हैं, साथ ही अगर ये सत्ताधारी पार्टी के मंत्री वगैरह रहे हों तो और बेहतर. अब पता कीजिये कि जब वो सियासत में आये थे तब उनकी संपत्ति कितनी थी और अब उनकी संपत्ति कितनी है, साथ ही इस बीच उनके आय के स्रोतों की भी पड़ताल कीजिये, ये गणित बहुत मुमकिन है आपको चौका देगी. इसी तरह बैंकों से क़र्ज़ लेने की प्रकिया, सत्ताधारी दल का इसमें सहयोग, क़र्ज़ लिए गये रूपये का कहाँ और कैसे इस्तेमाल हुआ, कैसे बहुत बड़ी रकम बट्टे खाते में गयी, आदि की भी पड़ताल करें, तो आपको समझ में आयेगा कि भ्रष्टाचार दरअसल समस्या नहीं व्यवस्था है.

संसद एवं विधानसभाओं के लिए निर्धारित चुनावी प्रक्रिया भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाये बिना पूरी ही नहीं हो सकती, ये तो हर किसी को पता है. अब सवाल पैदा होता है कि क्या भ्रष्टाचार का अंत भी मुमकिन है? थोड़े में कहा जाये तो पूंजीवादी आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में हुकूमत कोई भी करे, भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं हो सकता है, सच तो ये है कि ये व्यवस्थाएं भ्रष्टाचार के बिना चल ही नहीं सकतीं.

हाँ उत्पादन के उदेश्य को बदल दिया जाये, यानि लाभ के बजाय उत्पादन का आधार आवश्यकता हो, तो भ्रष्टाचार जिस समूह के लिए वजूद में आया है वो समूह ही ख़त्म हो जायेगा, इसके अलावा सतत सांस्कृतिक कार्यक्रम (शिक्षा, परिचर्चा, सेमिनार आदि) के ज़रिये लोगों के मानस को भी बदला जाये. लेकिन ये कार्यक्रम हो ही तब पायेंगे जब पहले राजीनीतिक क्रांति के ज़रिये मेहनतकश लोग सत्ता अपने हाथ में लें लें. जब तक ये नहीं होगा इसके होने के लिए तैयारी करने के अलावा और हम कुछ नहीं कर सकते.

 - डॉ. सलमान अरशद 

 

 

 

 

मुक्त मानसिक विकास, विचार एवं यथार्थ


हर वो जीव जिसे जीवन जीने के लिए किसी या कुछ ख़ास कौशलों की ज़रूरत होती है, उन्हें वो अपने वातावरण से सीखता है. मनुष्य जीव जगत में विशिष्ट है, उसने सभ्यता और संस्कृति पैदा की है, इससे मानव मनुष्य के मानसिक या चैतसिक विकास के लिए प्रायः दो अवधारणायें हैं, एक तो वास्तविकता है जबकि दूसरी सिर्फ़ आकांक्षा है जिसके वास्तिविकता में बदलने का कोई उपाय नहीं है. मनुष्य के मानसिक विकास को लेकर देश और दुनिया के कई विद्वानों की धारणा है कि उसे स्वतंत्र रूप से विकसित होने दिया जाए, इस विकास को किसी भी प्रकार निर्देशित न किया जाये. इस तरह का प्रयोग रवीन्द्रनाथ टैगोर ने शान्तिनिकेतन में किया था. दरअसल देखना ये है कि जिसे “स्वतंत्र वातावरण” कहा जाता है, क्या सच में वो स्वतंत्र होता है!

इसे समझने के लिए मानसिक विकास की दूसरी अवधारणा को भी समझना होगा. एक बच्चा अपने साथ कुछ जैविक गुण लेकर पैदा होता है, ये जैविक भी सिर्फ़ उसके लिए ही पूरी तरह से जैविक होते हैं, जबकि उसके पुरखों ने इसमें अपने वातावरण से सीखे गये कौशलों को भी मिश्रित किया होता है. इस तरह जिसे हम जैविक कहते हैं वो भी मनुष्य और वातावरण की अंतर्क्रिया से ही उत्पन्न हुआ होता है.

मनुष्य और कुछ दूसरे प्राणियों के बच्चे अपने वातावरण से अंतर्क्रिया करते हुए सीखते हैं. अगर इस वातावरण को सजगतापूर्वक नियोजित नहीं किया गया है तो इसे अमूमन “बच्चे का स्वतंत्र मानसिक विकास” कह दिया जाता है. इसके अलावा ये भी हो सकता है कि एक बच्चे के इर्द गिर्द विविधतापूर्ण वातावरण निर्मित किया जाये और बच्चा उनमें से अपनी रुचि के अनुसार स्थितियों, परिस्थितियों और चुनौतियों का चुनाव करे और उन्हीं के आधार पर उसका विकास हो. पश्चिम में ऐसे स्कूल बनाने की कई कोशिशें हुईं, जापान में भी हुईं और शान्तिनिकेतन को भी इसी तरह का प्रयास माना जाना चाहिए. आज ये तमाम प्रयोग अपनी मौलिकता खो चुके हैं, कुछ का अस्तित्व भी ख़त्म हो चुका है.

इन प्रयोगों पर दो तरह की टिप्पणी की जानी चाहिए, प्रथम, ये प्रयोग व्यावहारिक साबित नहीं हुए, और दूसरा, ये “स्वतंत्र विकास” भी स्वतंत्र न होकर नियोजित ही हैं. फर्क बस इतना है कि एक बच्चे के सामने वैविध्यपूर्ण परिस्थितियाँ सृजित कर दी गईं हैं. क्या इस तरह के नियोजित वातावरण में हुए विकास को सच में ‘स्वतंत्र’ कहा जा सकता है! प्रायः ऐसा करने वालों का उद्देश्य होता है कि एक बच्चे के मन पर किसी विशेष तरह का वैचारिक ढांचा न थोपा जाये. ये बात चाहे जितनी आदर्श लगे, लेकिन एक बात तो साफ़ है कि “वैविध्यपूर्ण वातावरण” भी एक तरह का ढांचा ही है, और अगर ये नियोजित ही है तो नियोजन को क्यों न सामाजिक, भावनात्मक और वैज्ञानिक रूप से ज़्यादा व्यवस्थित बनाया जाये !

जबसे शिक्षा का औपचारिक या अनौपचारिक रूप सामने आया है, एक बच्चे का मानसिक विकास एक नियंत्रित वातावरण में ही हो रहा है और मनुष्य के इस सम्बन्ध में समझ बढ़ने के साथ ही ये नियोजन ज़्यादा जटिल और उपादेय हुआ है. पूँजीवादी समाज एक बच्चे के विकास को सर्वाधिक नियंत्रित करता है. उसे कितने लोग किस तरह के कौशल से युक्त चाहिए, उसकी के हिसाब से वो उनके तालीम को नियोजित करता है. इसी तरह वो एक बच्चे के विकास का ढांचा और उन तक लोगों की पहुँच को भी सुनिश्चित करता है. यही कारण है कि समाज में आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक असमानता है, क्योंकि एक पूंजीवादी समाज की यही ज़रूरत है.

आपने गौर किया होगा कि जब कोई पार्टी बहुमत से हुकूमत बनाती है तो सबसे ज़्यादा बच्चों के तालीम को नियंत्रित करती है, तालीम तक कितने बच्चों की पहुँच सुनिश्चित करनी है, कितने लोगों को कैसी तालीम देनी है आदि आदि. तालीम को नितंत्रित करने में फासिस्ट हुकूमतें सबसे ज़्यादा मेहनत करती हैं, उनकी पूरी कोशिश होती है कि ज़्यादा से ज़्यादा लोग बस साक्षर हों, जो ठीक से तालीम हासिल कर भी लें, वो भी पुरातनपंथी हों, यही नहीं ऐसे ढांचे में वैज्ञानिक एवं डॉक्टर जो रात दिन विज्ञान एवं तकनीक के संपर्क में रहते हैं वो भी एक अशिक्षित जितने ही पुरातनपंथी होते हैं.

इसलिए एक बात तो बहुत साफ़ है कि “स्वतंत्र मानसिक विकास” सदासयता भले हो लेकिन वास्तविकता नहीं हो सकती, इसी तरह दुनिया भर में तालीम देने के जितने और जैसे भी संस्थान हैं, वो एक खास तरह के इन्सान गढ़ने के लिए तालीम को डिजाइन करते हैं. ये बात कहने सुनने में भले ही अच्छी या बुरी लगे, लेकिन सच तो यही है कि इन्सान पैदा होता ज़रूर है लेकिन व्यक्तित्व निर्मित किया जाता है. हाँ निर्मिती फैक्ट्री में कार जैसी नहीं होती इसलिए लोग व्यक्तित्व के तल पर भी अलग अलग दिखाई देते हैं.

अब अगर व्यक्तिव गढ़ा ही जाता है तो इस गढ़ने के उद्देश्य को ज़्यादा व्यापक और ज़्यादा उपादेय क्यूँ न बनाया जाये! दरअसल सत्ता जिसके हाथ में होती है वो अपने ‘लाभ’ के उद्देश्य से व्यक्तित्व विकास को डिजाइन करता है. इस ‘डिजाइन’ के दायरे में शिक्षण संस्थान, सामाजिक वातावरण, आर्थिक स्थिति, मीडिया के विषय आदि सभी आते हैं. इन सबके भीतर से गुज़र कर एक व्यक्तित्व निर्मित होता है. उदाहरण के लिए आज सामाजिक वातावरण धार्मिक वैमनस्य से बुरी तरह प्रभावित है, तालीम आर्थिक स्थिति से तय होना है, मीडिया साम्प्रदायिक वैमनस्य को बढ़ावा दे रही है, ऐसे में एक बच्चे को धर्म के आधार पर ‘नफ़रत न करने वाला’ बना पाना बेहद मुश्किल है खास तौर पर अगर माता-पिता भी जाति और मज़हब के नाम पर नफ़रत करने वाले हों. हाँ एक सजग माता-पिता राजसत्ता के तमाम चाहने के बावजूद किसी हद तक अपने बच्चों को “नफ़रत करने वाला” बनने से रोक सकते हैं.

अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले, एक आदर्श समाज की कल्पना करें, एक ऐसा समाज जिसमें सभी एक दूसरे से प्रेम करते हैं, कोई सामाजिक एवं आर्थिक असमानता नहीं है, किसी तरह की जेंडर असमानता भी नहीं है, सभी का जीवन आर्थिक, सामाजिक एवं स्वास्थ्य आदि के दृष्टिकोण से सुरक्षित है. अब ये आपको इटोपिया लग सकता है, लेकिन थोड़ी देर के लिए इसे सच मान लें. अब विचार करें, क्या बच्चों की परवरिश को इस तरह नियोजित किया जा सकता है जिससे वो बड़े होकर ऐसा समाज निर्मित करें और फिर उनके बच्चे इसी तरह के समाज में विकसित हों जिसका आधार मानवीय गरिमा हो?

मेरा विचार है कि हम ऐसा कर सकते हैं, इसके लिए ज़रूरी है कि राजसत्ता ऐसे लोगों के हाथ में हो जिनके लिए समाज का व्यापक हित ही सर्वोच्च आदर्श हो, ये कैसे होगा, इस पर सोचना चाहिए, लेकिन एक ऐसी राजसत्ता जिसका ये उद्देश्य होगा वही एक बच्चे के सर्वांगीण विकास का बुनियादी ढाँचा निर्मित कर सकती है, इससे पहले एक व्यक्ति के व्यक्तित्व का सम्पूर्ण विकास महज़ एक कल्पना होगी.

सार रूप में कहा जा सकता है कि ‘स्वतंत्र विकास’ की अवधारणा एक आदर्श भले हो ये वास्तविकता नहीं हो सकती, व्यक्तिव विकास के सभी तरह के ढांचे नियोजित ही होते हैं, अगर व्यक्तिव का विकास एक नियोजित ढांचे में ही हो रहा है तो क्यों न इस नियोजन को सर्वोत्तम बनाने के प्रयास किये जायें!

इस पर विचार कीजिये !

 

- डॉ. सलमान अरशद  

 

 

Sunday, 14 August 2022

सलमान रुश्दी पर हमला और भारतीय मुसलमान !

भारत में, ख़ासतौर पर उत्तर भारत के हिन्दी बेल्ट में एक फ़ैशन आम हो गया है, कुछ लोग चाहते हैं कि दुनिया में कहीं भी कोई मुसलमान बंदा कोई अपराध करे तो भारत के हर मुसलमान को उसके लिए शर्मिंदा होना चाहिए, उसे उस अपराध के लिए ज़वाबदेह होना चाहिए. यही नहीं ऐसे किसी भी अपराध की जड़ें तुरंत इस्लाम और मुसलमान के भीतर ढूढ़ना भी शुरू हो जाता है. कमाल ये है कि मुसलमानों से सवाल करने वालों में हिंदुत्व के समर्थक ही नहीं कांग्रेसी, उदारवादी और वामपंथी भी हैं.

भारत की मीडिया ख़ासतौर पर सोशल मीडिया इस तरह की घटनाओं के बहाने मुसलमानों पर हमले करती है और ये हमला अक्सर लम्बा चलता है. भारत की नाकामयाब हुकूमत के लिए ऐसे अवसर हमेशा ही बड़े मददगार होते हैं. बहरहाल, मीडिया और सोशल मीडिया में इस घटना के हवाले से मुसलमानों पर जो हमले हो रहे हैं, उसे समझने की कोशिश करते हैं. पहले कुछ सवाल जिनके इर्द गिर्द सोशल मीडिया में बहस हो रही है-

1.    जिस तरह एक मुसलमान बन्दे के अपराध के लिए देश भर के मुसलमानों से सवाल पूछे जाते हैं, इस्लाम पर सवाल उठाये जाते हैं, वैसा ही तब क्यूँ नहीं किया जाता जब ऐसे ही अपराध किसी और धर्म के व्यक्ति द्वारा कारित किया जाता है?

2.    क्या ये सच है कि इस्लाम में कोई सुधारवादी आन्दोलन नहीं हुआ और इस्लाम एक जड़ धर्म है जो छठवीं सदी से आगे कभी नहीं बढ़ा?

3.   क्या किसी धर्म को सुधार कर उसे आज के सन्दर्भ में स्वीकार्य बनाया जा सकता है और क्या ऐसे सुधार की सच में कोई ज़रूरत है?

4.    धर्म आधारित अतिवादी कार्यवाहियाँ पिछली सदी में ही दुनिया भर में क्यों बढ़ी, इससे पहले ऐसे आन्दोलन या कार्यवाहियां दिखाई क्यों नहीं देतीं?

इन सवालों पर तफ़सील से बात करेंगे, लेकिन उसके पहले एक सुझाव कि इस लेख में ऐसी बातें आयेंगी जिससे आपकी धार्मिक भावना आहत हो सकती है, इसलिए अगर आपकी धार्मिक भावना बेहद कमज़ोर है, तो बेहतर है कि इससे आगे आप न पढ़ें. बावजूद इसके अगर आगे पढ़ने का ज़ोखिम उठा ही रहे हैं तो पूरा पढ़ियेगा और पूरे लेख के आधार पर ही अपनी कोई राय बनाइएगा.  

आगे कुछ कहने से पहले मैं सलमान रुश्दी पर हुए इस हमले की निंदा करता हूँ, मीडिया रिपोर्टों की मानें तो हादी मातर (Hadi Matar) नाम के एक 24 वर्षीय युवक को इस हमले के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया है. किसी भी लेखक या किसी अन्य व्यक्ति से किसी की कोई असहमति है तो उसके लिए विरोध जताने के कई अहिंसक उपाय है, उन्हीं को अपनाया जाना चाहिए या ज़रूरत के मुताबिक़ कानूनी उपाय भी किये जा सकते हैं, कम से कम हत्या असहमति के मुद्दों के समाधान का कोई उपाय नहीं है.

पिछले सालों में भारत में 100 से ज़्यादा लिंचिग की घटनाएँ हुईं, मरने वालों में ज़्यादा संख्या मुसलमानों की थी, लेकिन हिन्दू अतिवादियों द्वारा मुसलमानों की इन हत्यायों के आधार पर हिन्दू समाज या हिन्दू धर्म पर किसी ने भी सवाल नहीं उठाया, यहाँ तक कि मुसलमानों के किसी तबके ने भी हिन्दू समाज या हिन्दू धर्म पर उस तरह सवाल खड़े नहीं किये, जिस तरह मुसलमानों पर किये जाते हैं. अभी हाल ही में जब उदयपुर में दो मुसलमान बन्दों ने एक हिन्दू दरजी की हत्या की थी तब भी यही हुआ था, लेकिन जब उनका संपर्क भारतीय जनता पार्टी से निकला तब भारतीय जनता पार्टी पर उसी तरह सवाल नहीं उठाया गया.

जो लोग देश का पैसा लेकर भाग गये, प्रायः वे सभी सवर्ण हिन्दू हैं, तो क्या इससे ये निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि सवर्ण हिन्दू देश के प्रति ग़द्दारी करता है या देश की सम्पदा चुराने वाला चोर होता है? इसी तरह देश का पैसा लेकर भागने वालों में ठीक ठाक तादात गुजराती हिन्दू सवर्णों की है, तो क्या कहा जा सकता है कि गुजराती चोर होते हैं? पाकिस्तान के लिए जासूसी करते हुए कुछ लोग पकड़े गये, ये सवर्ण हिन्दू थे, इसी तरह कुछ लोग ऐसे भी पकड़े गये जिनका सम्बन्ध एक हिन्दुवादी संगठन से था, तो क्या इस आधार पर इनके जातीय समूह या राजनीतिक संगठन को देश का गद्दार कहा जा सकता है? और क्या इस आधार पर हिन्दू धर्म और उसके ग्रंथों के समीक्षा एवं उनमें सुधार की मांग की जा सकती है? जाहिर सी बात है कि ऐसा हम नहीं कह सकते. लेकिन जब यही और ऐसे ही मामले का ताअल्लुक मुसलमानों से हो तो देश के हर तबके से यही मूर्खतापूर्ण मांग उठाई जाने लगती है.

कहा जा रहा है कि इस्लाम के भीतर ही ऐसे तत्व हैं जिनकी वजह से मुसलमान आतंकवादी बनता है. मैं यहाँ इस्लाम पर कोई बहस नहीं करूंगा, इस पर भी नहीं कि ऐसा कुछ इस्लाम में है या नहीं है. इसलिए नहीं कि मुझे इस्लाम को बहस से बचाना है, बल्कि इसलिए कि इसकी कोई ज़रूरत नहीं है. लेकिन मेरे ऐसा कहने की वजह क्या है, ये जरूर स्पष्ट करूँगा.

कोई भी धर्म, विचार, सिद्धांत या कानून अपने दौर की चुनौतियों का समाधान प्रस्तुत करता है, इसी तरह ऐसा धर्म, विचार या सिद्धांत एक खास सामाजिक, राजनीतिक एवं भौगोलिक पृष्ठिभूमि में पैदा होता है, उसके लिए वही सही वक़्त होता है, उससे पहले या उसके बाद वो पैदा नहीं हो सकता. अब वामपंथी और उदारवादी पूछते हैं कि तब फिर मुसलमान इस बात को क्यों नहीं मान लेता !

दरअसल, ये एक अहमकाना ज़िद है. हर व्यक्ति की चेतना का विकास उसके सामाजिक एवं राजनीतिक पृष्ठिभूमि और उसको मिलने वाली तालीम पर निर्भर करता है. इसलिए हर इंसान हर मुद्दे पर अलग अलग तरीक़े से सोचता है, हम ये ज़िद नहीं कर सकते कि कोई ख़ास इन्सान या समूह एक ख़ास तरीके से क्यूँ नहीं सोचता. इसी तरह शासक वर्ग भी नागरिकों के सोचने विचारने को नियंत्रित करता है. आज भारत की मीडिया दिन रात मुसलमानों के लिए जो ज़हर उगल रही है, उससे मुसलमान विरोधी नफ़रत पर आधारित जनमत निर्मित हो रहा है. उदाहरण के लिए, भारत में छठवीं सदी में ही मुसलमान व्यापार के लिए आ गये थे और कुछ केरल के इलाके में आबाद भी हो गये थे, मध्य काल ख़ासतौर पर भारत में मुसलमानों के आने का काल है. इस्लाम धर्म को मानने वाले मुसलमानों ने लगभग हज़ार साल तक भारत के एक बड़े भूभाग पर हुकूमत की, लेकिन हिन्दू और मुसलमानों के बीच धर्म के नाम पर किसी लड़ाई का कोई ज़िक्र इतिहास में नहीं मिलता.

19 वीं सदी में दलितों का दलक जातियों या कहें सवर्णों के ख़िलाफ़ और किसी हद तक हिन्दू धर्म की जाति व्यवस्था के खिलाफ़ आन्दोलन होता है, लेकिन 19 वीं सदी के आखिर में मुसलमानों के ख़िलाफ़ लड़ाई की शुरुआत होती है और दलितों का आन्दोलन कहीं दब जाता है. 1925 में आरएसएस का गठन होता है, हिन्दू महासभा नाम का संगठन बनता है और देश में हिन्दू बनाम मुसलमान की लड़ाई शुरू होती जिसमें कई लाख लोगों की जान जाती है. इसके विस्तार में जाना यहाँ संभव नहीं है, लेकिन आप विचार करें कि पिछली सदी में हिन्दू बनाम मुसलमान के नाम पर जो कुछ हुआ क्या उसका सम्बन्ध वेद, पुराण, उपनिषद या फिर क़ुरान या हदीस से है, बेशक ऐसा नहीं है, लेकिन आज यही स्थापित करने की कोशिश हो रही है.

कहा जा रहा है कि इस्लाम में कोई सुधारवादी आन्दोलन नहीं होता या कि इस्लाम में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं है. इस सवाल पर बात करने से पहले कुछ और बातों को समझना होगा. भौतिक जगत में हम सुधार पर नहीं अविष्कार पर ज़ोर देते हैं, अगर ऐसा न होता तो हम आज भी बैल गाड़ी या घोड़ा गाड़ी का इस्तेमाल कर रहे होते. सोचकर देखिये कि क्या बैलगाड़ी को सुधार कर उसे कार बनाया जा सकता है? आप इस विचार को ही मूर्खता कहेंगे. लेकिन जब धर्म आप से कहता है कि धरती चपटी है, के एक बन्दर ने सूरज निगल लिया था या एक इन्सान ने उंगली के इशारे से चाँद के दो टुकड़े कर दिए थे या कि कोई इन्सान मुंह, बाँह, जाघों या पैर से पैदा हुआ या एक इन्सान अणु और पहाड़ जैसे रूप में खुद को बदल सकता है, तब आप इसे न तो मूर्खता कहते हैं, न इस पर सवाल उठाते हैं और न ही इसे त्यागते हैं. ऐसा करने के पीछे दो वजहें हैं, या तो आप इन्हें सही मानते हैं या ग़लत मानने के बावजूद भी ग़लत नहीं कहते क्यूंकि इससे कुछ लोग नाराज़ हो जायेंगे और ऐसे नाराज़ लोग आपकी हत्या तक कर सकते हैं. 

भारत में उस तरह के धर्म कभी नहीं रहे जैसे अरब की धरती पर हुए, भारत में हमेशा ही विचारधारा के स्कूल्स थे जिसे किसी ख़ास इन्सान के नाम से जाना जाता था, योग दर्शन को आप पतांजलि के नाम से जानते हैं, संख्य दर्शन को कपिल मुनि के नाम से, वेदांत को शंकराचार्य के नाम से, इस तरह के स्कूल्स भारत में सदियों से रहे हैं और उनके बीच बहस होती रही है. इस तरह के माहौल से एक उदार समाज का जन्म स्वाभाविक ही था, बावजूद इसके समय समय पर यहाँ भी वैचारिक कट्टरता ने जन्म लिया. उदाहरण के लिए बौद्ध धर्म के मानने वालों को उनके जन्म स्थान से ही मिटा दिया गया, और ये कैसे हुआ इस पर इतिहास में बहुत कुछ लिखा गया है.

इसके विपरीत इसाई, यहूदी और इस्लाम जिस समाज में अस्तित्व में आये वो समाज भारत से बहुत अलग था बल्कि सभ्यता के पैमाने पर पिछड़ा भी था, भारत में आधुनिक धर्मों ने जहाँ सामंती समाज में आकार लिया वहीँ अरब के धर्मों ने कबीलाई समाज में आकार लिया. अगर आप भारत और अरब के धर्मों को उनकी पृष्ठिभूमि को समझे बिना समझने की कोशिश करेंगे तो वही गलतियाँ करेंगे जो हिंदुत्व की सियासत करने वाले भारत में करते हैं.

जो लोग कहते हैं कि अमुक समाज, धर्म, दर्शन आदि में कोई बदलाव नहीं आ रहा है, वो गोया ये कह रहे हैं कि अमुक समाज पत्थर हो गया है, हलांकि विज्ञान आज कह रहा है कि पत्थर भी स्थिर नहीं होते. दरअसल ये बदलाव दो तरह से हो रहे हैं. एक, लोग सिद्धांतों को पीछे छोड़ कर आगे निकल रहे हैं दूसरा लोग उनकी पुनर्व्याख्या कर नये रास्ते निकाल रहे हैं. जो लोग कह रहे हैं कि इस्लाम में कोई बदलाव नहीं हो रहा है, उन्हें इन दोनों तरह के बदलावों को देखना चाहिए. उदाहरण के लिए बरेलवी मुसलमान भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में पाए जाते हैं, दुनिया के दीगर इलाकों में भी ये यहीं से गये हैं, इस स्कूल ऑफ़ थाट्स की शुरुआत उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के अहमद राजा खान से हुई थी, इसी तरह सूफ़ी इस्लाम अरब, अफ्रीका, यूरोप तक फैला, आज इस्लाम के भीतर कई स्कूल्स ऑफ़ थाट्स हैं, क्या ये किसी सुधार के बिना सीधे आसमान से टपक गये हैं !

फिर से वही सवाल, क्या सुधार की सचमुच कोई ज़रूरत है और सुधार के बाद क्या सदियों पुराने विचार आधुनिक हो जायेंगे? भारत में देवदासी एवं जाति प्रथा के ख़िलाफ़ कानून बन गया, पर आज भी दोनों ही क़ायम हैं, अपवादों को छोड़ दिया जाये तो आज भी सभी शादियाँ जाति के आधार पर ही होती हैं. यही नहीं देश के सभी व्यवसाय या नोकरी जिससे सम्मान और सम्पदा का सम्बन्ध है, उन पर प्रायः हिन्दू सवर्णों का कब्ज़ा है और शारीरिक श्रम आधारित पेशे आज भी दलितों के जिम्मे हैं. तमाम सुधार सदियों पुराने इस कोढ़ को ख़त्म नहीं कर पाए. ऐसे में इस्लाम या किसी भी मज़हब या किसी भी सदियों पुराने विचार, सिद्धांत आदि में सुधार की मांग दरअसल क्रांति की मांग से भागने का एक ज़रिया है. जहाँ सुधार की सीमा ख़त्म होती है वहीँ क्रांति की ज़रूरत उपस्थित होती है.

अब अंतिम सवाल, धर्म आधारित अतिवादी कार्यवाहियाँ पिछली सदी में ही दुनिया भर में क्यों बढ़ी, इससे पहले ऐसे आन्दोलन या कार्यवाही क्यों दिखाई नहीं देते? भारत में पिछले लगभग 30 सालों में अतिवादी हिन्दुओं के हमले मुसलमानों पर बढ़े हैं और इसमें पिछले कुछ सालों में तेज़ी आयी है, इसी तरह कांग्रेस पार्टी के दौरे हुकूमत में P.A.C. के जवानों ने मुरादाबाद में लगभग चार सौ मुसलमानों को ईदगाह में गोलियों से भून दिया था, उस वक्त पिछड़ों के मसीहा माने जाने वाले वीपी सिंह साहब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे, इस तरह के हमले हसिमपुरा और मलियाना में हुए तो असम के नेल्ली में भी, 2002 के गुजरात नरसंहार तक मुसलमानों पर बहुत से हमले हुए और ज़्यादातर में अपराधियों पर कार्यवाही नहीं हुई. पिछली सदी में और ख़ासतौर पर 70 की दहाई से इस तरह के हमलों का तेज़ होना क्या किसी ख़ास आर्थिक एवं राजनीतिक घटनाक्रम की ओर इशारा नहीं करता? ये सवाल इस लिए भी ज़रूरी है कि लगभग इसी दौर में पूरी दुनिया में इस्लामिक इन्तेहापसंदी की एक लहर दिखाई देती है, जिसके ज़रिये जान भी मुसलमानों की ही ज़्यादा जाती है, मुसलमान और इस्लाम पर इस बहाने हमले होते हैं और दुनिया भर में इस्लामोफोबिया की इस लहर से कई तरह के राजनीतिक एवं आर्थिक लाभ यूरोप और अमेरिका द्वारा उठाने की कोशिश होती है. दूसरे आलमी जंग के बाद इस्लामोफोबिया खड़ा करना और पूरे अरब को अस्थिर करना, क्या आर्थिक लूट का कोई मामला है? इसी तरह भारत, म्यामार और श्रीलंका में इसी इस्लामोफोबिया के ज़रिये व्यापक आर्थिक लूट का आधार निर्मित किया जाता है. भारत में आज सियासत का मुख्य आधार ही इस्लामोफोबिया है.

यहाँ हमें ये देखना होगा कि दूसरे आलमी जंग में युद्ध सामग्री के उत्पादन के ज़रिये पूंजीपतियों ने खूब मुनाफ़ा कमाया, जब लड़ाई ख़त्म हुई तो FMCG के ज़रिये खूब मुनाफ़ा कमाया लेकिन 1970 आते आते दुनिया भर के बाज़ार मुनाफ़ा देने से इंकार करने लगे, ऐसे में ज़रूरी था कि दुनिया भर में ऐसी हुकूमतें क़ायम हों जो  पूंजीपतियों के मुनाफ़े के लिए उनके अनुकूल नीतियाँ बनायें और उन्हें ताक़त से लागू भी करें. जाहिर सी बात है कि ऐसे में जनविद्रोह के पैदा होने का ख़तरा पैदा होगा ही, इसका हल ढूढ़ा गया, लोगों को धर्म, नस्ल और भाषा के नाम पर लड़वाना शुरू कर दिया गया. आप देखेगे कि जैसे जैसे ये पूंजीवादी लूट बढ़ी है वैसे वैसे ही विभिन्न समुदायों को आपस में लड़वाना भी बढ़ा है.

जब लोगों के क़त्लेआम की बात आती है तो लोग एक साँस में हिटलर, स्टालिन और माओ का नाम ले लेते हैं, लेकिन आतंकवाद का टूल खड़ा करके जिसने इराक़, सीरिया, यमन और अफगानिस्तान को तबाह कर दिया, उसका नाम अमूमन नहीं लिया जाता. अमेरिकी हुक्मरानों ने दूसरे आलमी जंग के बाद एक करोड़ से भी ज़्यादा लोगों का क़त्ल किया है, क्या कभी किसी ने उनके धर्म और ईमान का परीक्षण किया? क्या ये सच नहीं है कि दुनिया भर के आतंकी संगठन मिल कर भी इतने लोगों का क़त्ल नहीं कर पाए हैं?

इस्लामोफिबिया के बिना क्या भारतीय जनता पार्टी की सरकार बन सकती थी? बिना भारतीय जनता पार्टी के क्या गौतम अडानी देश के सबसे बड़े कर्ज़दार होने के बावजूद दुनिया के टॉप पाँच अमीरों में शामिल हो सकते थे? अगर मुसलमानों के ख़िलाफ़ मीडिया रोज़ ज़हर न उगलती तो क्या महगाई, ग़रीबी, बेरोज़गारी और इलाज न करवा पाने की लाचारी में भारत की जनता बग़ावत न करती? और क्या हर मोर्चे पर नाकाम हुकूमत इस्लामोफोबिया के बिना एक के बाद एक चुनाव जीत पाती? इन सवालों पर सोचिये, इनके ज़वाब ढूढिये और फिर खुद से पूछिए कि क्या मुसलमान और इस्लाम सच में दुनिया के लिए समस्या हैं या इनके नाम पर दुनिया के मुट्ठी भर अमीर कुछ और कर रहे हैं !

जिन्हें जेहादी कहा जाता है या जिसे इस्लामिक आतंकवाद कहा जाता है वो दरअसल पूंजीवादी लूट को सुगम बनाने का एक टूल भर है, ऐसे में सलमान रुश्दी पर हमला किसी ने भी किया हो, असल हमलावर तो वो ताक़त है जो धर्म का इस्तेमाल दुनिया भर के लोगों के लूट के लिए कर रही है. देश और दुनिया की सम्पदा किसकी झोली में जा रही है, बस इस एक तथ्य की पड़ताल कर डालिए, हर तरह के आतंकवाद की परत दर परत आपके सामने खुलती चली जाएगी.

-सलमान अरशद

Tuesday, 9 August 2022

बिहार में राजनीतिक परिवर्तन और उसके मायने


बिहार में नितीश कुमार की सरकार गिर गयी है और ये लेख लिखे जाने तक अगली सरकार के गठन की रूपरेखा सामने नहीं आयी है, लेकिन इतना तो साफ़ है कि राष्ट्रीय जनता दल सहित अब तक जो पार्टियाँ विपक्ष में थीं, उनका समर्थन जद यु को मिलेगा.

बिहार में नितीश कुमार जी ने भाजपा का साथ क्यों छोड़ा, क्या विपक्षी दलों में कोई व्यापक एकता संभव है, क्या विपक्षी दल मिलकर भाजपा के सामने कोई मत्वपूर्ण चुनौती पेश कर पाएंगे, क्या देश की राजनीति जो एक दलीय धुर्वीकरण की ओर निरंतर बढ़ रही है, में कोई बड़ा बदलाव आएगा? इस लेख में इन्हीं प्रश्नों पर विचार किया जायेगा.

सबसे पहले तो यही समझने की कोशिश की जाए को नितीश कुमार को अपनी ही सरकार गिराने की ज़रूरत क्यों पड़ी? अगर आप भाजपा के पिछले लगभग 20 साल की सियासत पर गौर करें तो आप देखेंगे कि भारतीय जनता पार्टी जिस भी पार्टी से गठबंधन करती है, उस पार्टी को कमज़ोर कर देती है, ये काम वो दो तरह से करती है, पहला उसके जनाधार को अपने जनाधार में बदलती और पार्टी नेतृत्व को कई तरह से कमज़ोर कर देती है. यही नहीं पार्टी को अपने हाथ की कठपुतली तक बना दे देती है. उत्तर प्रदेश में बहुजन समाज पार्टी इसका सबसे बेहतर उदहारण है.

मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, छतीसगढ़ आदि प्रदेशों में भाजपा की इन कोशिशों को देखा जा सकता है. पिछले चनाव में बिहार में भी कई महत्वपूर्ण बदलाव आये. एक तो भाजपा गठबंधन की सरकार बेहद कम वोटों से जीती थी, आरोप तो यहाँ तक लगा कि ये जीत भी धांधली का नतीजा थी वरना राजद की सरकार बनती. लेकिन इस चुनाव के उपरांत भले ही नितीश कुमार सरकार के मुखिया बने लेकिन उनकी ताक़त कम हो गयी थी, पार्टी का प्रदर्शन अच्छा नहीं था. इसी तरह लोजपा का तो वजूद ही मिट गया था और फिर से चिराग पासवान सियासत में कोई मुकाम हासिल कर पाएंगे, इसकी संभावना भी लगभग ख़त्म हो गयी है.

इस बीच महाराष्ट्र की सरकार गिराने के बाद भाजपा के हौसले बुलंद थे, ख़बर तो ये भी है कि ये कहानी बिहार में दुहराए जाने की कोशिश हो रही थी. अगर ऐसा होता तो नितीश कुमार की सियासी ताक़त बहुत कम हो जाती, मुमकिन था कि उनका सियासी वजूद ही ख़त्म हो जाता. ऐसे में कहा जा सकता है कि भाजपा का साथ छोड़कर नितीश कुमार ने ख़ुद की सियासत को ज़िन्दा रखने और इसे बलंदी को ओर ले जाने के लिए ख़ुद को ही एक और अवसर दिया है.

ख़बर है कि राजद, कांग्रेस और वामपंथी दलों का समर्थन नितीश कुमार को मिलेगा. अगर ऐसा होता है तो कम से कम बिहार में इन पार्टियों को ख़ुद के और विस्तार का मौका मिलेगा. कहा जा सकता है कि नितीश कुमार के नेतृत्व में अगर सभी विपक्षी दल एक साथ आते हैं तो इससे बनने वाली हुकूमत इन सभी दलों के हित में होगी.

2024 के लोकसभा चुनाव से पहले देश के तमाम विपक्षी दलों के एक साथ आने की संभावना नज़र आ रही है. अगर देश के पैमाने पर तमाम सियासी दल दो खेमों में एकत्रित होते हैं तो ये कई तरह के राजनीतिक बदलाव का कारण बनेगा, लेकिन ऐसी एकता के आधार और संभावना पर विचार करने का भी यही सही वक़्त है.

इस वक्त भाजपा बेहद आक्रामक सियासत कर रही है. जो भी, सरकार, भारतीय जनता पार्टी और उसके नीतियों के ख़िलाफ़ है, उसके साथ भाजपा, उसकी सरकार और प्रशासन सख्ती से कार्यवाही करता है. सरकार विरोधी प्रदर्शनों में शामिल होने वाले मुसलमानों के घर गिराए गये तो दिल्ली दंगों के बहाने दर्जनों मुसलमानों को जेल भेजा गया, सिद्दीक कप्पन जैसे पत्रकार को लगभग दो साल से जेल में सड़ाया जा रहा है और लोअर कोर्ट से लेकर हाई कोर्ट तक उनको जमानत देने से इनकार कर रहे हैं. लोग हैरान हैं कि कहीं रिपोर्टिंग के लिए जाना अपराध कैसे हो गया ! दूसरी तरफ़ सुप्रीम कोर्ट तक से जैसे फैसले हो रहे हैं, उससे ऐसा प्रतीत हो रहा है जैसे ये फ़ैसले सरकार की मर्जी से दिए गये हों. हलांकि ये महज़ प्रतीति है लेकिन प्रशांत भूषण और कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट को लेकर जो चिंताएं व्यक्त की हैं, वो बहुत कुछ कहती हैं.

हाल ही में राहुल गाँधी ने भी कहा है कि ‘आप हमें संवैधानिक संस्थाओं पर नियंत्रण दे दीजिये फिर बताऊँ कि चुनाव कैसे जीते जाते हैं,’ यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गाँधी ने कहा कि भाजपा संवैधानिक संस्थाओं पर काबिज़ हो चुकी है. लेकिन जिस तरह चुनाव आयोग के हर कदम से भाजपा लाभान्वित होती रही है, जिस तरह CAG खामोश है, जिस तरह ED और CBI का विपक्षी दलों के नेताओं पर इस्तेमाल हो रहा है इससे एक बात तो साफ़ है कि संवैधानिक संस्थाएं स्वतंत्र रूप से काम नहीं कर रही हैं.

एक लोकतान्त्रिक देश में स्वतंत्र मीडिया का बहुत महत्व है, मीडिया लोकतंत्र का महत्वपूर्ण पिलर है, मीडिया के ज़रिये जनता की बात सरकार तक सरकार की बात जनता तक पहंचती है, लेकिन पिछले लगभग 20 सालों में मीडिया का रूप पूरी  तरह से बदल गया है, पहले मीडिया ने भाजपा के हित में काम करना शुरू किया फिर भाजपा सरकार का मुखपत्र बन कर काम करना शुरू किया, आज मीडिया में जनता के सवालों के लिए कोई जगह नहीं है, मीडिया भाजपा की सियासत के लिए ज़मीन तैयार करती है और इस ज़मीन को लगातार उर्वर बनाये रखने की कोशिश करती है. बिना मीडिया के विपक्षी दल एक होकर भी क्या भाजपा और उसकी सियासत को चुनौती दे पाएंगे, ये बहुत बड़ा प्रश्न है.

राजनीति कभी रहा होगा सेवा, आज ये एक व्यवसाय है. सोशल मीडिया अगर किसी पार्टी के हक़ में काम करती है तो उसके लिए पेमेंट लेती है, तमाम मीडिया घराने भी बिना भुगतान के काम नहीं करते, रैलियां करने के लिए भी करोड़ों में खर्च होता है. पार्टियों के लिए ये पैसा कॉर्पोरेट घरानों से आता है. पिछले कुछ सालों में ऐसे फंड सबसे ज़्यादा भाजपा को मिले हैं, चुनावी फंड के मामले में भाजपा किसी भी दूसरी पार्टी से मीलों आगे है, ऐसे में ये सवाल तो बनता है कि अकूत सम्पदा की मालिक भाजपा का मुकाबला विपक्षी दल कैसे करेंगे?

लड़ाई राजनीतिक हो या सामरिक, हमेशा विरोधी दल की ताक़त और कमज़ोरी का आकलन करके लड़ने की नीति बनाई जाती है. भाजपा की सबसे बड़ी ताक़त मुसलमान विरोधी नफ़रत पर आधारित साम्प्रदायिक राजनीति है जिसके कारण वो बड़े पैमाने पर हिन्दू वोटों का धुर्वीकरण करवा पाती है, लेकिन सबसे बड़ी कमज़ोरी ये है कि वो अपने सारे काम कॉर्पोरेट हित में करती है, अब तक जनता को जो थोड़ी बहुत सहूलियत सरकार से मिलती थी, वो सब धीरे धीरे छिनता जा रहा है. शिक्षा, सेहत और रोज़गार जैसे बेहद बुनियादी मुद्दों पर ये सरकार पूरी तरह फेल है. ऐसी सूरत में होना ये चाहिए था कि विपक्षी दल साम्प्रदायिक राजनीति के मुद्दे पर भाजपा को घेरते और एक ऐसा आर्थिक कार्यक्रम पेश करते जो भजपा की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों का ज़वाब होता.

अफ़सोस ये दोनों काम विपक्षी दलों ने अभी तक नहीं किया है और आगे ऐसा कुछ होगा इसकी कोई संभावना नज़र नहीं आती. सत्ता में हिस्सेदारी के उद्देश्य से अवसरवादी एकता के आधार पर भाजपा जैसी व्यवस्थित और आक्रामक पार्टी का मुकाबला किया जा सकेगा, ये सोचना दिवास्वप्न ही हो सकता है.

कॉर्पोरेट और मीडिया द्वारा उपेक्षित विपक्ष जो सरकारी एजेंसियों के निशाने पर भी है, अवसरवादी एकता से क्या देश की उम्मीदों को पूरा कर पायेगा? इस सवाल का ज़वाब भविष्य के गर्त में है लेकिन ज़वाब क्या होगा, इसका अनुमान तो आपको भी है. दरअसल भाजपा की सियासत जिस दिशा में जाती हुई नज़र आ रही है उससे ये तो अंदाज़ा लगता है कि देश का लोकतंत्र जो पहले से ही कमज़ोर है, उसको मिटना होगा, लोकतंत्र पर जिस तरह के हमले वर्तमान सरकार ने किये हैं, ये आज़ाद भारत में बिलकुल नया है. ऐसे में भाजपा की सियासत इसी तरह कामयाब होती रही तो देश में कोई विपक्ष नहीं बचेगा, शून्य विपक्ष वाली संसदीय सरकार किसी भी तरह एक तानाशाही हुकूमत से अलग नहीं होगी. इस लिहाज़ से देखा जाये तो गैर भाजपा दलों के वजूद पर भी गहरा संकट है और बिहार में कम से कम नितीश कुमार ने इस संकट को न सिर्फ़ पहचाना है बल्कि बचाव की दिशा में कदम भी उठाया है, लेकिन भाजपा की कमज़ोरी और उसकी ताकत के मद्देनज़र जब तक विपक्ष लड़ाई की योजना नहीं बनाता, उसका बचना मुश्किल है.

वस्तुगत परिस्थितियाँ ये हैं कि देश की जनता को धर्म का सवाल जितना अपील करता है उतना रोटी और शिक्षा का सवाल अपील नहीं करता, ये भी कहा जा सकता है कि देश के जितने बड़े समूह को रोटी से ज़्यादा ज़रूरी धर्म लगता है, उनकी संख्या इतनी तो है ही कि ये एक साथ आ जाएँ तो देश में सरकार बनवा सकते हैं. देश की पिछड़ी चेनता वाले इस समूह को संबोधित करने के लिए बुनियादी भाषा और मकसद संसदीय विपक्ष के पास नहीं है. इसके विपरीत हिन्दुत्व की राजनीति भले ही खोखली हो, देश के इस समूह को खूब अपील करती है.

आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती तो देश की वो आबादी है जिसके लिए धर्म और जाति जैसे पिछड़े मूल्य रोटी और शिक्षा से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं. आज़ाद भारत की हुकूमतों ने आम जनता को उस शिक्षा से ही महरूम रखा जो उनकी चेतना को विकसित करती, आज भारतीय जनता पार्टी की नीतियाँ जनता से शिक्षा के बचे खुचे ये संसाधन भी छीन रही हैं. देश के सामने जो दूसरी सबसे बड़ी चुनौती है वो ये कि इतने बड़े देश में ऐसा कोई राजनीतिक दल नहीं है जो भाजपा की कॉर्पोरेटपरस्त नीतियों के ज़वाब में जनसरोकार पर आधारित नीतियाँ प्रस्तुत करता और जनता को इसके लिए गोलबंद करता. इसलिए बिहार में जो कुछ हुआ या 2024 से पहले कई और राज्यों में जहाँ ऐसा होने की संभावना है, इससे जनता के हित में कोई बड़ा बदलाव होगा, इसकी उम्मीद तो नहीं है, और किसी वजह से भाजपा की जगह अगर किसी और पार्टी की सरकार केंद्र में बन भी जाती है (जिसकी संभावना बिलकुल भी नहीं है) तो भी आम जनता के जीवन में कोई बदलाव नहीं आयेगा. जिस राजनीति से देश और देश की जनता का जीवन बदलेगा, उसका शुरू होना अभी बाकी है.  

- डॉ. सलमान अरशद