देश और समाज को लेकर फ़िक्रमंद हर इन्सान भ्रष्टाचार को लेकर बहुत परेशान होता है, ये परेशानी जायज़ भी है. पिछले 20 सालों में देश से जितना पैसा लेकर अमीर लोग भागे हैं, उतने में मोटामोटी चार करोड़ लोगों को ठीक ठाक पक्के मकान बनाकर दिए जा सकते थे. ये तो भ्रष्टाचार के बड़े नमूने हैं, लेकिन भ्रष्टाचार कम या ज़्यादा पूरी दुनिया में आम जनजीवन का हिस्सा है. ज्ञात इतिहास में भारत का समाज कभी भी भ्रष्टाचार से मुक्त नहीं रहा, हाँ इसके रूप बदलते रहे हैं. सदियों पहले जब समाज के एक छोटे से हिस्से ने बड़ी चालाकी से समाज के एक बहुत बड़े हिस्से को सम्मान और सम्पदा से वंचित कर दिया, फिर इस अन्याय के पक्ष में धर्म शास्त्र गढ़े, तब एक ऐसा भ्रष्टाचार वजूद में आया जिससे सदियां लहू-लुहान हैं. इस भ्रष्टाचार की जो सबसे अनोखी बात है वो ये कि एक समूह को श्रम और उत्पादन का जिम्मा दिया गया और इसी समूह को सम्मान और सम्पदा से वंचित भी किया गया जबकि तथाकथित उच्च वर्ग ने सम्मान और सम्पदा तो हथिया ली लेकिन श्रम से खुद को दूर रक्खा. इस भ्रष्टाचार को हम जाति व्यवस्था के रूप में जानते हैं.
भ्रष्टाचार का ये रूप भारतीय समाज का अटूट हिस्सा है, भले ही कुछ लोगों का धर्म इसकी इजाज़त न देता हो. सदियों तक असमानता एवं अन्याय के माहौल में पले भारतीय लोगों के लिए बेईमानी या भ्रष्टाचार का ये रूप अब सहज लगने लगा है. कमल तो ये है कि जो इस समाज व्यवस्था से पीड़ित हैं, वो भी इसे छोड़ना नहीं चाहते बल्कि उनकी कोशिश होती है कि किसी तरह उनकी हैसियत भी पीड़क, दलक या सवर्ण जैसी हो जाये. इस लिए भ्रष्टाचार को भारत की नैतिकता भी सपोर्ट करती है और राजनीति भी. भारत जैसे देश में भ्रष्टाचार को ख़त्म करना बेहद कठिन है, कम से कम आज की सामाजिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में इसके मिटने की कोई संभावना नहीं है क्यूंकि भ्रष्टाचार आज के राजनीति एवं समाज व्यवस्था का अभिन्न अंग है.
बहुत से लोग जाति व्यवस्था को एक सामाजिक समस्या तो मानते हैं लेकिन इसे आर्थिक समस्या के रूप में बिलकुल भी देखना नहीं चाहते. आप एक छोटा सा प्रयोग करें, पिछले 30 सालों में भ्रष्टाचार के जितने मामले मीडिया में आये हैं, उनमें शामिल लोगों की जाति और धर्म पर नज़र डालें, खासतौर पर उस मामले के मुख्य लाभार्थी और उसके निटक सहयोगियों की, महज़ इतनी सी पड़ताल ऊपर कही गयी बातों की सत्यता प्रमाणित कर देगी, इसके बाद उनके राजनीतिक झुकाव को देखें, फिर ये भी देखें कि वो भारत के किस इलाके में रहते हैं, उस इलाके के लोगों के सामाजिक एवं धार्मिक व्यवहार का भी थोड़ा अध्ययन करें, आपको समझ में आएगा कि भारत के आर्थिक अपराधों से जाति व्यवस्था और इसकी ऐतिहासिकता का कोई सम्बन्ध है या नहीं !
जाति व्यवस्था में सम्मान एवं सम्पदा पर एक खास समूह ने कब्ज़ा कर लिया तो श्रम एवं उत्पादन का काम दूसरे समूह को दिया और इसे सामान्य मानवीय गरिमा तक से वंचित रखा. अब आप अतीत को लेकर कही गयी मेरी बात से सहमत न भी हों तो भी आज के समाज को देखिये. शासन, प्रशासन, न्याय-तंत्र एवं राजनीति आदि में उन पदों पर नज़र डालें जिनसे समाज में सम्पदा एवं प्रतिष्ठा मिलती है, अब देखें कि जो लोग इन पदों में पर बैठे हैं, उनकी जातीय एवं धार्मिक पृष्ठिभूमि क्या है !
इसी तरह श्रम के तमाम इलाकों की पड़ताल करें और देखें कि वहां काम करने वालों की जातीय एवं धार्मिक पृष्ठिभूमि क्या है! महज़ इतने से पड़ताल से आपको समझ में आयेगा कि सदियों पहले जाति व्यवस्था के रूप में “धर्म सम्मत भ्रष्टाचार” की जो नींव रक्खी गयी थी वो आज भी कितनी मज़बूत है! भारत में व्याप्त भ्रष्टाचार की जड़ें दुनिया के किसी भी दूसरे हिस्से से कहीं ज़्यादा मज़बूत हैं क्यूंकि जातिव्यवस्था से समर्थित होने के कारण भ्रष्टाचार यहाँ ज़्यादा “स्वीकार्य” है.
न सिर्फ़ देश बल्कि दुनिया के सन्दर्भ में भ्रष्टाचार का रूट सदियों पहले निजी सम्पदा के उदय के साथ जुड़ता है. निजी सम्पदा ने दुनिया को बहुत कुछ दिया भी है, बल्कि दुनिया में क्रन्तिकारी बदलाव किये हैं, लेकिन पिछली लगभग पांच सदियों में निजी सम्पदा ने भ्रष्टाचार को पूरी दुनिया के लिए एक महामारी बना दिया है. दिक्क़त ये है कि भ्रष्टचार के इस रूप को देखना आसान नहीं है. दुनिया की तमाम महामारियां, आर्थिक संकट, ग़रीबी और इसके कारण होने वाली समस्याएं दरअसल भ्रष्टाचार के ही उत्पाद हैं, लेकिन आज के दुनिया की गणित इसे भ्रष्टाचार मानने या कहने के तर्क को ही भोथरा कर देती है.
आज का समाज कैसे भ्रष्टाचार के इर्द गिर्द चक्कर लगाता है कैसे समाज व्यक्ति को उसकी नैतिकता की हत्या के लिए मजबूर करता है, इसे समझने के लिए आम आदमी के जीवन को ही बारीकी से देखिये. आपको शिक्षा, सेहत, सम्मान और रोज़गार पाने के लिए बहुत सारे पैसे खर्च करने पड़ते हैं, पैसों के बिना इनमें से कुछ भी आज हासिल होने वाला नहीं है. इसके अलावा आज अगर आपके पास पैसा है तो कल भी रहेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है, यहाँ तक कि अब तो बैंकों में भी पैसों के बचे रहने की गारंटी नहीं रही. इस असुरक्षा ने जो असुरक्षाबोध पैदा किया है उससे ‘और ज़्यादा’ हासिल करने की ललक पैदा होती है, जाहिर सी बात है कि आम आदमी के पास जायज़ या नाजायज़ तरीक़े से सम्पदा अर्जित करने के अवसर बहुत ज़्यादा नहीं होते, नतीजे में वो ऑफिस में छोटे छोटे घूस लेता है, अपने दूसरे तमाम कामों में नाजायज़ तरीक़े से कुछ बचा लेने की कोशिश करता है, पर सोच कर देखें कि अगर असुरक्षाबोध के कारणों को ख़त्म कर दिया जाये तो क्या भ्रष्टाचार यथावत बना रहेगा !
दो पहलुओं पर कुछ और बातें कर लेते हैं. पूँजीपति कानूनी तरीक़े से व्यापार करते हुए भी करोड़ो रूपये लूट लेता है. मसलन वो कोई सामान 10 रूपये प्रति पीस एक देश से आयात करता है, उसे दूसरे देश में स्थित अपनी ही कम्पनी को 20 रूपये में बेच देता है फिर इस दूसरी कम्पनी से देश में स्थित अपनी कम्पनी में 50 रूपये में खरीद लेता है. सामान पहली कंपनी से सीधे इस तीसरी कंपनी के पास आता है, दूसरी के पास कभी जाता ही नहीं, इस तरह दुनिया भर में अनेकों लोग जनता को लूटते हैं. इसी उदहारण को देखें तो जो सामान लोगों को सौ ये इससे ज़्यादा में मिला उसकी वास्तविक कीमत 20 या 30 रूपये हो सकती थी. इसी तरह बैंकों के सबसे बड़े कर्ज़दार अगर दुनिया के अमीरतरीन लोग हैं तो ये अपने आप में हमारे और आपके जैसे लोगों के चौंकने के लिए काफ़ी है कि सबसे बड़े क़र्ज़दार और टॉप लेवल के अमीर के बीच कुछ तो लोचा है !
आइये थोड़ी बात सियासत की कर लेते हैं, आप किन्हीं 10 नेताओं को लीजिये जो कम से कम 10 या 20 साल से सियासत में हैं और सांसद या विधायक रहे हैं, साथ ही अगर ये सत्ताधारी पार्टी के मंत्री वगैरह रहे हों तो और बेहतर. अब पता कीजिये कि जब वो सियासत में आये थे तब उनकी संपत्ति कितनी थी और अब उनकी संपत्ति कितनी है, साथ ही इस बीच उनके आय के स्रोतों की भी पड़ताल कीजिये, ये गणित बहुत मुमकिन है आपको चौका देगी. इसी तरह बैंकों से क़र्ज़ लेने की प्रकिया, सत्ताधारी दल का इसमें सहयोग, क़र्ज़ लिए गये रूपये का कहाँ और कैसे इस्तेमाल हुआ, कैसे बहुत बड़ी रकम बट्टे खाते में गयी, आदि की भी पड़ताल करें, तो आपको समझ में आयेगा कि भ्रष्टाचार दरअसल समस्या नहीं व्यवस्था है.
संसद एवं विधानसभाओं के लिए निर्धारित चुनावी प्रक्रिया भ्रष्टाचार की गंगोत्री में डुबकी लगाये बिना पूरी ही नहीं हो सकती, ये तो हर किसी को पता है. अब सवाल पैदा होता है कि क्या भ्रष्टाचार का अंत भी मुमकिन है? थोड़े में कहा जाये तो पूंजीवादी आर्थिक एवं राजनीतिक व्यवस्था में हुकूमत कोई भी करे, भ्रष्टाचार का खात्मा नहीं हो सकता है, सच तो ये है कि ये व्यवस्थाएं भ्रष्टाचार के बिना चल ही नहीं सकतीं.
हाँ उत्पादन के उदेश्य को बदल दिया जाये, यानि लाभ के बजाय उत्पादन का आधार आवश्यकता हो, तो भ्रष्टाचार जिस समूह के लिए वजूद में आया है वो समूह ही ख़त्म हो जायेगा, इसके अलावा सतत सांस्कृतिक कार्यक्रम (शिक्षा, परिचर्चा, सेमिनार आदि) के ज़रिये लोगों के मानस को भी बदला जाये. लेकिन ये कार्यक्रम हो ही तब पायेंगे जब पहले राजीनीतिक क्रांति के ज़रिये मेहनतकश लोग सत्ता अपने हाथ में लें लें. जब तक ये नहीं होगा इसके होने के लिए तैयारी करने के अलावा और हम कुछ नहीं कर सकते.
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