मेरी उम्र कुछ खास नहीं थी जब एक दिन मैं खेलते खेलते धर्म के अखाड़े में पहुँच गया था। वहां कई धर्मों के पहलवान गुत्थम गुत्था थे। मेरी हैरानी का उस वक्त कोई ठिकाना नही रहा जब मैंने एक ही धर्म के अलग अलग गुटों को एक दुसरे से लड़ते देखा। जब ये पहलवान आपस में लड़ रहे थे तब उसी वक्त मेरे अब्बू और मेरे मामू भी आपस में लड़ रहे थे। दरअसल ये दोनों दो पहलवानों के गुटों को अपने अपने तौर पर खुदा का एजेंट मानते थे। मामू और अब्बू की आपसी लड़ाई की कीमत अम्मी के साथ ही हम भाई बहनों ने चुकाई।
जब मेरी नज़रें मज़हब और इनके ठेकेदारों से मिलने के काबिल हुई तो मैंने पाया कि ये सारे पहलवान कुछ अजीब तरह से बने थे, इनके दिमाग खास तरह से काम करते थे और इनके दिल का दरिया सूख चुका था। इनकी आँखें आग तो बरसा सकतीं थीं लेकिन मोहब्बत या गम के आंसू इनमे नहीं आते थे। ये जब बोलते थे तो खिले फूल मुरझा जाते थे और कलियां खिलने से इनकार कर देती थीं। सूरज के पर्दा करने के बाद अगर इनकी आवाज़ फ़ज़ा में गूंजती थी तो जुगनू जाने कहाँ छुप जाते थे और शबनम ज़मीन तक पहुंचने से पहले ही कहीं खो जाती थी।
मुझे मेरे मामू भी प्यारे थे और अब्बू भी। मैं दोनों से सवाल करता, जब तक वो चाहते जवाब देते वरना ज़ोर से डांट देते ! ये सिलसिला बहुत दिनों तक चला, फिर एक रात अचानक चंदा मामू ने मुझे अपनी ऊँगली पकड़ाई और मुझे खुदा के पास ले गए। मेरी उम्मीदों के बरक्श वो मुझे बिलकुल मस्तमौला लगे। उन्होंने मुझे चाँद पर बैठी बुढ़िया नानी की गोद में बिठा दिया और मेरे साथ धरती पर मज़हबी पहलवानों की जंग देखने लगे। मैं देख कर हैरान था कि इस मारकाट को रोका क्यों नही जा रहा था ? आख़िर मैंने खुदा से पूँछ ही लिया... और फिर उसने कहा कि ये पहलवान बड़े खतरनाक हैं और वो खुद भी इनसे डरता है। ... और ऐसा कह कर उसने ज़ोर का ठहाका लगाया।
Monday, 23 January 2017
खुदा जब हंस पड़ा
Sunday, 22 January 2017
गर तुम वापस आओ
तुमने ये तो देखा कि मेरे जिस्म में वक्त ने एक तवील सफ़र तय कर लिया है, लेकिन तुम्हे ये दिखाई नहीं पड़ा कि मैंने मेरे जिस्म का साथ कब का छोड़ दिया है और अभी तक वहीँ ठहरा हूँ जहाँ हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी, आज भी मैं उन्हीं चुम्बनों में मौजूद हूँ जिनकी हरारत मेरे लबों पर अब भी बरकरार है। मेरी उंगलियों के पोरों पर तुम्हारे जिस्म की सिहरन अब भी मौजूद है। हाँ वक्त ने मेरे जिस्म में एक तवील सफ़र तय किया है मगर मैं मेरे जिस्म का साथ कहाँ दे पाता हूँ !
तुम आओगी तो नहीं पर अगर आ सको तो वक्त को भी खींच कर वहीँ ले आएंगे जहाँ हम मिले थे, के जहाँ पहली बार हमने एक दुसरे को चूमा था, के जहाँ पहली बार मेरे जिस्म ने तुम्हारे जिस्म को महसूस किया था, के जब पहली बार हमने एक दुसरे के जिस्म पर जिस्म से अशआर लिखे थे। हाँ ये मुमकिन है अगर तुम वापस आ सको !
अँधेरी दुनिया के खात्मे का सफ़र अभी जारी है
बात उस वक्त की है जब मेरी नज़रें देख पाने की सलाहियत से बस लबरेज़ हुई ही थीं और मैंने उजालों की दुनिया के अंधेरे देखने शुरू कर दिए थे। दमकती रोशनी की आगोश में अँधेरे पूरी ताक़त से मौजूद थे। कमाल तो ये है कि लोगों की नज़रें रौशनी की चमक से चुंधिया कर अंधेरों का कोई पता मालूम किये बिना लौटती थीं। जब मेरे पास नज़र नहीं थी तब भी ऐसा ही कुछ चल रहा था और जब मुझे नज़र और इसी के साथ नज़रिया भी हासिल हुआ तो भी हालात में कोई तबदीली नहीं आयी थी। हाँ इतना ज़रूर था कि मेरे जैसे कुछ और लोग थे जिनको उजाले की गोद में मौजूद अँधेरा नज़र आता था।
हम सब ने उजाले को गोशे गोशे में पहुँचाने और अँधेरे को पूरी तरह ख़त्म कर देने का अहद किया और इस सफर पर चल पड़े। अभी हम बहुत दूर नहीं चले थे की मैंने देखा मेरे साथियों की भी नज़रें उजाले की दमक से चुंधियाने लगी थी। ये देखना बहुत तकलीफदेह था। मेरे साथी एक एक कर उजाले की दुनिया में आबाद होते चले गए। मैंने अपनी नज़र को बचाये रखा और ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा था जब मैंने तय किया कि वक्त बर्बाद करने से बेहतर है कि अँधेरी ताकतों से अपनी क़ूवत के मुताबिक लड़ा जाये।
मैंने तय किया कि इस मुकाम पर बेहतर होगा कि जितना मुमकिन हो लोगों की नज़रों को इस अँधेरे को देख पाने के काबिल बनायें जिससे उन्हें वो नज़रिया हासिल हो कि वो अपने जैसे और लोग तैयार कर पाएं। यह सब करते हुए मैं अपनी ज़िंदगी से बहुत दूर चला गया था। लेकिन फिर भी कुछ चराग़ जलाने में कामयाब रहा, जो चराग़ मैंने जलाए उनमे से कुछ आज भी रोशन हैं। लेकिन मालूम नहीं कि मेरी नज़रें कमज़ोर हो गयी हैं या मेरी कोशिशों में ही कोई कमी रह गयी कि जिन चरागों से उम्मीदें ज़्यादा थीं वही उजाले की दुनिया के साथ जाकर खड़े हो गए। इन सब से मैं काफी परेशान हुआ और सदियों के सफ़र के बाद लौट आया अपनी ज़िन्दगी के पास जिसे सजाने या सवांरने का कभी मुझे वक्त ही नही मिला था। पर, ज़िन्दगी थी कि बस मोहब्बत का मोजस्समा, उसने फिर मुझे गले लगा लिया। अभी भी कमज़ोर नज़रों को देख पाने के लायक बनाने की कोशिशें जारी हैं लेकिन अब अपनी ज़िन्दगी के उधड़े लिबास पर पैबंद लगाने की भी कोशिशें करता रहता हूँ। बस खुश हूँ के अंधेरी दुनिया के खात्मे का सफ़र अब भी जारी है।
Saturday, 21 January 2017
दासत्व
भारत को छोड़ कर पूरी दुनिया से दासप्रथा लगभग समाप्त हो गयी, कारन सिर्फ इतना है कि दुनिया में दासों की पहचान की जा सकती थी। भारत में दास नाम ही नहीं दिया गया बल्कि इसे चार वर्णों में से एक वर्ण माना गया और इसे धर्म से जोड़ दिया गया।
दासत्व जो थोड़ा बहुत इस देश में था वो करीब करीब ख़त्म हो गया लेकिन जातीत्व के रूप में दासत्व को ख़त्म करना तब तक संभव नहीं है जब तक इसे अर्थ प्रदान करने वाला धर्म ज़िंदा है। सोचियेगा !
दरख़्त
वक़्त के आगोश से तुम गुज़र रही हो और मैं भी वक्त की गोद में दरख़्त की मानिंद खड़ा हूँ। मुझे मालूम है कि तुम्हारा यूँ गुज़रना बस तुम्हारी खुद की मौज के लिए है, मेरे होने या न होने से तुम्हारी मौज़ को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हो सके तो कभी ठहर कर सोचना, तुम्हारी आगोश में मेरे ही फूलों की खुशबु है, तुम लहराओ कि इठलाओ, मेरी खुशबु ही है जो तुम्हे इज्ज़त बख्शती है, नाम और पहचान देती है। तुम हवा हो, तुम में क़ूवत है और जोश भी, मैं सिर्फ दरख़्त हूँ, ज़मीन से खुराक़ लेता हूँ तो उसकी प्यास मिटाने के लिए हजारों गैलन पानी उसकी रूह् में उतार देता हूँ, तुमसे लेता हूँ सांसे, तो अपनी खुशबुएं कर देता हूँ तुम्हारे हवाले। धरती, सूरज और हवा से जो कुछ हासिल करता हूँ सब लौटा देता हूँ यहीं के लोगों को। लेकिन अब खुदगर्ज़ होने लगा हूँ। बस एक ही ख्वाहिश है कि तुम मेरी खुशबुएँ लेकर गायब न हुआ करो, बल्कि ठहरो मेरे पास, मेरे कानों में सरगोशी किया करो। तुम्हें शायद मालूम नहीं कि मनुष्यों ने मेरे कानों में तुम्हारी सरगोशियां सुनकर ही सात सुरों की रचना की है। अब मैं भी इन सुरों को गाना चाहता हूँ, पर ये तभी मुमकिन है जब कि तुम ठहर जाओ और ले लो मुझे अपनी आगोश में !!
Wednesday, 18 January 2017
मेहनतकशों की ठोकर
तुम पैदाइशी नंगे थे और तुम्हारे सदरे सियासत बनने तक तुम्हारे तमाम हमनवां भी नंगे हो गए। तुम पूरे तरतीब औ तफ़्तीश के साथ पैदा हुए थे लेकिन तुम्हारे जैसे कई बिना तरतीब औ तफ़्तीश के भी पैदा हुए। तुम्हारा नंगापन जैसे जैसे अहले क़लम की दुनिया का हिस्सा बना इनका नंगापन भी नुमायां होने लगा। पर अहले ज़हन ने तुम्हारे नंगेपन को तब ही देख लिया था जब तुम इस दुनिया में पैदा होने की कोशिश कर रहे थे और उनको भी जो तुम्हारे मक़बूल औ मशहूर होने के साथ अपने लिबास आहिस्ता आहिस्ता उतार रहे हैं। अहले ज़हन ये भी जानते हैं कि नंगों का कोई मुश्तकबिल नहीं है। इंसानों ने नंगेपन से लिबास तक पहुंचने में हज़ारों साल तक सफ़र किया है, अब वे फिरसे हज़ारों साल पीछे नहीं जायेंगे। तुम्हारी परेशानी ये है कि तुम अपनी रूह् हज़ारों साल पीछे छोड़ आए हो और चाहते हो की तुम्हारा ये मुर्दा जिस्म ज़िंदा इंसानो के कंधे का सहारा लेकर तुम्हारी रूह् तक पहुंचे। तो सुनो, ये मुमकिन नहीं है। सारी क़ायनात बेहतरी की तरफ़ सफ़र में है, क्या हुआ जो वक़्ती तौर पर तुम पत्थर की मानिंद रास्ते में आ गए। तुम्हारे मुर्दा जिस्मों के लिए मेहनतकशों के जूते की एक ठोकर काफ़ी है।
19 जनवरी 2017
Tuesday, 17 January 2017
मैंने देखा
वो एक मज़बूत कदकाठी का इन्सान था, पत्थर तोड़ रहा था। आंसू पसीना बनकर बह रहे थे और हथौडे की आँखों से बेबसी की चिंगारियां निकल निकल कर फ़ज़ा में ग़ुम हो रही थीं। लेकिन वहीँ पास में एक नन्हा पौधा अपनी मासूम मुलायम जड़ों को पत्थर के सीने में उतार कर अपनी ग़िज़ा हासिल कर रहा था और फ़ज़ा में बिखेर रहा था अपनी खुशबु।
मोहब्बत के तराने
सालों की मेहनत के बाद इस दुनिया के मैनेजर्स और चौकीदार काफ़ी हद तक उनके मुताबिक काम करने लगे हैं। दुनिया की हर क़लम पर क़ाबिज़ होने की उनकी कोशिश भी असरंदाज़ हुई हैं। जितनी कलमें उनके कब्ज़े में हैं उनकी रोशनाई में उन्होंने मासूम इंसानो के लहू मिला दिए हैं। अब ये क़लमें न तो मुहब्बत के नगमे लिखती हैं और न ही बच्चों के लिए लोरियां।
अगर आप चाहते हैं की सारी दुनिया ही उनके क़ब्ज़े में न हो, अगर आप चाहते हैं कि क़लम आज़ाद रहे, अगर आप चाहते हैं कि रोशनाई में बची रहे मोहब्बत और लोरी के गीत लिखने के तासीर ! तो फिर आपको जागना होगा ! बस आप जाग जाएँ तो फिरसे मैं गाऊंगा मोहब्बत के तराने और बच्चों की लोरियां।
Wednesday, 11 January 2017
बस इक उम्मीद
जब मैं इन्सान के रूप में पैदा होने की कोशिश में था तभी किसी ने कहा था कि दिल की बात दिल तक ज़रूर पहुँचती है। फिर वक्त बड़ी तेज़ी से मुझमे दौड़ने लगा। मेरा जिस्म वक्त के साथ साथ चल रहा था लेकिन मैं वक्त से बहुत पीछे एक मामूली से पड़ाव पे ठहर गया था। दरअसल मेरे दिल में एक बात थी जिसे एक और दिल तक पहुंचना था। जिस दिल तक ये बात पहुंचनी थी उसका मालिक मेरे जिस्म के करीब करीब साथ ही था, लेकिन मुझे ऐसा महसूस होता है कि उसके दिल तक मेरी बात नही पहुँची। तो भले ही जिस्म वक्त के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रहा है, मैं वहीँ खड़ा हूँ जहाँ से उसके एक और बार गुज़रने की उम्मीद है ।
Tuesday, 10 January 2017
मोहब्बत का फ़रिश्ता
वो किसी और दुनिया से आयी थी, उसकी उगलियाँ ऐसी थीं जैसे फूलों की पांखुड़ियाँ और आँखे किसी सितारे की मानिंद. ऐसा लगता था जैसे चाँद के चेहरे पर दो सितारे सजा दिए गये हों. होंठ ऐसे जैसे अधखिले गुलाब ने सूरज की तपिश पाकर बस अभी आंखे खोलीं हो, उसके जिस्म की खुशबु हवाओं में यूँ घुल रही थी जैसे जन्नत का दरवाज़ा खोल दिया गया हो. नाजुक तो ऐसी थी कि छूने से भी डर लगे. उसके आने की खबर दूर दूर तक फ़ैल गयी थी. नफ़रत से भरी इस दुनिया के बाशिंदे मोहब्बत की ख़ुराक पाने के लिए उसके इर्द गिर्द जमा होते और तर तर जाते. उसे बस एक ही काम आता था, मोहब्बत लुटाना.
मैं जब उससे मिला था तो मुझे उसमे कोई दिलचश्पी पैदा नहीं हुई थी. दरअसल मेरी आँखों ने खूबसूरती और बदसूरती के बीच के पहचान की सलाहियत खो दी थी, मेरे नथुने खुशबु और बदबू के दरमियाँ कब से खड़े थे. जिस्म ने छुवन को महसूस करना बंद कर दिया था. सूरज की तपिश बदन को छूती थी, हवाएं जिस्म को सहला सहला कर गुज़रती थी, सर्द हवा के झोकों को रोंगटे खड़े होकर अब भी सलाम करते थे. लेकिन यह सब जिस्म के जिस तल पर होता था वहां मैं सालो से मौजूद ही नहीं था. मुझमे और मेरे जिस्म में कोई गहरा नाता जरूर था क्योंकि मैं ज़्यादा देर तक कभी भी अपने जिस्म से दूर नहीं रहा और मेरे जिस्म ने तो कभी मेरा साथ ही नहीं छोड़ा. पर हम दोनों साथ साथ बहुत कम रहे.
मोहब्बत के इस फ़रिश्ते की बात दूर दूर तक फ़ैल चुकी थी, ये महज़ इत्तेफ़ाक था कि एक दिन मैं उसके सामने पहुँच गया, पर ये सब मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ. मुझे बस इतना याद है कि मैं बहुत गहरी नींद से जागा था और अपनी हथेली पर कुछ नरम मुलायम महसूस किया था. अमूमन मैं चौंकता नहीं था पर इस बार मैंने चौंक कर हथेली पर एक गुलाब की पंखुड़ी के मानिंद उंगली देखी और इसी के साथ अपने जिस्म में मीलों गहरे उतरते एक एहसास को महसूस भी किया. ऐसा मेरे साथ कितनी बार हुआ है ये तो नहीं मालूम पर सदिओं पहले जब एक बार जिस्म बुखार की तपिश में जकड़ा हुआ था तब मैंने मेरे भीतर उतरती हुई कुछ उंगलियो को महसूस किया था, ये माँ की उगलियाँ थीं. आज फिर कुछ वैसा ही हुआ था. फिर मैंने निगाह ऊपर उठाई तो देखा सामने दो सितारे थे जिनसे नूर मेरी आँखों में उतरने लगा था, मेरी आँखों से वीरानी गायब हो गयी थी और अचानक से मेरी आँखों ने खूबसूरत और बदसूरत के फर्क को महसूस किया था. मैंने कुछ कहना चाहा था लेकिन उसने मेरे होंठों पर अपनी मासूम और मुलायम उंगली रख दी थी. और तभी मेरे होंठ बुदबुदाने लगे थे कोई गीत. फिर उसकी कुछ उगलियाँ तैर गईं थी मेरे जिस्म पर और इसके बाद ही मेरे जिस्म से सदिओं बाद मेरा राब्ता कायम हुआ था. मैंने न सिर्फ मेरे जिस्म को महसूस किया था बल्कि अब मैं धूप की तपिश, बदन को छूकर सरगोशियाँ करती हवाएं और मौसम के सर्द एहसास को भी महसूस कर सकता था. गोया अब मैं एक मुकम्मल इन्सान था.
मैं अपने आप में कितनी देर तक खोया रहा इसका ठीक ठीक मुझे कोई पता नही लेकिन जब मैंने आसपास की फज़ा में तब्दीली महसूस की और सब तरफ़ गौर से देखा तो वो वहां वो नही थी. लोग मुझ पर जोर जोर से चीख रहे थे और कह रहे थे कि उसने मुझे मोहब्बत से कितनी देर तक पुकारा पर मैं तो बुत बना बस बैठा रहा और वो थककर चली गयी. मैंने उसके जाने की दिशा मालूम की और एक अनजाने सफ़र पर निकल गया. सैकड़ों साल तक मैं चलता रहा. मैंने धरती, चाँद और सितारों की दुनिया का एक एक गोशा छान लिया लेकिन वो नहीं मिली.
अभी जब मैं रिवायत नामी चुडैलों की दुनिया से गुज़र रहा था तभी चुडैलों की एक मासूम बेटी ने आकर मेरी उंगली पकड़ ली. उसने पूछा कि क्या मैं वही हूँ जिसे मोहब्बत के फ़रिश्ते ने पत्थर से इन्सान बनाया था? मैंने उसे गोद में उठा लिया, उसका माथा चूमा और कहा हाँ मैं वही हूँ. उसने कहा मुझे मोहब्बत के फ़रिश्ते की तलाश छोड़ देनी चाहिए, ऐसा करना ही मेरे लिए फायदेमंद होगा. लेकिन जब मैंने उसे बताया कि उस फ़रिश्ते को ढूंढना ही मेरा वाहिद मकसद है तो वो मेरी गोद से उतर गयी और मुस्कराकर मेरे क़दम चूम लिए. वो एक तरफ को भाग गयी लेकिन जाते जाते उसने कहा कि मोहब्बत का फ़रिश्ता शैतानी दुनिया के कैदखाने में है, जिसके पहरेदार बेहद ख़तरनाक हैं और कैदखाने की दीवारे ऐसी कि पास जाने वालों को निगल ही जाएँ. उस पर ये कि इन्हें आसानी से देखा भी नही जा सकता. पर उस मासूम लड़की ने कहा कि अगर तुम बिलकुल साफ़ साफ़ देख सकते हो, तुम्हारा ज़ेहन पाक है और तुम्हरा दिल मोहब्बत से लबरेज़ तो तुम उस तक जरूर पहुचोगे.
मैं ख़ामोशी से एक तरफ चल पड़ा. सैकड़ों सालो के सफ़र के बाद मैं उस रास्ते पर था जो उस कैदखाने की ओर जाता था जहाँ मोहब्बत का फ़रिश्ता क़ैद है. लेकिन इस सफ़र का मैं वाहिद मुसाफिर न था, अनगिनत लोग थे जिन्हें मोहब्बत के फ़रिश्ते की तलाश थी. ........ और अब हम सब एक ही सफ़र के मुसाफिर हैं.
.................डॉ. सलमान अरशद
Monday, 9 January 2017
संगतराश
वो संगतराश है, उसे पत्थरों से मोहब्बत है और पत्थरों को रूह् पहनना उसकी फितरत। उसके थैले में रूहों का ज़खीरा है। वो एक पत्थर पर पूरी एक उम्र गुज़ारता है और आहिस्ता आहिस्ता उतारता है उसमें रूह्। जैसे जैसे पत्थरों में जान आती है संगतराश इश्क़ में पड़ता है लेकिन जानदार पत्थर अपने जैसे दूसरे पत्थरों की सोहबत हासिल कर वक्त के जंगल में ग़ुम हो जाते हैं और संगतराश मायूस दिल के साथ उतारने लगता है रूह् किसी और पत्थर में। ये सिलसिला न जाने कब से क़ायम है और न जाने कब तक क़ायम रहेगा ।
Sunday, 8 January 2017
तूफान की किर्चियाँ
कभी खिजां तो कभी मौसमे बहार तो कभी तूफ़ान भी.. वक्त की ज़िन्दगी में इनका आना जाना मौसिकी के उतार चढ़ाव की मानिंद है। ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था कि उसकी ज़िन्दगी एक बार तूफान के ज़द में आ गयी। तूफान के असरात ने उसे इस क़ाबिल ही न रखा कि वो फिर मौसमे बहार में फूलों की खुशबुओं को जिस्म पे लपेट कर तितलियों संग उड़ पाती। जब ये सब उसके साथ हो रहा था तब वक्त के पंखों पर सवार मैं काफी आगे निकल चुका था और वक्त मेरे भीतर भी एक लंबी दूरी तय कर चुका था। इस सफर से मैंने जान लिया था कि जब तूफ़ान आये तो वक्त के जिस्म पर हालात की चादर लपेट देनी चाहिए और जब मौसमे बहार से रूबरू हों तब भी इस चादर को दूर नही फेंकनी चाहिए। उस वक्त भी इस चादर को वक्त के कंधे पर टांगे रखना चाहिए जब नरम मुलायम पुरवाई वक्त के जिस्म में गुदगुदी कर रही हो...! तो भले ही वक्त मुझमे बहुत दूर तक सफ़र कर चुका था, मैं उससे मिला और इस मिलन से कुछ ऐसा हुआ की मैं जिस्म को बहुत पीछे छोड़कर अपनी रूह को हथेली में लिए हुए उसके पास आ गया। मैंने देखा तूफ़ान ने उसके जिस्म की रंगत बिगाड़ दी थी ।
मैंने अपनी रूह् को जलाकर रौशनी की और इस रौशनी में चुनने लगा उसके जिस्म से तूफ़ान की किर्चियाँ। किर्चियाँ निकलती रहीं और बहार उसके भीतर से खिलती रही आहिस्ता आहिस्ता। कई साल लगे जब उसके जिस्म से मैंने आख़िरी किर्ची निकली। और इस आखिरी किर्ची के निकलने के साथ खुशबुएँ लिपट गयीं उसके जिस्म से और वो उड़ गयी तितलियों के साथ।
अब तक मेरी रूह् जल चुकी थी और जिस्म तूफानों की ज़द में आ चुका था पर कोई न था जो निकलता मेरे जिस्म से तूफ़ान की किर्चियाँ।
....... अरशद