Monday, 23 January 2017

खुदा जब हंस पड़ा

मेरी उम्र कुछ खास नहीं थी जब एक दिन मैं खेलते खेलते धर्म के अखाड़े में पहुँच गया था। वहां कई धर्मों के पहलवान गुत्थम गुत्था थे। मेरी हैरानी का उस वक्त कोई ठिकाना नही रहा जब मैंने एक ही धर्म के अलग अलग गुटों को एक दुसरे से लड़ते देखा। जब ये पहलवान आपस में लड़ रहे थे तब उसी वक्त मेरे अब्बू और मेरे मामू भी आपस में लड़ रहे थे। दरअसल ये दोनों दो पहलवानों के गुटों को अपने अपने तौर पर खुदा का एजेंट मानते थे। मामू और अब्बू की आपसी लड़ाई की कीमत अम्मी के साथ ही हम भाई बहनों ने चुकाई।
जब मेरी नज़रें मज़हब और इनके ठेकेदारों से मिलने के काबिल हुई तो मैंने पाया कि ये सारे पहलवान कुछ अजीब तरह से बने थे, इनके दिमाग खास तरह से काम करते थे और इनके  दिल का दरिया सूख चुका था। इनकी आँखें आग तो बरसा सकतीं थीं लेकिन मोहब्बत या गम के आंसू इनमे नहीं आते थे। ये जब बोलते थे तो खिले फूल मुरझा जाते थे और कलियां खिलने से इनकार कर देती थीं। सूरज के पर्दा करने के बाद अगर इनकी आवाज़ फ़ज़ा में गूंजती थी तो जुगनू जाने कहाँ छुप जाते थे और शबनम ज़मीन तक पहुंचने से पहले ही कहीं खो जाती थी।
मुझे मेरे मामू भी प्यारे थे और अब्बू भी। मैं दोनों से सवाल करता, जब तक वो चाहते जवाब देते वरना ज़ोर से डांट देते ! ये सिलसिला बहुत दिनों तक चला, फिर एक रात अचानक चंदा मामू ने मुझे अपनी ऊँगली पकड़ाई और मुझे खुदा के पास ले गए। मेरी उम्मीदों के बरक्श वो मुझे बिलकुल मस्तमौला लगे। उन्होंने मुझे चाँद पर बैठी बुढ़िया नानी की गोद में बिठा दिया और मेरे साथ धरती पर मज़हबी पहलवानों की जंग देखने लगे। मैं देख कर हैरान था कि इस मारकाट को रोका क्यों नही जा रहा था ? आख़िर मैंने खुदा से पूँछ ही लिया... और फिर उसने कहा कि ये पहलवान बड़े खतरनाक हैं और वो खुद भी इनसे डरता है। ... और ऐसा कह कर उसने ज़ोर का ठहाका लगाया।

Sunday, 22 January 2017

गर तुम वापस आओ

तुमने ये तो देखा कि मेरे जिस्म में वक्त ने एक तवील सफ़र तय कर लिया है, लेकिन तुम्हे ये दिखाई नहीं पड़ा कि मैंने मेरे जिस्म का साथ कब का छोड़ दिया है और अभी तक वहीँ ठहरा हूँ जहाँ हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी, आज भी मैं उन्हीं चुम्बनों में मौजूद हूँ जिनकी हरारत मेरे लबों पर अब भी बरकरार है। मेरी उंगलियों के पोरों पर तुम्हारे जिस्म की सिहरन अब भी मौजूद है। हाँ वक्त ने मेरे जिस्म में एक तवील सफ़र तय किया है मगर मैं मेरे जिस्म का साथ कहाँ दे पाता हूँ !
तुम आओगी तो नहीं पर अगर आ सको तो वक्त को भी खींच कर वहीँ ले आएंगे जहाँ हम मिले थे, के जहाँ पहली बार हमने एक दुसरे को चूमा था, के जहाँ पहली बार मेरे जिस्म ने तुम्हारे जिस्म को महसूस किया था, के जब पहली बार हमने एक दुसरे के जिस्म पर जिस्म से अशआर लिखे थे। हाँ ये मुमकिन है अगर तुम वापस आ सको !

अँधेरी दुनिया के खात्मे का सफ़र अभी जारी है

बात उस वक्त की है जब मेरी नज़रें देख पाने की सलाहियत से बस लबरेज़ हुई ही थीं और मैंने उजालों की दुनिया के अंधेरे देखने शुरू कर दिए थे। दमकती रोशनी की आगोश में अँधेरे पूरी ताक़त से मौजूद थे। कमाल तो ये है कि लोगों की नज़रें रौशनी की चमक से चुंधिया कर अंधेरों का कोई पता मालूम किये बिना लौटती थीं। जब मेरे पास नज़र नहीं थी तब भी ऐसा ही कुछ चल रहा था और जब मुझे नज़र और इसी के साथ नज़रिया भी हासिल हुआ तो भी हालात में कोई तबदीली नहीं आयी थी। हाँ इतना ज़रूर था कि मेरे जैसे कुछ और लोग थे जिनको उजाले की गोद में मौजूद अँधेरा नज़र आता था।
हम सब ने उजाले को गोशे गोशे में पहुँचाने और अँधेरे को पूरी तरह ख़त्म कर देने का अहद किया और इस सफर पर चल पड़े। अभी हम बहुत दूर नहीं चले थे की मैंने देखा मेरे साथियों की भी नज़रें उजाले की दमक से चुंधियाने लगी थी। ये देखना बहुत तकलीफदेह था। मेरे साथी एक एक कर उजाले की दुनिया में आबाद होते चले गए। मैंने अपनी नज़र को बचाये रखा और ज़्यादा वक्त नहीं गुज़रा था जब मैंने तय किया कि वक्त बर्बाद करने से बेहतर है कि अँधेरी ताकतों से अपनी क़ूवत के मुताबिक लड़ा जाये।
मैंने तय किया कि इस मुकाम पर बेहतर होगा कि जितना मुमकिन हो लोगों की नज़रों को इस अँधेरे को देख पाने के काबिल बनायें जिससे उन्हें वो नज़रिया हासिल हो  कि वो अपने जैसे और लोग तैयार कर पाएं। यह सब करते हुए मैं अपनी ज़िंदगी से बहुत दूर चला गया था। लेकिन फिर भी कुछ चराग़ जलाने में कामयाब रहा, जो चराग़ मैंने जलाए उनमे से कुछ आज भी रोशन हैं। लेकिन मालूम नहीं कि मेरी नज़रें कमज़ोर हो गयी हैं या मेरी कोशिशों में ही कोई कमी रह गयी कि जिन चरागों से उम्मीदें ज़्यादा थीं वही उजाले की दुनिया के साथ जाकर खड़े हो गए। इन सब से मैं काफी परेशान हुआ और सदियों के सफ़र के बाद लौट आया अपनी ज़िन्दगी के पास जिसे सजाने या सवांरने का कभी मुझे वक्त ही नही मिला था। पर, ज़िन्दगी थी कि बस मोहब्बत का मोजस्समा, उसने फिर मुझे गले लगा लिया। अभी भी कमज़ोर नज़रों को देख पाने के लायक बनाने की कोशिशें जारी हैं लेकिन अब अपनी ज़िन्दगी के उधड़े लिबास पर पैबंद लगाने की भी कोशिशें करता रहता हूँ। बस खुश हूँ के अंधेरी दुनिया के खात्मे का सफ़र अब भी जारी है।

Saturday, 21 January 2017

दासत्व

भारत को छोड़ कर पूरी दुनिया से दासप्रथा लगभग समाप्त हो गयी, कारन सिर्फ इतना है कि दुनिया में दासों की पहचान की जा सकती थी। भारत में दास नाम ही नहीं दिया गया बल्कि इसे चार वर्णों में से एक वर्ण माना गया और इसे धर्म से जोड़ दिया गया।
दासत्व जो थोड़ा बहुत इस देश में था वो करीब करीब ख़त्म हो गया लेकिन जातीत्व के रूप में दासत्व को ख़त्म करना तब तक संभव नहीं है जब तक इसे अर्थ प्रदान करने वाला धर्म ज़िंदा है। सोचियेगा !

दरख़्त

वक़्त के आगोश से तुम गुज़र रही हो और मैं भी वक्त की गोद में दरख़्त की मानिंद खड़ा हूँ। मुझे मालूम है कि तुम्हारा यूँ गुज़रना बस तुम्हारी खुद की मौज के लिए है, मेरे होने या न होने से तुम्हारी मौज़ को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हो सके तो कभी ठहर कर सोचना, तुम्हारी आगोश में मेरे ही फूलों की खुशबु है, तुम लहराओ कि इठलाओ, मेरी खुशबु ही है जो तुम्हे इज्ज़त बख्शती है, नाम और पहचान देती है। तुम हवा हो, तुम में क़ूवत है और जोश भी, मैं सिर्फ दरख़्त हूँ, ज़मीन से खुराक़ लेता हूँ तो उसकी प्यास मिटाने के लिए हजारों गैलन पानी उसकी रूह् में उतार देता हूँ, तुमसे लेता हूँ सांसे, तो अपनी खुशबुएं कर देता हूँ तुम्हारे हवाले। धरती, सूरज और हवा से जो कुछ हासिल करता हूँ सब लौटा देता हूँ यहीं के लोगों को। लेकिन अब खुदगर्ज़ होने लगा हूँ। बस एक ही ख्वाहिश है कि तुम मेरी खुशबुएँ लेकर गायब न हुआ करो, बल्कि ठहरो मेरे पास, मेरे कानों में सरगोशी किया करो। तुम्हें शायद मालूम नहीं कि मनुष्यों ने मेरे कानों में तुम्हारी सरगोशियां सुनकर ही सात सुरों की रचना की है। अब मैं भी इन सुरों को गाना चाहता हूँ, पर ये तभी मुमकिन है जब कि तुम ठहर जाओ और ले लो मुझे अपनी आगोश में !!

Wednesday, 18 January 2017

मेहनतकशों की ठोकर

तुम पैदाइशी नंगे थे और तुम्हारे सदरे सियासत बनने तक तुम्हारे तमाम हमनवां भी नंगे हो गए। तुम पूरे तरतीब औ तफ़्तीश के साथ पैदा हुए थे लेकिन तुम्हारे जैसे कई बिना तरतीब औ तफ़्तीश के भी पैदा हुए। तुम्हारा नंगापन जैसे जैसे अहले क़लम की दुनिया का हिस्सा बना इनका नंगापन भी नुमायां होने लगा। पर अहले ज़हन ने तुम्हारे नंगेपन को तब ही देख लिया था जब तुम इस दुनिया में पैदा होने की कोशिश कर रहे थे और उनको भी जो तुम्हारे मक़बूल औ मशहूर होने के साथ अपने लिबास आहिस्ता आहिस्ता उतार रहे हैं। अहले ज़हन ये भी जानते हैं कि नंगों का कोई मुश्तकबिल नहीं है। इंसानों ने नंगेपन से लिबास तक पहुंचने में हज़ारों साल तक सफ़र किया है, अब वे फिरसे हज़ारों साल पीछे नहीं जायेंगे। तुम्हारी परेशानी ये है कि तुम अपनी रूह् हज़ारों साल पीछे छोड़ आए हो और चाहते हो की तुम्हारा ये मुर्दा जिस्म ज़िंदा इंसानो के कंधे का सहारा लेकर तुम्हारी रूह् तक पहुंचे। तो सुनो, ये मुमकिन नहीं है। सारी क़ायनात बेहतरी की तरफ़ सफ़र में है, क्या हुआ जो वक़्ती तौर पर तुम पत्थर की मानिंद रास्ते में आ गए। तुम्हारे मुर्दा जिस्मों के लिए मेहनतकशों के जूते की एक ठोकर काफ़ी है।

19 जनवरी 2017

Tuesday, 17 January 2017

मैंने देखा

वो एक मज़बूत कदकाठी का इन्सान था, पत्थर तोड़ रहा था। आंसू पसीना बनकर बह रहे थे और हथौडे की आँखों से बेबसी की चिंगारियां निकल निकल कर फ़ज़ा में ग़ुम हो रही थीं। लेकिन वहीँ पास में एक नन्हा पौधा अपनी मासूम मुलायम जड़ों को पत्थर के सीने में उतार कर अपनी ग़िज़ा हासिल कर रहा था और फ़ज़ा में बिखेर रहा था अपनी खुशबु।

मोहब्बत के तराने

सालों की मेहनत के बाद इस दुनिया के मैनेजर्स और चौकीदार काफ़ी हद तक उनके मुताबिक काम करने लगे हैं। दुनिया की हर क़लम पर क़ाबिज़ होने की उनकी कोशिश भी असरंदाज़ हुई हैं। जितनी कलमें उनके कब्ज़े में हैं उनकी रोशनाई में उन्होंने मासूम इंसानो के लहू मिला दिए हैं। अब ये क़लमें न तो  मुहब्बत के नगमे लिखती हैं और न ही बच्चों के लिए लोरियां।
अगर आप चाहते हैं की सारी दुनिया ही उनके क़ब्ज़े में न हो, अगर आप चाहते हैं कि क़लम आज़ाद रहे, अगर आप चाहते हैं कि रोशनाई में बची रहे मोहब्बत और लोरी के गीत लिखने के तासीर ! तो फिर आपको जागना होगा ! बस आप जाग जाएँ तो फिरसे मैं गाऊंगा मोहब्बत के तराने और बच्चों की लोरियां।

Wednesday, 11 January 2017

बस इक उम्मीद

जब मैं इन्सान के रूप में पैदा होने की कोशिश में था तभी किसी ने कहा था कि दिल की बात दिल तक ज़रूर पहुँचती है। फिर वक्त बड़ी तेज़ी से मुझमे दौड़ने लगा। मेरा जिस्म वक्त के साथ साथ चल रहा था लेकिन मैं वक्त से बहुत पीछे एक मामूली से पड़ाव पे ठहर गया था। दरअसल मेरे दिल में एक बात थी जिसे एक और दिल तक पहुंचना था। जिस दिल तक ये बात पहुंचनी थी उसका मालिक मेरे जिस्म के करीब करीब साथ ही था, लेकिन मुझे ऐसा महसूस होता है कि उसके दिल तक मेरी बात नही पहुँची। तो भले ही जिस्म वक्त के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रहा है, मैं वहीँ खड़ा हूँ जहाँ से उसके एक और बार गुज़रने की उम्मीद है ।

Tuesday, 10 January 2017

मोहब्बत का फ़रिश्ता

वो किसी और दुनिया से आयी थी, उसकी उगलियाँ ऐसी थीं जैसे फूलों की पांखुड़ियाँ और आँखे किसी सितारे की मानिंद. ऐसा लगता था जैसे चाँद के चेहरे पर दो सितारे सजा दिए गये हों. होंठ ऐसे जैसे अधखिले गुलाब ने सूरज की तपिश पाकर बस अभी आंखे खोलीं हो, उसके जिस्म की खुशबु हवाओं में यूँ घुल रही थी जैसे जन्नत का दरवाज़ा खोल दिया गया हो. नाजुक तो ऐसी थी कि छूने से भी डर लगे. उसके आने की खबर दूर दूर तक फ़ैल गयी थी. नफ़रत से भरी इस दुनिया के बाशिंदे मोहब्बत की ख़ुराक पाने के लिए उसके इर्द गिर्द जमा होते और तर तर जाते. उसे बस एक ही काम आता था, मोहब्बत लुटाना.
मैं जब उससे मिला था तो मुझे उसमे कोई दिलचश्पी पैदा नहीं हुई थी. दरअसल मेरी आँखों ने खूबसूरती और बदसूरती के बीच के पहचान की सलाहियत खो दी थी, मेरे नथुने खुशबु और बदबू के दरमियाँ कब से खड़े थे. जिस्म ने छुवन को महसूस करना बंद कर दिया था. सूरज की तपिश बदन को छूती थी, हवाएं जिस्म को सहला सहला कर गुज़रती थी, सर्द हवा के झोकों को रोंगटे खड़े होकर अब भी सलाम करते थे. लेकिन यह सब जिस्म के जिस तल पर होता था वहां मैं सालो से मौजूद ही नहीं था. मुझमे और मेरे जिस्म में कोई गहरा नाता जरूर था क्योंकि मैं ज़्यादा देर तक कभी भी अपने जिस्म से दूर नहीं रहा और मेरे जिस्म ने तो कभी मेरा साथ ही नहीं छोड़ा. पर हम दोनों साथ साथ बहुत कम रहे.
मोहब्बत के इस फ़रिश्ते की बात दूर दूर तक फ़ैल चुकी थी, ये महज़ इत्तेफ़ाक था कि एक दिन मैं उसके सामने पहुँच गया, पर ये सब मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ. मुझे बस इतना याद है कि मैं बहुत गहरी नींद से जागा था और अपनी हथेली पर कुछ नरम मुलायम महसूस किया था. अमूमन मैं चौंकता नहीं था पर इस बार मैंने चौंक कर हथेली पर एक गुलाब की पंखुड़ी के मानिंद उंगली देखी और इसी के साथ अपने जिस्म में मीलों गहरे उतरते एक एहसास को महसूस भी किया. ऐसा मेरे साथ कितनी बार हुआ है ये तो नहीं मालूम पर सदिओं पहले जब एक बार जिस्म बुखार की तपिश में जकड़ा हुआ था तब मैंने मेरे भीतर उतरती हुई कुछ उंगलियो को महसूस किया था, ये माँ की उगलियाँ थीं. आज फिर कुछ वैसा ही हुआ था. फिर मैंने निगाह ऊपर उठाई तो देखा सामने दो सितारे थे जिनसे नूर मेरी आँखों में उतरने लगा था, मेरी आँखों से वीरानी गायब हो गयी थी और अचानक से मेरी आँखों ने खूबसूरत और बदसूरत के फर्क को महसूस किया था. मैंने कुछ कहना चाहा था लेकिन उसने मेरे होंठों पर अपनी मासूम और मुलायम उंगली रख दी थी. और तभी मेरे होंठ बुदबुदाने लगे थे कोई गीत. फिर उसकी कुछ उगलियाँ तैर गईं थी मेरे जिस्म पर और इसके बाद ही मेरे जिस्म से सदिओं बाद मेरा राब्ता कायम हुआ था. मैंने न सिर्फ मेरे जिस्म को महसूस किया था बल्कि अब मैं धूप की तपिश, बदन को छूकर सरगोशियाँ करती हवाएं और मौसम के सर्द एहसास को भी महसूस कर सकता था. गोया अब मैं एक मुकम्मल इन्सान था.
मैं अपने आप में कितनी देर तक खोया रहा इसका ठीक ठीक मुझे कोई पता नही लेकिन जब मैंने आसपास की फज़ा में तब्दीली महसूस की और सब तरफ़ गौर से देखा तो वो वहां वो नही थी. लोग मुझ पर जोर जोर से चीख रहे थे और कह रहे थे कि उसने मुझे मोहब्बत से कितनी देर तक पुकारा पर मैं तो बुत बना बस बैठा रहा और वो थककर चली गयी. मैंने उसके जाने की दिशा मालूम की और एक अनजाने सफ़र पर निकल गया. सैकड़ों साल तक मैं चलता रहा. मैंने धरती, चाँद और सितारों की दुनिया का एक एक गोशा छान लिया लेकिन वो नहीं मिली.
अभी जब मैं रिवायत नामी चुडैलों की दुनिया से गुज़र रहा था तभी चुडैलों की एक मासूम बेटी ने आकर मेरी उंगली पकड़ ली. उसने पूछा कि क्या मैं वही हूँ जिसे मोहब्बत के फ़रिश्ते ने पत्थर से इन्सान बनाया था? मैंने उसे गोद में उठा लिया, उसका माथा चूमा और कहा हाँ मैं वही हूँ. उसने कहा मुझे मोहब्बत के फ़रिश्ते की तलाश छोड़ देनी चाहिए, ऐसा करना ही मेरे लिए फायदेमंद होगा. लेकिन जब मैंने उसे बताया कि उस फ़रिश्ते को ढूंढना ही मेरा वाहिद मकसद है तो वो मेरी गोद से उतर गयी और मुस्कराकर मेरे क़दम चूम लिए. वो एक तरफ को भाग गयी लेकिन जाते जाते उसने कहा कि मोहब्बत का फ़रिश्ता शैतानी दुनिया के कैदखाने में है, जिसके पहरेदार बेहद ख़तरनाक हैं और कैदखाने की दीवारे ऐसी कि पास जाने वालों को निगल ही जाएँ. उस पर ये कि इन्हें आसानी से देखा भी नही जा सकता. पर उस मासूम लड़की ने कहा कि अगर तुम बिलकुल साफ़ साफ़ देख सकते हो, तुम्हारा ज़ेहन पाक है और तुम्हरा दिल मोहब्बत से लबरेज़ तो तुम उस तक जरूर पहुचोगे.
मैं ख़ामोशी से एक तरफ चल पड़ा. सैकड़ों सालो के सफ़र के बाद मैं उस रास्ते पर था जो उस कैदखाने की ओर जाता था जहाँ मोहब्बत का फ़रिश्ता क़ैद है. लेकिन इस सफ़र का मैं वाहिद मुसाफिर न था, अनगिनत लोग थे जिन्हें मोहब्बत के फ़रिश्ते की तलाश थी. ........ और अब हम सब एक ही सफ़र के मुसाफिर हैं.

.................डॉ. सलमान अरशद

Monday, 9 January 2017

संगतराश

वो संगतराश है, उसे पत्थरों से मोहब्बत है और पत्थरों को रूह् पहनना उसकी फितरत। उसके थैले में रूहों का ज़खीरा है। वो एक पत्थर पर पूरी एक उम्र गुज़ारता है और आहिस्ता आहिस्ता उतारता है उसमें रूह्। जैसे जैसे पत्थरों में जान आती है संगतराश इश्क़ में पड़ता है लेकिन जानदार पत्थर अपने जैसे दूसरे पत्थरों की सोहबत हासिल कर वक्त के जंगल में ग़ुम हो जाते हैं और संगतराश मायूस दिल के साथ उतारने लगता है रूह् किसी और पत्थर में। ये सिलसिला न जाने कब से क़ायम है और न जाने कब तक क़ायम रहेगा ।

Sunday, 8 January 2017

तूफान की किर्चियाँ

कभी खिजां तो कभी मौसमे बहार तो कभी तूफ़ान भी.. वक्त की ज़िन्दगी में इनका आना जाना मौसिकी के उतार चढ़ाव की मानिंद है। ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था कि उसकी ज़िन्दगी एक बार तूफान के ज़द में आ गयी। तूफान के असरात ने उसे इस क़ाबिल ही न रखा कि वो फिर मौसमे बहार में फूलों की खुशबुओं को जिस्म पे लपेट कर तितलियों संग उड़ पाती। जब ये सब उसके साथ हो रहा था तब वक्त के पंखों पर सवार मैं काफी आगे निकल चुका था और वक्त मेरे भीतर भी एक लंबी दूरी तय कर चुका था। इस सफर से मैंने जान लिया था कि जब तूफ़ान आये तो वक्त के जिस्म पर हालात की चादर लपेट देनी चाहिए और जब मौसमे बहार से रूबरू हों तब भी इस चादर को दूर नही फेंकनी चाहिए। उस वक्त भी इस चादर को वक्त के कंधे पर टांगे रखना चाहिए जब नरम मुलायम पुरवाई वक्त के जिस्म में गुदगुदी कर रही हो...!  तो  भले ही वक्त मुझमे बहुत दूर तक सफ़र कर चुका था, मैं उससे मिला और इस मिलन से कुछ ऐसा हुआ की मैं जिस्म को बहुत पीछे छोड़कर अपनी रूह को हथेली में लिए हुए उसके पास आ गया। मैंने देखा तूफ़ान ने उसके जिस्म की रंगत बिगाड़ दी थी ।
मैंने अपनी रूह् को जलाकर रौशनी की और इस रौशनी में चुनने लगा उसके जिस्म से तूफ़ान की किर्चियाँ। किर्चियाँ निकलती रहीं और बहार उसके भीतर से खिलती रही आहिस्ता आहिस्ता। कई साल लगे जब उसके जिस्म से मैंने आख़िरी किर्ची निकली। और इस आखिरी किर्ची के निकलने के साथ खुशबुएँ लिपट गयीं उसके जिस्म से और वो उड़ गयी तितलियों के साथ।
अब तक मेरी रूह् जल चुकी थी और जिस्म तूफानों की ज़द में आ चुका था पर कोई न था जो निकलता मेरे जिस्म से तूफ़ान की किर्चियाँ।

....... अरशद

Monday, 2 January 2017

दवा जो दर्द बन गया

दवा जो दर्द बन गया
आज जब हमारे बीच बात बड़ी कंजूसी से और नाप तौल के होती है तब ऐसे लगता है जैसे परेशान होकर किसी को उसके हाल पर छोड़ दिया गया हो लेकिन वो सच में मर न जाए यह सोच कर कभी कभी उसके सामने रोटी का एक टुकड़ा डाल दिया जाता हो. क्या और कहाँ गडबड हुई, अक्सर मैं इसका हिसाब किताब लगता हूँ.
जब एक बार लम्बे अन्तराल के बाद तुम मेरे सीने से लगी थीं और तुरंत ही एक हाथ अपने उरोजो और मेरे जिस्म के बीच लगा लिया था तब पहली बार मुझे लगा था कि तुम अब जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुकी हो. पर इसी वक्त एक और बात हुई थी जो सिर्फ मैं जानता हूँ.
ये वही दौर था जब एक मेरा एक जज़्बाती रिश्ता काफी ज़द्दोजहद के बाद टूटा था और मैं जज़्बाती तौर पर बुरी तरह परेशान था. मेरे भीतर एक गहरी उदासी ने घर कर लिया था जिसे छुपाने की भरपूर कोशिश में मेरी जिंदगी बेतरतीबी से सराबोर थी. लेकिन जिस पल तुम सीने से लगी थी पता नही क्या हुआ था जो मैं एक पल में हल्का महसूस करने लगा था. बाद के दिनों में मैंने अक्सर ही एसा महसूस किया था और जब तक तुम साथ रहती मैं खुद को बेहतर महसूस करता. मैंने बहुत बार इसे समझना चाहा लेकिन आज तक नहीं जान पाया कि वो क्या चीज़ है तुममे जो मुझे छूते ही मेरी दवा बन जाती है!
ये भी कमाल ही था कि ज़िन्दगी ने हमे साथ रहने का मौका दिया और मैं अनजाने अनचाहे तुम्हारा तलबगार बनता चला गया. तुम मेरे पास आईं, मेरी आगोश में और जिंदगी में भी, लेकिन मेरी ख्वाहिशों का मरकज़ होने के बावजूद भी तुमने खुद को मेरी महबूबा कभी नही मन, मुझे कभी कोई तसल्ली नही दी, लेकिन तुम्हारा अंदाज़-ए-गुफ्तुगू और मेरे लिए तुम्हारी बेबाकी ने मुझे हमेशा गलत फहमी का शिकार बनाये रखा. जब तक तुम साथ थी तुम्हारा साथ ही मेरे लिए दवा का काम करता रहा लेकिन जब तुम्हारा साथ छूटा तो ये दवा ही दर्द बन गया.
तुमसे मिलने से पहले जिस दर्द और उदासी में मुब्तिला था तुमने उससे निजात दिलाई लेकिन अब तुमसे जो दर्द हासिल हुआ है उसका कोई इलाज नही.



Sunday, 1 January 2017

अंधेरों की गिरफ़्त में

अंधेरों की गिरफ़्त में
डॉ सलमान अरशद

वो शायद पांच साल का था जब रेल की पटरी के किनारे खेलते हुए एक रुकी हुई ट्रेन में चढ़ गया था और ट्रेन चल पड़ी थी. ट्रेन में वो पहले भी चढ़ा था, पर ये पहली बार था जब वो ट्रेन में चढ़ा था और ट्रेन चल पड़ी. उसे डर लगा था. डर एक अनजान दुनिया का, डर जानी पहचानी दुनिया से बिछड़ने का. इस दुनिया को समझने के लिहाज़ से आखिर पांच साल की उम्र होती ही क्या है, पर ये इंसानों की दुनिया है, जहाँ मजबूरी भी बिक जाती है तो हंसी और आंसू के भी खरीददार निकल ही आते है, इस मासूम को भी ट्रेन में फ़र्श साफ़ करके पैसे मांगने वाले एक बच्चे ने सहारा दिया. ये सहारा देना था या लेना ये तय करना भी कोई आसान काम नही है. बातचीत की आसानी के लिए हम इस बच्चे का नाम विकास रख लेते है. विकास का नाम हमेशा से विकास नहीं था, एक बार जब उसे सुधारगृह ले जाया गया तो लाइन में उसके आगे वाले बच्चे ने अपना नाम विकास बताया, ये बच्चा स्टेशन के बच्चों की टोली में सिनिएर था तो विकास को लगा कि यहाँ उसे भी नाम पूछे जाने पर विकास ही बोलना चाहिए. सुधारगृह के रजिस्टर में ये नाम एक बार दर्ज हुआ तो यही इस बच्चे की पहचान बन गयी. विकास एक सुबह ट्रेन में चढ़ा था  और शाम को पटना स्टेशन पर पंहुचा था. यानि वो पटना से 200 से 300 किलोमीटर की दूरी पर आबाद किसी गांव का होगा. उसे ये भी याद नही है कि वो पटना में किस दिशा से आया था. आज वो पटना में बोली जाने वाली हिंदी बोलता है, लेकिन बकौल उसके बचपन में वो मगही बोलता था.
विकास जो आज 17 साल का है, अपने बचपन की कुछ धुंधली यादों को सीने में संभाले हुए है. वह जिस बस्ती से आया था वहां किसी के पास घर नहीं था, लेकिन सभी लोग अपने अनुसार घरों में रहते थे. दरअसल वो झुग्गी झोपडी की एक छोटी सी बस्ती थी. जब उसने होश सम्भाला तब तक उसके माँ और बाप किसी बीमारी की वजह से मर चुके थे, उसकी झोपडी में वो अपनी दीदी के साथ रहता था. दीदी लोगों के खेतों में मज़दूरी करती थी वैसे ही जैसे इस बस्ती के दूसरे लोग करते थे. दीदी उम्र में काफी बड़ी थी. एक दिन दीदी की शादी हो गयी. जब दीदी की शादी हुई उस वक्त वो वहीं पास में अपने कुछ दोस्तों के साथ खेल रहा था. उसे आज बस इतना याद है कि जिस तरह शहर में शादियाँ होती हैं उस तरह उसकी दीदी की शादी नही हुई थी, लेकिन ये भी याद है कि औरतों ने मिलकर गाने गाये थे. शादी कैसे हुई, इस बारे में भी उसे कुछ साफ़ साफ़ याद नही है लेकिन वो कहता है कि दीदी ने उसी से शादी की जिससे वह प्रेम करती थी. ये बात उसने लोगों से सुनी थी और उसमे अब उसका दुनिया का अनुभव भी शामिल है. उसे ये भी याद है कि जिससे दीदी ने शादी की थी उसका पक्का घर था और वो भी खेतों में काम करता था, लेकिन ये याद नही कि वो अपने ही खेतों में काम करता था या दूसरों के खेतों में मज़दूरी.
शादी के बाद दीदी अपने पति के साथ नही गयी थी बल्कि विकास के साथ झोपडी में थी लेकिन दो दिन बाद जब वो कहीं से खेल कर वापस आया था तो दीदी नही थी, लोगों ने बताया कि वो अपने ससुराल चली गयी. पांच साल के बच्चे के पास असुरक्षा का बोध करने के लिए शायद पर्याप्त समझ नही थी, वैसे भी वो जिस दुनिया में रहता था वहां गरीबी ने लोगों में एक सामूहिकता पैदा कर दी है जहाँ ऐसा बहुत कुछ है जो मेरे तेरे के भेद से परे है. अब इन्ही में एक विकास भी जुड़ गया. लोग अक्सर ही उसे खाना खिला देते, लेकिन ऐसा कई बार होता कि उसे खाना नही भी मिलता, दरअसल वो किसी की जिम्मेदारी नहीं था, अगर वो देर तक बाहर खेलता रह गया तो कोई नहीं था जो उसे पुकारता, कोई नहीं था जो उसके सोने, जागने और खाने की फिक्र करता. वो एक ऐसी दुनिया का बाशिंदा था जहाँ पेट की आग बुझाने के लिए शरीर के सारे खून को पसीने में बदल देना पड़ता है. इस संघर्ष से उपजने वाली खीज अक्सर अपनों पर और अपने आसपास के लोगों पर ही निकलती है. विकास को जाने कैसे ये बात आज भी याद है कि कुछ लोग उसे खाना खिलाने के नाम पर बोलते थे कि जब अपना ही पेट भरने के लाले पड़े हों तो कोई एक और जिम्मेदारी कैसे लेले.  खैर..... विकास आज पटना में रहता है और इस दुनिया की कुछ धुंधली यादें उसमे अभी बाकी हैं लेकिन उस दुनिया में लौटने या अपनी दीदी को ढूढने की ख्वाहिश कम से कम उसके साथ बातचीत में तो नज़र नही आती.
स्टेशन पर बच्चों की एक दुनिया है जहाँ वो पाप और पुन्य से परे अपनी कार्य-योजना बनाते हैं और पूरी तन्मयता के साथ उस पर अमल भी करते है. इनकी दुनिया में भी इश्वर और भगवन है लेकिन जिसकी पकड़ इन पर सबसे ज़्यादा है वो खाकीवर्दी वाला दंडधारी और कहीं भी नज़र न आने वाला लेकिन सर्वव्यापी भूत. इन बच्चों की दुनिया में भूतों के इतने ब्योरे हैं की पूरा भूत पुराण लिखा जा सकता है. स्टेशन के ये बच्चे भीख मांगते हैं, कबाड़ चुनकर बेचते हैं, ट्रेन के डब्बो में छूटे यात्रिओं के सामान उठाकर बेचते हैं, या यूँ कहें कि पेट पालने के हर हथकंडे को यहाँ अपनाया जाता है.
विकास जब स्टेशन पर आया तो अपने साथी की नक़ल करते हुए बोतल चुनकर उसे कबाड़ी वाले के पास बेचने लगा, लेकिन अक्सर ही दुसरे बच्चे उसके पैसे छीन लेते. जैसा वो बताता है, अक्सर ही नये बच्चों के साथ पुराने बच्चे ये  व्यावहार करते है. फक्र के साथ वो ये भी बताता है कि जब वो थोडा पुराना हो गया तो उसने भी उनके पैसे छीने जिन्होंने शुरू में इसके पैसे छीने थे. लेकिन इस छीना-झपटी में ये ज़ख़्मी हुआ, सर फूट गया. लेकिन बच्चों की इस दुनिया में डॉक्टर नही है, चोट लगी तो स्टेशन पर मिला हुआ कपडा पट्टी के तौर पर इस्तेमाल किया गया और वक्त के साथ ज़ख्म ठीक भी हो गये.
हज़ारों तरह के जानवर और दुसरे छोटे-बड़े प्राणी किसी डॉक्टर के पास नहीं जाते. हम इंसानों की दुनिया में ऐसे कितने लोग हैं जिनकी पहुच डॉक्टर तक नहीं है. हमने मिसाइल बनाये, तरह तरह की विलासता के सामान बनाये, मुट्ठी भर अमीरों के लिए उनके ऐश के लिए पूरी दुनिया को ही बाज़ार बना डाला लेकिन हम आम आदमी को खाना, कपडा, मकान और चिकित्सा नही दे पाए. लेकिन शुक्र है अभी प्रकृति यानि हवा सूरज और पानी ने आदमी आदमी में भेदभाव करना नहीं सीखा है, तो वक्त के साथ विकास जैसों के घाव भर ही जाते हैं. लेकिन हवा, पानी, मिटटी और सूरज बहुत दिन तक विकास जैसों की मदद नहीं कर पाएंगे. जिस तेज़ी से हम चुटकी भर सुख के लिए टनों ज़हर प्रकृति की कोख में उड़ेल रहे हैं उससे तो यही लगता है कि बहुत दिन तक हम जीने लायक हवा और पानी फ्री में नही पा सकेगे. सोचिये तब विकास जैसे बिन माँ और बाप के बच्चों का क्या होगा.
स्टेशन पर रहते हुए विकास ने वक्त से दो दो हाथ करना सीख लिया और मज़े से जीने लगा. अब वो न सिर्फ सर्दी और गर्मी का मुकाबला कर सकता था बल्कि कूड़े के ढेर पर पड़ी रोटी के लिए तेज़ दौड़ लगाकर अपने दोस्तों को हरा सकता था, कुत्ते से पहले खाने तक पहुँच सकता था यही नहीं पुण्यात्माओं द्वारा भोजन वितरण में भी भोजन बांटने वालों तक सफलतापूर्वक पहुच सकता था. स्टेशन पर अगर चोरी हो जाये और खाकी वर्दी वाले चोर खोजने निकलें तो नियम से सभी बच्चों को भागना था, विकास ने इसे भी सीख लिया था. मामला कुछ भी हो, वर्दी वालों से बिलकुल नही उलझना था और उनसे बचकर निकल लेना था. उसने ये भी सीख लिया था कि वर्दी वाले बस पीटते हैं और जेल भेज देते हैं ये जानने की कोशिश भी नहीं करते कि गुनाहगार कौन है लेकिन इनसे बचने का एक मात्र रस्ता है भागना. तो बकौल विकास के स्टेशन के सभी बच्चे सबसे पहले भागना सीखते हैं. ये भागना बहुत काम आता है. आप चोरी करें, खाने के लिए लड़ाई करें या पुण्यात्माओं से भोजन हासिल करना हो, ये भागना सभी जगह मददगार साबित होता है.
एक गिरोह है जो बच्चों को पकड़ कर बेच देता है, एक और गिरोह है जो बच्चों को पकड़ कर उनकी किडनी निकाल लेता है, एक और गिरोह है जो बच्चों को लूला, लंगड़ा बनाकर भीख मंगवाता है. ये वो ज्ञान है जो स्टेशन पर आने वाला हर नया बच्चा पुराने बच्चों से सीखता है लेकिन ये किसी को नही मालूम कि सबसे पहले बच्चों को ये ज्ञान किसने दिया था. आप भी विचार कीजिये कि क्या बच्चों का ये ज्ञान निराधार है? इस ज्ञान का ही परिणाम है कि ये बच्चे हर अजनबी को चौकन्नी नज़र से देखते हैं
विकास ने लगभग तीन साल स्टेशन पर गुज़ार लिया था जब एक समाजसेवी संस्था से इन बच्चों की मुलाकात हुई. आपकी सुविधा के लिए इस संस्था को हम बालमित्र का नाम दे देते हैं. बालमित्र के लोगों से उसकी मुलाकात हुई. लेकिन पहली नज़र में इस संस्था के लोगों पर भरोसा नही किया गया. हाँ, उनकी लगातार कोशिशों के बाद बच्चों ने उन पर भरोसा करना शुरू किया.
स्टेशन पर चोरी होना आम बात है. विकास बताता है कि जब चोरी होती तो पुलिस सबसे पहले उसके जैसे बच्चों पर निशाना साधती, नतीज़तन सारे ही बच्चे ऐसे मामलों में एक साथ भागते और उनके भागने की वजह से उन्हें चोर मान भी लिया जाता था. बालमित्र ने विकास जैसों की ज़िन्दगी को पटरी पर लाने की कोशिश की. विकास को रहने और खाने का मुकाम मिला साथ ही उसे साइकिल बनाने का प्रशिक्षण भी दिया जाने लगा. अभी तीन महीने ही गुज़रे थे कि एक दिन एक लड़के से लड़ाई हो गयी, पुलिस और आम लोगों की मारपीट को देख और भोग चुका विकास डर गया और भाग कर एक बार फिर स्टेशन पर आ गया.
स्टेशन वैसे तो इन बच्चों के लिए किसी खूंखार जंगल से कम नही है लेकिन खास बात ये है कि इस जंगल के सारे खतरों से बच्चे वाकिफ़ हैं, उन्हें पता है कब भागना है और कब मुकाबला करना है और कब खामोश रहकर बस देखना है. हो सकता हमारी दुनिया के सभ्य लोग अपनी दुनिया को बेहतर मानते हों लेकिन जब इन बच्चों की नज़र से हम हमारी दुनिया को देखते हैं तो पाते हैं ये इतनी खतरनाक दुनिया है कि बच्चे तो क्या बड़े भी यहाँ आकर खतरों का मुकाबला नहीं कर पाते. वो चेहरा जिस पर ममता नज़र आती है उसी चेहरे पर कब एक खतरनाक पिशाच नज़र आने लगेगा, ये अनुमान लगाना मुश्किल है.
विकास ने एक बार देखा था कि एक बच्चे को चोरी करने की वजह से पब्लिक ने बहुत पीटा था, इसलिए उसने चोरी न करने का फैसला किया था. वो हमेशा अपने फैसले पर क़ायम रहा या नही ये नहीं मालूम. लेकिन उसे ये ज़रूर मालूम हो चुका है कि चोरी के बिना भी ज़िन्दगी बिताने के ज़राये मौज़ूद हैं. वो बताता है कि अक्सर सफ़र के दौरान मुसाफ़िरों के सामान ट्रेन में छूट जाते हैं. जैसे ही मुसाफिर बाहर जाते हैं विकास जैसे बच्चे एक-एक सीट की जाँच-पड़ताल करते हैं और कई बार उन्हें कुछ कीमती सामान मिल भी जाता है. इन सामानों को बेचकर पैसा हासिल करना भी आसान नही है. अक्सर यही माना जाता है कि बच्चे ने चोरी की है, ऐसे में या तो कोई उस सामान को फ्री में हासिल करने की कोशिश करता है या औने पौने दाम मिलते हैं. किसी पुलिस वाले की निगाह पड़ गयी तो पैसा तो गया मार खाने की संभावना भी रहती ही है.
स्टेशन पर कई बार कुछ बड़ी चोरियां भी हो जाती हैं, ऐसे में पुलिस के आसान शिकार होते हैं ये बच्चे. ऐसे ही एक बार एक चोरी के मामले में विकास और उसके जैसे कई बच्चों को पुलिस ने पकड़ लिया और सुधारगृह पहुचा दिया. मैंने जानना चाहा कि क्या पुलिस हमेशा ही गलत होती है, क्या वो सिर्फ परेशान करने के लिए ही बच्चों को पकड़ लेती है? उसका कहना था कि कुछ बच्चे चोरियाँ करते हैं और अक्सर वो पैसे और छोटे सामान ही चुराते हैं जिसे आसानी से बेचा जा सके. लेकिन बड़ी चोरियां अक्सर अलग तरह के गिरोह वाले करते हैं, अगर विकास की मानें तो  पुलिस अक्सर ही इन्हें नही छूती और उनके चोरी का इलज़ाम भी इन्ही बच्चों पर डाल दिया जाता है.
सुधरगृह में कुछ रोज़ रहने के बाद विकास और उसके साथी तीन दिन की कोशिश में ग्रिल काटने में कामयाब रहे और रात में भाग लिए. इन बच्चों ने अपने अनुभव से ये भी जान लिया था कि भाग कर तुरंत स्टेशन पर नहीं जाना है क्योंकि पुलिस तलाशने के लिए पहले स्टेशन ही जायेगी. बच्चों ने एक रात गाँधी मैंदान में गुज़ारा और अगले दिन अपनी पुरानी दुनिया, यानि कि स्टेशन पर आ गये. आज़ादी के सिर्फ तीन दिन ही गुज़रे थे कि पुलिस ने इन्हें दुबारा गिरफ्तार कर सुधारगृह पहुचा दिया. तीन दिन के क़ैद के बाद एक बार फिर ये टोली भागने में कामयाब रही और इस बार पटना में ही पूरे एक महीना पुलिस से बचने में कामयाब हो गयी. एक महीने बाद पुलिस ने इन्हें फिर से सुधारगृह की चारदीवारी के अन्दर पंहुचा दिया. यहाँ एक दिन एक बच्चे की तबीयत ख़राब हो गयी और सब लोग उसको देखने लगे, इसी बीच सबकी निगाह बचाकर विकास भागने में कामयाब रहा, लेकिन वो दूर जा पाता इससे पहले ही एक कर्मचारी की निगाह उस पर पड़ गयी और उसने विकास को दौड़ा लिया. दौड़ा-भागी तो काफी हुई लेकिन विकास बचकर निकल जाने में कामयाब रहा.
इसी दौरान दो सामाजिक कार्यकर्ताओं से उसकी मुलाक़ात हुई, ये कोई पहली मुलाकात नही थी बल्कि वो इन महिलाओं को पहले से भी जनता था जो उसे हर मुलाकात में समझा बुझा कर अपनी संस्था में ले जाना चाहती थी. विकास भी रोज़ की भागादौड़ी से बाहर निकलना चाहता था इसलिए उसने इनकी बात मान ली और इस तरह इस संस्था द्वारा चलाये जाने वाले हॉस्टल में आ गया. आज वो इसी हॉस्टल में कक्षा 8 का छात्र है और इस सभ्य दुनिया का हिस्सा बनने की कोशिश कर रहा है.
सुधारगृह से भागने के बाद विकास ने नशा करना सीखा. इसका कारण भी अजीब है, उसे उसके सीनियर दोस्तों ने बताया कि नशा करने से पुलिस या पब्लिक की मार आसानी से सही जा सकती है क्योंकि इससे चोट लगने का एहसास नही होता. एक बार बच्चों की इस मानसिकता पर विचार कीजिये. हमारे और आपके बच्चों जैसे ये भी हैं और हमारी ही दुनिया में रहते हैं. ये बच्चे मानकर चल रहे हैं कि मार तो खानी ही है, इससे बचने का कोई उपाय उनकी दुनिया में नही है, लेकिन इस मार पीट को सहा जा सके इसका उपाय बच्चों ने ढूढ़ लिया है. एक ऐसा उपाय जो धीरे धीरे उन्हें मौत के करीब ले जाता है, एक ऐसा उपाय जो उनके चेहरे से मुस्कान और पैरों से भागने की ताकत छीन लेता है, एक एसा उपाय जो उन्हें हमारी नफरतों के और और करीब लाता है.
विकास का अपना एक परिवार है, जिसमे कई सारे बच्चे हैं कुछ एन जी ओ में हैं तो कुछ अभी स्टेशन पर वो उनसे मिलता जुलता है लेकिन वो कुछ और भी चाहता है. जो कुछ आज उसके पास है उससे ज़्यादा. वो कहता है कि जब दुसरे बच्चों के माँ बाप उनसे मिलने आते हैं या बच्चे अपने घर जाते हैं तो उसे लगता है कि उसके माँ बाप क्यों नही है, क्यों कोई उससे भी मिलने नही आता. वो भी कहीं किसी घर जाना चाहता है जहाँ उसका भी कोई इंतजार करता हो, जहाँ उसे अपने परिवार जैसा प्यार मिले. जब वो ये सब बताता हैं तो उसकी ऑंखें छलक पड़ती हैं जिसे वो सर झुकाकर छुपाने की कोशिश करता है, लेकिन बेबस होकर सुबुकने लगता है. फिर बड़ी मुश्किल से कहता है कि दिल चाहता है कि किसी ट्रेन के नीचे जाकर मर जाऊं, इस ज़िन्दगी का आखिर उपयोग ही क्या है. मैं उसे गले लगता हूँ और उसकी सिसकियाँ बढ़ जाती हैं.


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