वो एक मज़बूत कदकाठी का इन्सान था, पत्थर तोड़ रहा था। आंसू पसीना बनकर बह रहे थे और हथौडे की आँखों से बेबसी की चिंगारियां निकल निकल कर फ़ज़ा में ग़ुम हो रही थीं। लेकिन वहीँ पास में एक नन्हा पौधा अपनी मासूम मुलायम जड़ों को पत्थर के सीने में उतार कर अपनी ग़िज़ा हासिल कर रहा था और फ़ज़ा में बिखेर रहा था अपनी खुशबु।
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