Monday, 2 January 2017

दवा जो दर्द बन गया

दवा जो दर्द बन गया
आज जब हमारे बीच बात बड़ी कंजूसी से और नाप तौल के होती है तब ऐसे लगता है जैसे परेशान होकर किसी को उसके हाल पर छोड़ दिया गया हो लेकिन वो सच में मर न जाए यह सोच कर कभी कभी उसके सामने रोटी का एक टुकड़ा डाल दिया जाता हो. क्या और कहाँ गडबड हुई, अक्सर मैं इसका हिसाब किताब लगता हूँ.
जब एक बार लम्बे अन्तराल के बाद तुम मेरे सीने से लगी थीं और तुरंत ही एक हाथ अपने उरोजो और मेरे जिस्म के बीच लगा लिया था तब पहली बार मुझे लगा था कि तुम अब जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुकी हो. पर इसी वक्त एक और बात हुई थी जो सिर्फ मैं जानता हूँ.
ये वही दौर था जब एक मेरा एक जज़्बाती रिश्ता काफी ज़द्दोजहद के बाद टूटा था और मैं जज़्बाती तौर पर बुरी तरह परेशान था. मेरे भीतर एक गहरी उदासी ने घर कर लिया था जिसे छुपाने की भरपूर कोशिश में मेरी जिंदगी बेतरतीबी से सराबोर थी. लेकिन जिस पल तुम सीने से लगी थी पता नही क्या हुआ था जो मैं एक पल में हल्का महसूस करने लगा था. बाद के दिनों में मैंने अक्सर ही एसा महसूस किया था और जब तक तुम साथ रहती मैं खुद को बेहतर महसूस करता. मैंने बहुत बार इसे समझना चाहा लेकिन आज तक नहीं जान पाया कि वो क्या चीज़ है तुममे जो मुझे छूते ही मेरी दवा बन जाती है!
ये भी कमाल ही था कि ज़िन्दगी ने हमे साथ रहने का मौका दिया और मैं अनजाने अनचाहे तुम्हारा तलबगार बनता चला गया. तुम मेरे पास आईं, मेरी आगोश में और जिंदगी में भी, लेकिन मेरी ख्वाहिशों का मरकज़ होने के बावजूद भी तुमने खुद को मेरी महबूबा कभी नही मन, मुझे कभी कोई तसल्ली नही दी, लेकिन तुम्हारा अंदाज़-ए-गुफ्तुगू और मेरे लिए तुम्हारी बेबाकी ने मुझे हमेशा गलत फहमी का शिकार बनाये रखा. जब तक तुम साथ थी तुम्हारा साथ ही मेरे लिए दवा का काम करता रहा लेकिन जब तुम्हारा साथ छूटा तो ये दवा ही दर्द बन गया.
तुमसे मिलने से पहले जिस दर्द और उदासी में मुब्तिला था तुमने उससे निजात दिलाई लेकिन अब तुमसे जो दर्द हासिल हुआ है उसका कोई इलाज नही.



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