Monday, 23 January 2017

खुदा जब हंस पड़ा

मेरी उम्र कुछ खास नहीं थी जब एक दिन मैं खेलते खेलते धर्म के अखाड़े में पहुँच गया था। वहां कई धर्मों के पहलवान गुत्थम गुत्था थे। मेरी हैरानी का उस वक्त कोई ठिकाना नही रहा जब मैंने एक ही धर्म के अलग अलग गुटों को एक दुसरे से लड़ते देखा। जब ये पहलवान आपस में लड़ रहे थे तब उसी वक्त मेरे अब्बू और मेरे मामू भी आपस में लड़ रहे थे। दरअसल ये दोनों दो पहलवानों के गुटों को अपने अपने तौर पर खुदा का एजेंट मानते थे। मामू और अब्बू की आपसी लड़ाई की कीमत अम्मी के साथ ही हम भाई बहनों ने चुकाई।
जब मेरी नज़रें मज़हब और इनके ठेकेदारों से मिलने के काबिल हुई तो मैंने पाया कि ये सारे पहलवान कुछ अजीब तरह से बने थे, इनके दिमाग खास तरह से काम करते थे और इनके  दिल का दरिया सूख चुका था। इनकी आँखें आग तो बरसा सकतीं थीं लेकिन मोहब्बत या गम के आंसू इनमे नहीं आते थे। ये जब बोलते थे तो खिले फूल मुरझा जाते थे और कलियां खिलने से इनकार कर देती थीं। सूरज के पर्दा करने के बाद अगर इनकी आवाज़ फ़ज़ा में गूंजती थी तो जुगनू जाने कहाँ छुप जाते थे और शबनम ज़मीन तक पहुंचने से पहले ही कहीं खो जाती थी।
मुझे मेरे मामू भी प्यारे थे और अब्बू भी। मैं दोनों से सवाल करता, जब तक वो चाहते जवाब देते वरना ज़ोर से डांट देते ! ये सिलसिला बहुत दिनों तक चला, फिर एक रात अचानक चंदा मामू ने मुझे अपनी ऊँगली पकड़ाई और मुझे खुदा के पास ले गए। मेरी उम्मीदों के बरक्श वो मुझे बिलकुल मस्तमौला लगे। उन्होंने मुझे चाँद पर बैठी बुढ़िया नानी की गोद में बिठा दिया और मेरे साथ धरती पर मज़हबी पहलवानों की जंग देखने लगे। मैं देख कर हैरान था कि इस मारकाट को रोका क्यों नही जा रहा था ? आख़िर मैंने खुदा से पूँछ ही लिया... और फिर उसने कहा कि ये पहलवान बड़े खतरनाक हैं और वो खुद भी इनसे डरता है। ... और ऐसा कह कर उसने ज़ोर का ठहाका लगाया।

No comments:

Post a Comment