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Wednesday, 23 January 2019

रोशनी उम्रदराज़ हो

जब उसे मैंने पहली बार देखा, तो ऐसा लगा जैसे कोई दिया रोशनी का अलम थामे लड़खड़ा रहा है क्योंकि तेल की आख़िरी बूंद चुकने को है। ये उन दिनों की बात है जब मैं ऐसी सूरत में दिए कि बाती बन खुद जलने लगता था, और कई दियों की रोशनी बचाने में कामयाब हुआ था। तो उसने मेरी उंगली थाम ली और चल पड़ी रोशनी के निशानात पर आहिस्ता आहिस्ता। मैंने बुझते दिए में जान डालने की कोशिश की, काफी अरसा गुज़रा जब दिया रोशन हुआ और दूसरे दियों को रोशन करने की कूवत भी हासिल कर ली। इस दौरान मैंने ज़िन्दगी के खाते से कुछ बेहद ज़रूरी साल खर्च कर दिए।

उसका दिया तो रोशन हुआ, लेकिन इन तमाम सालों में कब मैं उस दिए का तलबगार बन गया, ये पता ही नहीं चला। उसे भी मालूम था कि उसे रोशन करने के लिए इन तमाम सालों में मैं जलता रहा हूँ, कि मेरे जलते रहने की कूवत कम हुई है, कि मैं बिना मदद बहुत दिनों तक यूँ ही रोशनी न बिखेर सकूंगा। लेकिन उसे तो बस रोशनी की तलब थी, रोशनी मिली और उसने एक अलग राह पकड़ ली। एक ऐसी राह जिस पर मेरा गुज़र न था, एक ऐसी राह जिसे मेरी राह से टकराना न था, एक ऐसी राह जिस पर चलते चलते यूँ ही कहीं मिल जाना, नहीं होना था।

ख़ैर, मेरा जीवन दीप अभी तक जल रहा है, दिए में तेल कम हुआ है, रोशनी की तासीर पहले जैसी नहीं है, फिर भी दूसरे दिए भी जलते रहें, ये कोशिश रहती है। लेकिन रोशनी के तलबगार चरागों ने मेरा रुख़ करना छोड़ दिया है। उन्होंने मान लिया है कि इस दिए में अब तेल बाकी न रहा। और मैं हूँ कि जले जा रहा हूँ कि रोशनी उम्रदराज़ हो !

Friday, 28 July 2017

राख का मुजस्समा

हम साथ थे,
उसे रोशनी की ज़रूरत थी
उस वक्त मेरे पास मेरे सिवा और कुछ न था
मैंने खुद को जलाकर उसे रोशन किया
मैं जल कर रौशन  हुआ और वो मेरे जलने से
आज, सदियों बाद,
वो रौशनी का मुजस्समा है और मैं राख का

Monday, 6 February 2017

मेरी खुशबुएँ

मैं बस फूल हूँ, मेरा वजूद बस सूरज के उगने से दिन चढ़ने तक है। लेकिन इतनी देर में मैं फ़ज़ा में बिखेर देता हूँ अपनी खुशबुएँ। दरअसल ये सिर्फ खुशबुएं नहीं है, ये मेरी मोहब्बत है। तुम्हारे दूर बहुत दूर चले जाने के बाद मैंने महसूस किया कि तुम्हारी महक मेरी सांसो में मौजूद है, मैंने अपनी उंगलियों को हवा के नर्म मुलायम जिस्म पर तैरा कर देखा तो मुझे तुम्हारे जिस्म की हरारत महसूस हुई। बस, उस रोज़ से मैंने अपनी खुशबुएँ हवा के हवाले ये सोच कर कर दिया कि अगर इसके पास तुम्हारा जिस्म और उसकी खुश्बू है तो मुझे भी इस हवा के साथ मिल जाना चाहिए। मेरी जड़ें हालात की मिट्टी में कहीं गहरे गड़ी हुई हैं लेकिन खुशबुओं पर वक्त और हालात का कोई पहरा नही। तो बस तब से मेरी मोहब्बत खुशबुओं की शक्ल में हवा के परों पर सवार तुम तक पहुँच रही है। है न वस्ल का ये भी एक नायाब तरीका.!!

Monday, 23 January 2017

खुदा जब हंस पड़ा

मेरी उम्र कुछ खास नहीं थी जब एक दिन मैं खेलते खेलते धर्म के अखाड़े में पहुँच गया था। वहां कई धर्मों के पहलवान गुत्थम गुत्था थे। मेरी हैरानी का उस वक्त कोई ठिकाना नही रहा जब मैंने एक ही धर्म के अलग अलग गुटों को एक दुसरे से लड़ते देखा। जब ये पहलवान आपस में लड़ रहे थे तब उसी वक्त मेरे अब्बू और मेरे मामू भी आपस में लड़ रहे थे। दरअसल ये दोनों दो पहलवानों के गुटों को अपने अपने तौर पर खुदा का एजेंट मानते थे। मामू और अब्बू की आपसी लड़ाई की कीमत अम्मी के साथ ही हम भाई बहनों ने चुकाई।
जब मेरी नज़रें मज़हब और इनके ठेकेदारों से मिलने के काबिल हुई तो मैंने पाया कि ये सारे पहलवान कुछ अजीब तरह से बने थे, इनके दिमाग खास तरह से काम करते थे और इनके  दिल का दरिया सूख चुका था। इनकी आँखें आग तो बरसा सकतीं थीं लेकिन मोहब्बत या गम के आंसू इनमे नहीं आते थे। ये जब बोलते थे तो खिले फूल मुरझा जाते थे और कलियां खिलने से इनकार कर देती थीं। सूरज के पर्दा करने के बाद अगर इनकी आवाज़ फ़ज़ा में गूंजती थी तो जुगनू जाने कहाँ छुप जाते थे और शबनम ज़मीन तक पहुंचने से पहले ही कहीं खो जाती थी।
मुझे मेरे मामू भी प्यारे थे और अब्बू भी। मैं दोनों से सवाल करता, जब तक वो चाहते जवाब देते वरना ज़ोर से डांट देते ! ये सिलसिला बहुत दिनों तक चला, फिर एक रात अचानक चंदा मामू ने मुझे अपनी ऊँगली पकड़ाई और मुझे खुदा के पास ले गए। मेरी उम्मीदों के बरक्श वो मुझे बिलकुल मस्तमौला लगे। उन्होंने मुझे चाँद पर बैठी बुढ़िया नानी की गोद में बिठा दिया और मेरे साथ धरती पर मज़हबी पहलवानों की जंग देखने लगे। मैं देख कर हैरान था कि इस मारकाट को रोका क्यों नही जा रहा था ? आख़िर मैंने खुदा से पूँछ ही लिया... और फिर उसने कहा कि ये पहलवान बड़े खतरनाक हैं और वो खुद भी इनसे डरता है। ... और ऐसा कह कर उसने ज़ोर का ठहाका लगाया।

Sunday, 22 January 2017

गर तुम वापस आओ

तुमने ये तो देखा कि मेरे जिस्म में वक्त ने एक तवील सफ़र तय कर लिया है, लेकिन तुम्हे ये दिखाई नहीं पड़ा कि मैंने मेरे जिस्म का साथ कब का छोड़ दिया है और अभी तक वहीँ ठहरा हूँ जहाँ हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी, आज भी मैं उन्हीं चुम्बनों में मौजूद हूँ जिनकी हरारत मेरे लबों पर अब भी बरकरार है। मेरी उंगलियों के पोरों पर तुम्हारे जिस्म की सिहरन अब भी मौजूद है। हाँ वक्त ने मेरे जिस्म में एक तवील सफ़र तय किया है मगर मैं मेरे जिस्म का साथ कहाँ दे पाता हूँ !
तुम आओगी तो नहीं पर अगर आ सको तो वक्त को भी खींच कर वहीँ ले आएंगे जहाँ हम मिले थे, के जहाँ पहली बार हमने एक दुसरे को चूमा था, के जहाँ पहली बार मेरे जिस्म ने तुम्हारे जिस्म को महसूस किया था, के जब पहली बार हमने एक दुसरे के जिस्म पर जिस्म से अशआर लिखे थे। हाँ ये मुमकिन है अगर तुम वापस आ सको !

Saturday, 21 January 2017

दरख़्त

वक़्त के आगोश से तुम गुज़र रही हो और मैं भी वक्त की गोद में दरख़्त की मानिंद खड़ा हूँ। मुझे मालूम है कि तुम्हारा यूँ गुज़रना बस तुम्हारी खुद की मौज के लिए है, मेरे होने या न होने से तुम्हारी मौज़ को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हो सके तो कभी ठहर कर सोचना, तुम्हारी आगोश में मेरे ही फूलों की खुशबु है, तुम लहराओ कि इठलाओ, मेरी खुशबु ही है जो तुम्हे इज्ज़त बख्शती है, नाम और पहचान देती है। तुम हवा हो, तुम में क़ूवत है और जोश भी, मैं सिर्फ दरख़्त हूँ, ज़मीन से खुराक़ लेता हूँ तो उसकी प्यास मिटाने के लिए हजारों गैलन पानी उसकी रूह् में उतार देता हूँ, तुमसे लेता हूँ सांसे, तो अपनी खुशबुएं कर देता हूँ तुम्हारे हवाले। धरती, सूरज और हवा से जो कुछ हासिल करता हूँ सब लौटा देता हूँ यहीं के लोगों को। लेकिन अब खुदगर्ज़ होने लगा हूँ। बस एक ही ख्वाहिश है कि तुम मेरी खुशबुएँ लेकर गायब न हुआ करो, बल्कि ठहरो मेरे पास, मेरे कानों में सरगोशी किया करो। तुम्हें शायद मालूम नहीं कि मनुष्यों ने मेरे कानों में तुम्हारी सरगोशियां सुनकर ही सात सुरों की रचना की है। अब मैं भी इन सुरों को गाना चाहता हूँ, पर ये तभी मुमकिन है जब कि तुम ठहर जाओ और ले लो मुझे अपनी आगोश में !!

Wednesday, 11 January 2017

बस इक उम्मीद

जब मैं इन्सान के रूप में पैदा होने की कोशिश में था तभी किसी ने कहा था कि दिल की बात दिल तक ज़रूर पहुँचती है। फिर वक्त बड़ी तेज़ी से मुझमे दौड़ने लगा। मेरा जिस्म वक्त के साथ साथ चल रहा था लेकिन मैं वक्त से बहुत पीछे एक मामूली से पड़ाव पे ठहर गया था। दरअसल मेरे दिल में एक बात थी जिसे एक और दिल तक पहुंचना था। जिस दिल तक ये बात पहुंचनी थी उसका मालिक मेरे जिस्म के करीब करीब साथ ही था, लेकिन मुझे ऐसा महसूस होता है कि उसके दिल तक मेरी बात नही पहुँची। तो भले ही जिस्म वक्त के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रहा है, मैं वहीँ खड़ा हूँ जहाँ से उसके एक और बार गुज़रने की उम्मीद है ।

Sunday, 8 January 2017

तूफान की किर्चियाँ

कभी खिजां तो कभी मौसमे बहार तो कभी तूफ़ान भी.. वक्त की ज़िन्दगी में इनका आना जाना मौसिकी के उतार चढ़ाव की मानिंद है। ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था कि उसकी ज़िन्दगी एक बार तूफान के ज़द में आ गयी। तूफान के असरात ने उसे इस क़ाबिल ही न रखा कि वो फिर मौसमे बहार में फूलों की खुशबुओं को जिस्म पे लपेट कर तितलियों संग उड़ पाती। जब ये सब उसके साथ हो रहा था तब वक्त के पंखों पर सवार मैं काफी आगे निकल चुका था और वक्त मेरे भीतर भी एक लंबी दूरी तय कर चुका था। इस सफर से मैंने जान लिया था कि जब तूफ़ान आये तो वक्त के जिस्म पर हालात की चादर लपेट देनी चाहिए और जब मौसमे बहार से रूबरू हों तब भी इस चादर को दूर नही फेंकनी चाहिए। उस वक्त भी इस चादर को वक्त के कंधे पर टांगे रखना चाहिए जब नरम मुलायम पुरवाई वक्त के जिस्म में गुदगुदी कर रही हो...!  तो  भले ही वक्त मुझमे बहुत दूर तक सफ़र कर चुका था, मैं उससे मिला और इस मिलन से कुछ ऐसा हुआ की मैं जिस्म को बहुत पीछे छोड़कर अपनी रूह को हथेली में लिए हुए उसके पास आ गया। मैंने देखा तूफ़ान ने उसके जिस्म की रंगत बिगाड़ दी थी ।
मैंने अपनी रूह् को जलाकर रौशनी की और इस रौशनी में चुनने लगा उसके जिस्म से तूफ़ान की किर्चियाँ। किर्चियाँ निकलती रहीं और बहार उसके भीतर से खिलती रही आहिस्ता आहिस्ता। कई साल लगे जब उसके जिस्म से मैंने आख़िरी किर्ची निकली। और इस आखिरी किर्ची के निकलने के साथ खुशबुएँ लिपट गयीं उसके जिस्म से और वो उड़ गयी तितलियों के साथ।
अब तक मेरी रूह् जल चुकी थी और जिस्म तूफानों की ज़द में आ चुका था पर कोई न था जो निकलता मेरे जिस्म से तूफ़ान की किर्चियाँ।

....... अरशद

Monday, 2 January 2017

दवा जो दर्द बन गया

दवा जो दर्द बन गया
आज जब हमारे बीच बात बड़ी कंजूसी से और नाप तौल के होती है तब ऐसे लगता है जैसे परेशान होकर किसी को उसके हाल पर छोड़ दिया गया हो लेकिन वो सच में मर न जाए यह सोच कर कभी कभी उसके सामने रोटी का एक टुकड़ा डाल दिया जाता हो. क्या और कहाँ गडबड हुई, अक्सर मैं इसका हिसाब किताब लगता हूँ.
जब एक बार लम्बे अन्तराल के बाद तुम मेरे सीने से लगी थीं और तुरंत ही एक हाथ अपने उरोजो और मेरे जिस्म के बीच लगा लिया था तब पहली बार मुझे लगा था कि तुम अब जवानी की दहलीज़ पर कदम रख चुकी हो. पर इसी वक्त एक और बात हुई थी जो सिर्फ मैं जानता हूँ.
ये वही दौर था जब एक मेरा एक जज़्बाती रिश्ता काफी ज़द्दोजहद के बाद टूटा था और मैं जज़्बाती तौर पर बुरी तरह परेशान था. मेरे भीतर एक गहरी उदासी ने घर कर लिया था जिसे छुपाने की भरपूर कोशिश में मेरी जिंदगी बेतरतीबी से सराबोर थी. लेकिन जिस पल तुम सीने से लगी थी पता नही क्या हुआ था जो मैं एक पल में हल्का महसूस करने लगा था. बाद के दिनों में मैंने अक्सर ही एसा महसूस किया था और जब तक तुम साथ रहती मैं खुद को बेहतर महसूस करता. मैंने बहुत बार इसे समझना चाहा लेकिन आज तक नहीं जान पाया कि वो क्या चीज़ है तुममे जो मुझे छूते ही मेरी दवा बन जाती है!
ये भी कमाल ही था कि ज़िन्दगी ने हमे साथ रहने का मौका दिया और मैं अनजाने अनचाहे तुम्हारा तलबगार बनता चला गया. तुम मेरे पास आईं, मेरी आगोश में और जिंदगी में भी, लेकिन मेरी ख्वाहिशों का मरकज़ होने के बावजूद भी तुमने खुद को मेरी महबूबा कभी नही मन, मुझे कभी कोई तसल्ली नही दी, लेकिन तुम्हारा अंदाज़-ए-गुफ्तुगू और मेरे लिए तुम्हारी बेबाकी ने मुझे हमेशा गलत फहमी का शिकार बनाये रखा. जब तक तुम साथ थी तुम्हारा साथ ही मेरे लिए दवा का काम करता रहा लेकिन जब तुम्हारा साथ छूटा तो ये दवा ही दर्द बन गया.
तुमसे मिलने से पहले जिस दर्द और उदासी में मुब्तिला था तुमने उससे निजात दिलाई लेकिन अब तुमसे जो दर्द हासिल हुआ है उसका कोई इलाज नही.



Saturday, 30 July 2016

जीने की राह


जीने की राह 

अनीस नही जतना था कि शादी क्या होती है जब उससे  कहा गया कि अनम से  उसकी शादी होगी, आखिर दस साल की उम्र में ये समझ में आता भी तो कैसे, पर उसे अच्छा लगा था. उसे अच्छा क्यों लगा था ये उसे आजतक नही मालूम. पर हाँ हर गर्मी की छुट्टी में वो अपनी दूर की रिश्तेदार जिसे वो खाला कहता था, के घर जरूर जाता जिनकी बेरी अनम बड़ी होकर उसकी दुल्हन बनने वाली थी. वो उसके और उसकी बहनों व सहेलियों के साथ खेलता खूब मजे करता पर जब अनम अकेले होती उससे बात न कर पता, उसे इसकी वजह भी आजतक नही मालूम. वक्त गुजरता रहा और दोनों बड़े हो गये, पर अनम से बात करने की हिम्मत उसमे आज भी नही थी.
अनीस अब यूनिवर्सिटी का छात्र था और उसके इर्द गिर्द बहुत सारी खूबसूरत लड़कियां थी, इनमे कई लड़कियां ऐसी थी जिनको देख कर अनीस के दिल में गुदगुदी होती थी, लेकिन जब भी ऐसा होता उसे अनम का ख्याल अ जाता और वो ख़ामोशी से वहां से हट जाता. देखते देखते अनीस ग्रेजुएट वो गया और अब अनीस और अनम के शादी के चर्चे सुगबुगाहटो में ही सही पर खानदान में चर्चा-ए-आम थी. पर अनम के माँ बाप को तो जैसे कुछ सुनाई ही नही देता था. अनीस के वालिदैन चाहते थे की बात की शुरुआत अनम के वालिदैन की ओर से हो. 
अनीस की हालत अजीब थी, वो अपने दिल की बेकरारी को अपने ही दिल में जज़्ब कर रहा था क्योंगी उसे पता था कि इस रिश्ते के बीच में अमीरी गरीबी की दिवार है जिसे तोड़े बिना वो अनम तक न पहुंचेगा और अनम की जुबान पर तहजीब के ताले थे. कई साल गुज़र गये पर अनीस अपने लिए एक ढंग की नौकरी नही ढूंढ पाया और इधर अनम के घर में तब्दीलियो का तेज़ दौर शुरू हो गया, अनम के वालिद की सरकारी नौकरी उनकी सारी ताक़त थी जो अब नही थी, ऊपर से पांच बेटिओं की शादी की जिम्मेदारी. हालात तेज़ी से ख़राब होने लगे और इस हडबडाहट में लड़किओं की शादियाँ जैसे तैसे निपटाई जाने लगी. चौथे न. की अनम का भी न. आ ही गया.
अनीस ने एक आखिरी कोशिश करने का फैसला किया, अनम के घर पहुंचा उसके वालिद से बात की पर उन्होंने साफ इंकार कर दिया, एक आखिरी उम्मीद खुद अनम थी, अनीस ने उसके साथ बैठने एक मौका भी निकाल लिया और दोनों करीब घंटे भर एक साथ बैठे रहे. पर अनीस के लबों पर लगा एक अनजान सा ताला न खुला और अनम के लबों पर लगे तहजीब के ताले भी कमज़ोर नहीं पड़े. एक घंटे की हाँ हूँ के बाद दोनों दो अलग रास्तो पर चल दिए.
इस बात को सालों गुजर गये. अब अनम तीन बच्चों की माँ हैं, उसका शौहर एक गरीब मजदूर है पर आज भी तहजीब की दरो दिवार में कैद अनम खुश दिखती है, सच भी यही है या कुछ और ये कोई नही जनता. ....और अनीस अकेला है, उसके वालिदैन उसके लिए लड़की देखते हैं और वो हर लड़की में अनम. अब कुदरत इंसानों की कॉपी तो बनाती नही, पर ये बात अनीस मियां को समझाए कौन. 
अनीस मियां ठीक ठाक कमा लेते हैं और मामूली पैसों में अपना गुज़र करते हुए बाकी पैसों से जरूरतमंद बच्चों की पढाई में मदद करते हैं, वो उनकी काउंसलिंग भी करते हैं जिससे वो सही वक्त पर अपने पैरों पर खड़े हो सकें. हो सकता है इससे कुछ अनीसों को उनकी अनाम मिल जाये