कभी खिजां तो कभी मौसमे बहार तो कभी तूफ़ान भी.. वक्त की ज़िन्दगी में इनका आना जाना मौसिकी के उतार चढ़ाव की मानिंद है। ये महज़ इत्तेफ़ाक़ ही था कि उसकी ज़िन्दगी एक बार तूफान के ज़द में आ गयी। तूफान के असरात ने उसे इस क़ाबिल ही न रखा कि वो फिर मौसमे बहार में फूलों की खुशबुओं को जिस्म पे लपेट कर तितलियों संग उड़ पाती। जब ये सब उसके साथ हो रहा था तब वक्त के पंखों पर सवार मैं काफी आगे निकल चुका था और वक्त मेरे भीतर भी एक लंबी दूरी तय कर चुका था। इस सफर से मैंने जान लिया था कि जब तूफ़ान आये तो वक्त के जिस्म पर हालात की चादर लपेट देनी चाहिए और जब मौसमे बहार से रूबरू हों तब भी इस चादर को दूर नही फेंकनी चाहिए। उस वक्त भी इस चादर को वक्त के कंधे पर टांगे रखना चाहिए जब नरम मुलायम पुरवाई वक्त के जिस्म में गुदगुदी कर रही हो...! तो भले ही वक्त मुझमे बहुत दूर तक सफ़र कर चुका था, मैं उससे मिला और इस मिलन से कुछ ऐसा हुआ की मैं जिस्म को बहुत पीछे छोड़कर अपनी रूह को हथेली में लिए हुए उसके पास आ गया। मैंने देखा तूफ़ान ने उसके जिस्म की रंगत बिगाड़ दी थी ।
मैंने अपनी रूह् को जलाकर रौशनी की और इस रौशनी में चुनने लगा उसके जिस्म से तूफ़ान की किर्चियाँ। किर्चियाँ निकलती रहीं और बहार उसके भीतर से खिलती रही आहिस्ता आहिस्ता। कई साल लगे जब उसके जिस्म से मैंने आख़िरी किर्ची निकली। और इस आखिरी किर्ची के निकलने के साथ खुशबुएँ लिपट गयीं उसके जिस्म से और वो उड़ गयी तितलियों के साथ।
अब तक मेरी रूह् जल चुकी थी और जिस्म तूफानों की ज़द में आ चुका था पर कोई न था जो निकलता मेरे जिस्म से तूफ़ान की किर्चियाँ।
....... अरशद
No comments:
Post a Comment