वक़्त के आगोश से तुम गुज़र रही हो और मैं भी वक्त की गोद में दरख़्त की मानिंद खड़ा हूँ। मुझे मालूम है कि तुम्हारा यूँ गुज़रना बस तुम्हारी खुद की मौज के लिए है, मेरे होने या न होने से तुम्हारी मौज़ को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। हो सके तो कभी ठहर कर सोचना, तुम्हारी आगोश में मेरे ही फूलों की खुशबु है, तुम लहराओ कि इठलाओ, मेरी खुशबु ही है जो तुम्हे इज्ज़त बख्शती है, नाम और पहचान देती है। तुम हवा हो, तुम में क़ूवत है और जोश भी, मैं सिर्फ दरख़्त हूँ, ज़मीन से खुराक़ लेता हूँ तो उसकी प्यास मिटाने के लिए हजारों गैलन पानी उसकी रूह् में उतार देता हूँ, तुमसे लेता हूँ सांसे, तो अपनी खुशबुएं कर देता हूँ तुम्हारे हवाले। धरती, सूरज और हवा से जो कुछ हासिल करता हूँ सब लौटा देता हूँ यहीं के लोगों को। लेकिन अब खुदगर्ज़ होने लगा हूँ। बस एक ही ख्वाहिश है कि तुम मेरी खुशबुएँ लेकर गायब न हुआ करो, बल्कि ठहरो मेरे पास, मेरे कानों में सरगोशी किया करो। तुम्हें शायद मालूम नहीं कि मनुष्यों ने मेरे कानों में तुम्हारी सरगोशियां सुनकर ही सात सुरों की रचना की है। अब मैं भी इन सुरों को गाना चाहता हूँ, पर ये तभी मुमकिन है जब कि तुम ठहर जाओ और ले लो मुझे अपनी आगोश में !!
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