Tuesday, 10 January 2017

मोहब्बत का फ़रिश्ता

वो किसी और दुनिया से आयी थी, उसकी उगलियाँ ऐसी थीं जैसे फूलों की पांखुड़ियाँ और आँखे किसी सितारे की मानिंद. ऐसा लगता था जैसे चाँद के चेहरे पर दो सितारे सजा दिए गये हों. होंठ ऐसे जैसे अधखिले गुलाब ने सूरज की तपिश पाकर बस अभी आंखे खोलीं हो, उसके जिस्म की खुशबु हवाओं में यूँ घुल रही थी जैसे जन्नत का दरवाज़ा खोल दिया गया हो. नाजुक तो ऐसी थी कि छूने से भी डर लगे. उसके आने की खबर दूर दूर तक फ़ैल गयी थी. नफ़रत से भरी इस दुनिया के बाशिंदे मोहब्बत की ख़ुराक पाने के लिए उसके इर्द गिर्द जमा होते और तर तर जाते. उसे बस एक ही काम आता था, मोहब्बत लुटाना.
मैं जब उससे मिला था तो मुझे उसमे कोई दिलचश्पी पैदा नहीं हुई थी. दरअसल मेरी आँखों ने खूबसूरती और बदसूरती के बीच के पहचान की सलाहियत खो दी थी, मेरे नथुने खुशबु और बदबू के दरमियाँ कब से खड़े थे. जिस्म ने छुवन को महसूस करना बंद कर दिया था. सूरज की तपिश बदन को छूती थी, हवाएं जिस्म को सहला सहला कर गुज़रती थी, सर्द हवा के झोकों को रोंगटे खड़े होकर अब भी सलाम करते थे. लेकिन यह सब जिस्म के जिस तल पर होता था वहां मैं सालो से मौजूद ही नहीं था. मुझमे और मेरे जिस्म में कोई गहरा नाता जरूर था क्योंकि मैं ज़्यादा देर तक कभी भी अपने जिस्म से दूर नहीं रहा और मेरे जिस्म ने तो कभी मेरा साथ ही नहीं छोड़ा. पर हम दोनों साथ साथ बहुत कम रहे.
मोहब्बत के इस फ़रिश्ते की बात दूर दूर तक फ़ैल चुकी थी, ये महज़ इत्तेफ़ाक था कि एक दिन मैं उसके सामने पहुँच गया, पर ये सब मुझे बहुत बाद में मालूम हुआ. मुझे बस इतना याद है कि मैं बहुत गहरी नींद से जागा था और अपनी हथेली पर कुछ नरम मुलायम महसूस किया था. अमूमन मैं चौंकता नहीं था पर इस बार मैंने चौंक कर हथेली पर एक गुलाब की पंखुड़ी के मानिंद उंगली देखी और इसी के साथ अपने जिस्म में मीलों गहरे उतरते एक एहसास को महसूस भी किया. ऐसा मेरे साथ कितनी बार हुआ है ये तो नहीं मालूम पर सदिओं पहले जब एक बार जिस्म बुखार की तपिश में जकड़ा हुआ था तब मैंने मेरे भीतर उतरती हुई कुछ उंगलियो को महसूस किया था, ये माँ की उगलियाँ थीं. आज फिर कुछ वैसा ही हुआ था. फिर मैंने निगाह ऊपर उठाई तो देखा सामने दो सितारे थे जिनसे नूर मेरी आँखों में उतरने लगा था, मेरी आँखों से वीरानी गायब हो गयी थी और अचानक से मेरी आँखों ने खूबसूरत और बदसूरत के फर्क को महसूस किया था. मैंने कुछ कहना चाहा था लेकिन उसने मेरे होंठों पर अपनी मासूम और मुलायम उंगली रख दी थी. और तभी मेरे होंठ बुदबुदाने लगे थे कोई गीत. फिर उसकी कुछ उगलियाँ तैर गईं थी मेरे जिस्म पर और इसके बाद ही मेरे जिस्म से सदिओं बाद मेरा राब्ता कायम हुआ था. मैंने न सिर्फ मेरे जिस्म को महसूस किया था बल्कि अब मैं धूप की तपिश, बदन को छूकर सरगोशियाँ करती हवाएं और मौसम के सर्द एहसास को भी महसूस कर सकता था. गोया अब मैं एक मुकम्मल इन्सान था.
मैं अपने आप में कितनी देर तक खोया रहा इसका ठीक ठीक मुझे कोई पता नही लेकिन जब मैंने आसपास की फज़ा में तब्दीली महसूस की और सब तरफ़ गौर से देखा तो वो वहां वो नही थी. लोग मुझ पर जोर जोर से चीख रहे थे और कह रहे थे कि उसने मुझे मोहब्बत से कितनी देर तक पुकारा पर मैं तो बुत बना बस बैठा रहा और वो थककर चली गयी. मैंने उसके जाने की दिशा मालूम की और एक अनजाने सफ़र पर निकल गया. सैकड़ों साल तक मैं चलता रहा. मैंने धरती, चाँद और सितारों की दुनिया का एक एक गोशा छान लिया लेकिन वो नहीं मिली.
अभी जब मैं रिवायत नामी चुडैलों की दुनिया से गुज़र रहा था तभी चुडैलों की एक मासूम बेटी ने आकर मेरी उंगली पकड़ ली. उसने पूछा कि क्या मैं वही हूँ जिसे मोहब्बत के फ़रिश्ते ने पत्थर से इन्सान बनाया था? मैंने उसे गोद में उठा लिया, उसका माथा चूमा और कहा हाँ मैं वही हूँ. उसने कहा मुझे मोहब्बत के फ़रिश्ते की तलाश छोड़ देनी चाहिए, ऐसा करना ही मेरे लिए फायदेमंद होगा. लेकिन जब मैंने उसे बताया कि उस फ़रिश्ते को ढूंढना ही मेरा वाहिद मकसद है तो वो मेरी गोद से उतर गयी और मुस्कराकर मेरे क़दम चूम लिए. वो एक तरफ को भाग गयी लेकिन जाते जाते उसने कहा कि मोहब्बत का फ़रिश्ता शैतानी दुनिया के कैदखाने में है, जिसके पहरेदार बेहद ख़तरनाक हैं और कैदखाने की दीवारे ऐसी कि पास जाने वालों को निगल ही जाएँ. उस पर ये कि इन्हें आसानी से देखा भी नही जा सकता. पर उस मासूम लड़की ने कहा कि अगर तुम बिलकुल साफ़ साफ़ देख सकते हो, तुम्हारा ज़ेहन पाक है और तुम्हरा दिल मोहब्बत से लबरेज़ तो तुम उस तक जरूर पहुचोगे.
मैं ख़ामोशी से एक तरफ चल पड़ा. सैकड़ों सालो के सफ़र के बाद मैं उस रास्ते पर था जो उस कैदखाने की ओर जाता था जहाँ मोहब्बत का फ़रिश्ता क़ैद है. लेकिन इस सफ़र का मैं वाहिद मुसाफिर न था, अनगिनत लोग थे जिन्हें मोहब्बत के फ़रिश्ते की तलाश थी. ........ और अब हम सब एक ही सफ़र के मुसाफिर हैं.

.................डॉ. सलमान अरशद

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