तुमने ये तो देखा कि मेरे जिस्म में वक्त ने एक तवील सफ़र तय कर लिया है, लेकिन तुम्हे ये दिखाई नहीं पड़ा कि मैंने मेरे जिस्म का साथ कब का छोड़ दिया है और अभी तक वहीँ ठहरा हूँ जहाँ हमारी पहली मुलाक़ात हुई थी, आज भी मैं उन्हीं चुम्बनों में मौजूद हूँ जिनकी हरारत मेरे लबों पर अब भी बरकरार है। मेरी उंगलियों के पोरों पर तुम्हारे जिस्म की सिहरन अब भी मौजूद है। हाँ वक्त ने मेरे जिस्म में एक तवील सफ़र तय किया है मगर मैं मेरे जिस्म का साथ कहाँ दे पाता हूँ !
तुम आओगी तो नहीं पर अगर आ सको तो वक्त को भी खींच कर वहीँ ले आएंगे जहाँ हम मिले थे, के जहाँ पहली बार हमने एक दुसरे को चूमा था, के जहाँ पहली बार मेरे जिस्म ने तुम्हारे जिस्म को महसूस किया था, के जब पहली बार हमने एक दुसरे के जिस्म पर जिस्म से अशआर लिखे थे। हाँ ये मुमकिन है अगर तुम वापस आ सको !
Sunday, 22 January 2017
गर तुम वापस आओ
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