उम्मीदें जिंदा हैं अभी
उसे नहीं पता कि उसके माँ बाप कौन हैं, कहाँ रहते हैं या क्या करते हैं. वो कब और कहाँ
पैदा हुआ इस बारे में भी उसे कोई इल्म नही है. उसने जब होश
संभाला तो वो एक स्वयं सेवी संस्था की देख रेख में था. बातचीत के लिए हम
इस संस्था को चाइल्ड केयर नाम दे देते हैं. वहीँ उसे मालूम हुआ कि उसे स्टेशन से उस संस्था
ने हासिल किया था, जिस वक्त स्टेशन पर वो मिला था उस वक्त उसकी उम्र यही कोई तीन साल रही होगी.
उसका नाम शिवदास है. ये नाम उसे चाइल्ड केयर ने दिया था. वो हिन्दू है कि मुसलमान या कुछ और उसे नही
मालूम, वो किस जाति या किस वर्ण का है ये भी उसे नही मालूम. चाइल्ड केयर ने
उसे पिछड़ा वर्ग में डालने के लिए यादव टाइटल भी दिया लेकिन जब शिवदास थोडा बड़ा हुआ
तो उसने अपने नाम के साथ यादव का पुछल्ला हटा दिया. उसका कहना था कि
जब ये मालूम ही नहीं है कि वो किस जाति या किस धर्म का है तो वो किसी भी जाति या
धर्म को अपने नाम के साथ क्यूँ जोड़े. हाँ वो सभी धर्मो और जातियो की इज्ज़त जरूर करता है.
चाइल्ड केयर में स्टेशन को वो बच्चे भी लाये जाते थे जो नशे के शिकार थे. इनके सोहबत ने
शिवदास को भी नशे का शौक़ीन बना दिया. शिवदास को प्यार से अच्छे और बुरे का फ़र्क बताने वाला कोई न था. शिवदास कहता है
कि स्टेशन के इन बच्चों के साथ उसने नशा करना जरूर सीखा लेकिन एक आज़ाद ज़िन्दगी
जीने की प्यास भी इनकी सोहबत से ही सीखा. आज़ादी के जज़्बे ने विवश किया और शिवदास स्टेशन
पर रहने वाले बच्चों के पास भाग आया. ये 2002 का नया साल था, जब वो स्टेशन आया. लेकिन आज़ादी इतनी आसानी से कहाँ मिलती है. शिवदास को अभी
स्टेशन आये हुए दो ही दिन हुए थे कि उसे पुलिस ने पकड़ लिया और बाल सुधर गृह भेज
दिया. चाइल्ड केयर से आज़ादी और नशे की चाहत में भागा शिव बाल सुधर गृह में पांच साल
रह गया. 2007 में वो स्कूल भी गया. अभी स्कूल जाते
हुए एक ही महीना हुआ था कि एक दिन साथ जाने वाले पुलिस वालों की आंख बचाकर शिवदास भाग
कर स्टेशन आ गया, और ज़िन्दगी एक नया दौर शुरू हुआ. कबाड़ चुनना, उसे बेचना और
मिले हुए पैसों से नशा और खाने पीने की चीज़ों का इतंजाम करना, शरीर थक गया या
रात हो गयी तो स्टेशन पर ही किसी कोने में सो जाना रोज़ का काम था.
शिवदास स्टेशन पर रहने वाले बच्चों की टोली का हिस्सा जरूर था लेकिन वह कुछ
नया करना भी चाहता था. उसने चाय पिलाने से लेकर खाना खिलाने वाले होटलों में काम किया. लेकिन इन कामो
में उसका मन न लगा. वह हमेशा ही कुछ नया करना चाहता था और ये चाहत ही उसे किसी एक जगह रुकने न
देती थी. फिर भी चाय की दूकान पर उसने पूरे एक साल गुज़ारा. चाय की दुकान
छोड़ी तो ट्रक की मरम्मत करने वाली दूकान पर काम करने लगा और यहाँ भी करीब एक साल
रहा. यहाँ छोड़ा तो मोटर साइकिल बनाने के काम में लगा और यहाँ उसने दो साल काम किया. दो साल बाद यहाँ
से भी हट गया और कार की मरम्मत करने वाले वर्कशॉप में सात महीने काम किया. इन तमाम कामों
में उसका मन नही लगा. लेकिन इन कामो को करते हुए उसने पूरा हिंदुस्तान घूम लिया. कश्मीर और
काठमांडू दो ऐसे शहर हैं जो इसके सबसे पसंदीदा शहर हैं.
काठमांडू से उसकी कुछ अच्छी यादें जुडी हैं. जब वह काठमांडू
पहुंचा तो वहां काफी सर्दी थी. इस शहर में उसकी जान पहचान का कोई न था, फिर भी लोगों ने उसे स्वेटर और कम्बल दिया. वो कहता है कि
ऐसा शायद लोगों ने उसकी हालत देख कर किया. दरअसल अब तक जीवन के लगभग 16 बसंत देख चुके
शिवदास को जहाँ अपने साथ हुए बुरे व्यावहार याद हैं जिन्हें वह भूलने की कोशिश
करता है तो लोगों के अच्छे व्यावहार भी उसे याद हैं जिन्हें वो भूलना नही चाहता. एक बार कलकत्ता
स्टेशन पर चोरी के शक में लोगों ने उसे पकड़ लिया लेकिन एक पुलिस और एक वकील जो कि
उसी बोगी में सफ़र कर रहे थे, ने शिवदास को बचाया. बाद में वो सामान
जिसके चोरी होने की बात की जा रही थी, यात्री के पास ही मिल गया. शिवदास कहता है
कि अगर पुलिस और वाकील दोनों ने बीचबचाव न किया होता तो उसकी बहुत पिटाई होती. शिवदास की
ज़िन्दगी के बारे में जानने के बाद वकील साहब ने उसे राय दिया कि उसे यूँ ही आवारा
नही घूमना चाहिए बल्कि जो संस्थाएं ऐसे बच्चों के विकास के लिए काम करती हैं उनके
पास उसे रहना चाहिए और उनके गाइडेंस में अपने जीवन को बेहतर बनाने के लिए काम करना
चाहिए. देखने में ये बड़ी मामूली सी सलाह है, लेकिन गौर किया जाए तो ये सलाह उस इन्सान
ने दी थी जिसने बच्चे की मदद की थी और जिसके लिए इस बच्चे के मन में आज भी सम्मान
है. मुझे लगता है कि आज अगर ये बच्चा अपनी ज़िन्दगी को बेहतर बनाने की कोशिश कर रहा
है तो इसमें उस मामूली सी दिखने वाली राय का बहुत महत्व है. इससे एक और बात का पता
चलता है कि बेघरबार बच्चों के बुरा बनने में उनके साथ खुद को भला मानने वालों के
गंदे व्यावहार की बड़ी भूमिका है.
शिवदास एक बार पटरी पर जुआ खेल रहा था तभी किसी का पर्स चोरी हो गया और पुलिस
ने उसके पूरे समूह को पकड़ लिया और खूब पीटा. एक बड़ा अधिकारी आया उसने सब लडकों से अलग अलग
बात की, पर उसने भी शिवदास को पीटा और गलियां, दीं. वहां से निकला तो वो पुलिस वाला मिला जिसने उसे
पकड़ा था, उसने हमदर्दी से बात की तो शिवदास को वो बहुत अच्छा लगा. शिवदास कहता है
कि जब इस तरह के हालात का सामना करना पड़ता था, सर्दी या गर्मी
से जूझना पड़ता था या इन हालात में किसी को देखते थे तो इश्वर पर गुस्सा आता था और
उसे ही कोसता और गालियाँ देता था.
बेघरबार लोगों का न सिर्फ हमारे मुल्क बल्कि पूरी दुनिया में अपना एक अलग
संसार है. खुद को सभ्य दुनिया का बाशिंदा मानने वाले लोग कभी कभी पुन्य कमाने के लिए इस
दुनिया की यात्रा करते हैं. बड़ा सरल है पुन्य कमाना. बस इन बेघरबार लोगों के बीच जाइये और उन्हें कभी रोटी खिला दीजिये, कभी अपने पुराने
वस्त्र दे दीजिये या कुछ पैसे बाँट दीजिये. बस इतना करते ही आप लुटेरी दुनिया में अपनी
साझेदारी की वजह से आपकी आत्मा पर पड़े बोझ से मुक्त हो जाते है. सभ्य दुनिया का
बाशिंदा बेघरबार जिंदगी गुजरने वालों की दुनिया को नैसर्गिक मानता है. एक तो इसके
माध्यम से कर्म के सिद्धांत को उचित ठहरा पाता है दुसरे खुद के अच्छे कर्मों के
लिए ऐसी दुनिया को उपयोगी मानता है. ज़ाहिर सी बात है सभ्य दुनिया का वासी बेघरबार ज़िन्दगी गुजरने वालों की बेहतरी
के लिए कुछ भी करना जरूरी नहीं समझता. शिवदास ने भले ही किसी कान्वेंट स्कूल का मुंह
नही देखा, लेकिन उसकी आँखे धार्मिकों को बहुत गहरे तक देख लेती हैं. बावजूद इसके उसके
भीतर एक बच्चा अब भी रहता है जिसे सरलता और सहजता आकर्षित करती है.
मंदिर के सामने बिखारियों की भीड़ एक खास वक्त इकठ्ठा हो जाती है. दान-दाता आते हैं, जो कभी भोजन तो
कभी पैसा बांटते हैं. लेकिन शिवदास उनके दान देने के तरीके पर सवाल उठाता है. उसका मानना है कि
दान देने वाले दान लेने वालों से घृणा करते हैं और बेहद अपमानित अंदाज़ में उन्हें
खाना या पैसा देते हैं. साथ ही वो दान लेने वालों को भी बुरा भला कहता है. उसका आसान सा
तर्क है कि किसी दान दाता से दस रूपये लेने में जो चोट और अपमान सहना पड़ता है उससे
कहीं ज्यादा आसानी से दस रूपये कमाए जा सकते हैं. शिवदास एक अख़बार
के लोगों का भी ज़िक्र करता है जो सर्द रातों में ख़ामोशी से आते हैं और स्टेशन पर
सो रहे सभी लोगों पर चुपचाप कम्बल डाल कर चले जाते हैं. वह उनके कम्बल से
गरीबों के शारीर को ढकने के अंदाज़ को बड़े भाव के साथ बयान करता है. और अंत में वो
फैसला सुनाता है कि दान पुन्य करने से कोई बड़ा आदमी नही बन जाता. तो बड़ा आदमी कैसे
बना जा सकता है, मेरे इस सवाल का वह बिना रुके जवाब देता है. वो कहता है कि- अगर अनाथों की
इतनी चिंता है तो उन्हें ज़मीन का एक टुकड़ा क्यों नही दिया जाता जिसमे सैकड़ों
बेघरबार लोगों को बसाया जा सकता है?
अपने अनुभव संसार में देखते हुए वो कहता है कि “मैंने कई बार
देखा है कि किसी मंत्री के कारण रास्ता रोक दिया गया और भीड़ में फंस कर किसी बीमार
की जान चली गयी. ऐसा देखता हूँ तो दिल में आग लग जाती है. उसने कार बनाने
के दौरान देखा है कि जो अमीर लोग उसके पास अपनी गाड़ियाँ ठीक करवाने आते थे, वे लोग उसे बहुत
गिरी हुई निगाह से देखते थे. जहाँ वो मध्यवर्गीय लोगों के लिए घृणा से भरा हुआ है वहीँ ट्रक ड्राईवरों के
लिए उसके मन में बहुत सम्मान है. उसका कहना है कि ये ड्राईवर मेहनती होते हैं और इन्सान को इन्सान समझते हैं. आज भी वो कभी कभी
इन ड्राईवरों से मिलने जाता है. शिवदास कहता है कि “जब इन ड्राईवरों
को पता चलता है कि मैं पढाई करता हूँ तो वे बहुत खुश होते है.”
2012 में शिवदास उस संस्था के संपर्क में आया जहाँ
आज वो हाई स्कूल का छात्र है. वो कहता है जब वो इस संस्था के हॉस्टल में आया तो उसे लगा कि ये उसका घर है. उसने इस घर की
साफ़-सफाई की और इसे सजाया, शुरू में स्टाफ की भी कमी थी तो शिवदास खाना बनाने में भी मदद करता था. हॉस्टल की पूरी
जिम्मेदारी शिवदास और उसके दुसरे साथी सँभालते थे. वो कहता है कि
वो अतीत पर ज्यादा नही सोचता, जो साथ देता है, सहारा देता है वही परिवार है.
शिवदास मार्शल आर्ट सीखना चाहता है ताकि गलत का पुरजोर विरोध कर सके. यही नहीं जो गलत
है उसके सुधार लिए मिलकर लड़ने कि जरूरत को भी वो समझता है. वो ये भी जनता है
कि गलत के खिलाफ लड़ने के लिए एक जुटता जरूरी है. वो जनसमर्थन और
राजनीतिक विरोध की ताकत को भी जनता है.
मोटर साईकिल की दुकान पर काम के दौरान मालिक ने उसके ऊपर चोरी का इल्जाम लगाया
था जिसकी वजह से उसने वहां से काम छोड़ दिया था यही नही उस मालिक के पास छः महीने
की अपनी मजदूरी भी छोड़कर आ गया था. फिर वो दूसरी जगह काम करने लगा, बाद में चोर पकडाया और चोरी के कुछ पैसे भी मिल गये. पुराने मालिक ने शिवदास
को काम पर वापस बुलाया लेकिन वो नही गया. यही नहीं मालिक के कहने के बाद भी वो
अपने पैसे तक लेने नहीं गया. उसने अपने उस मालिक से ये जरूर कहा कि वो उसकी मज़दूरी
के पैसे उस संस्था को दान कर दे जिसने उसे मोटर साइकिल बनाना सिखाया है.
शिवदास के लिखना- पढना सीखने का अंदाज़ भी निराला था. स्टेशन पर रहने के दौरान
ट्रेन को देख देख कर बोगी पर लिखे नाम और नंबर पढना सीखा इस अभ्यास से इतना तो हुआ
था कि उसे अटक अटक कर किताबें या अख़बार पढ़ना आ गया. उसे बड़ा आदमी बनना है लेकिन
अपने लिए नही बल्कि दबे कुचले लोगों के लिए. उसे साइंटिस्ट भी बनना है जिससे वो ऐसी
तकनीक का निर्माण कर सके जिससे गरीब आदमी की ज़िन्दगी आसान हो सके. वो गरीब आदमी की
ज़िन्दगी आसान बनाना जनता है, आज भी वो कई घरेलु दवाइयां बनाना जनता है. शिवदास ने भूख और
गरीबी की निर्मम दुनिया को देखा और भोगा है. भूख और गरीबी और भूख और गरीबी की
दुनिया में जीने वाले लोगों के प्रति खातेपीते घरों के लोगों का व्यावहार भी उसने
देखा है. उसकी बातो में ये दर्द रह रह कर छलक उठता है. जीवन को देखने और जीने के
नज़रिए में उसके अनुभव ही मुख्य आधार हैं.
खैर, शिवदास एक स्वयं सेवी संस्था की मदद से न सिर्फ पढाई कर रहा हैं बल्कि अब
हाई स्कूल का एग्जाम देने जा रहा हैं. नशा करने की आदत काफी पहले छूट चुकी है. इस
हॉस्टल में आकार शिवदास को घर और परिवार दोनों मिला है और वो लोग मिले हैं जो
शिवदास के बारे में इससे भी ज्यादा सोचते हैं. आज शिवदास को लगता है कि वो ज़िन्दगी
के सही राह पर है. यहीं आकर उसने जीने का सलीका सीखा. शिवदास हँसते हुए कहता है कि
स्टेशन पर नहाना तो कभी कभार बड़ी मुश्किल से होता था. लेकिन आज वो रोज़ नहाता है और
साफ़ सुथरे कपडे पहनता है. जब वो कहता है कि “आज लगता है कि हम भी इन्सान हैं” तो
उसकी मंद मुस्कराहट ज़रा तेज़ हो जाती है.