जीने की राह
अनीस अब यूनिवर्सिटी का छात्र था और उसके इर्द गिर्द बहुत सारी खूबसूरत लड़कियां थी, इनमे कई लड़कियां ऐसी थी जिनको देख कर अनीस के दिल में गुदगुदी होती थी, लेकिन जब भी ऐसा होता उसे अनम का ख्याल अ जाता और वो ख़ामोशी से वहां से हट जाता. देखते देखते अनीस ग्रेजुएट वो गया और अब अनीस और अनम के शादी के चर्चे सुगबुगाहटो में ही सही पर खानदान में चर्चा-ए-आम थी. पर अनम के माँ बाप को तो जैसे कुछ सुनाई ही नही देता था. अनीस के वालिदैन चाहते थे की बात की शुरुआत अनम के वालिदैन की ओर से हो.
अनीस की हालत अजीब थी, वो अपने दिल की बेकरारी को अपने ही दिल में जज़्ब कर रहा था क्योंगी उसे पता था कि इस रिश्ते के बीच में अमीरी गरीबी की दिवार है जिसे तोड़े बिना वो अनम तक न पहुंचेगा और अनम की जुबान पर तहजीब के ताले थे. कई साल गुज़र गये पर अनीस अपने लिए एक ढंग की नौकरी नही ढूंढ पाया और इधर अनम के घर में तब्दीलियो का तेज़ दौर शुरू हो गया, अनम के वालिद की सरकारी नौकरी उनकी सारी ताक़त थी जो अब नही थी, ऊपर से पांच बेटिओं की शादी की जिम्मेदारी. हालात तेज़ी से ख़राब होने लगे और इस हडबडाहट में लड़किओं की शादियाँ जैसे तैसे निपटाई जाने लगी. चौथे न. की अनम का भी न. आ ही गया.
अनीस ने एक आखिरी कोशिश करने का फैसला किया, अनम के घर पहुंचा उसके वालिद से बात की पर उन्होंने साफ इंकार कर दिया, एक आखिरी उम्मीद खुद अनम थी, अनीस ने उसके साथ बैठने एक मौका भी निकाल लिया और दोनों करीब घंटे भर एक साथ बैठे रहे. पर अनीस के लबों पर लगा एक अनजान सा ताला न खुला और अनम के लबों पर लगे तहजीब के ताले भी कमज़ोर नहीं पड़े. एक घंटे की हाँ हूँ के बाद दोनों दो अलग रास्तो पर चल दिए.
इस बात को सालों गुजर गये. अब अनम तीन बच्चों की माँ हैं, उसका शौहर एक गरीब मजदूर है पर आज भी तहजीब की दरो दिवार में कैद अनम खुश दिखती है, सच भी यही है या कुछ और ये कोई नही जनता. ....और अनीस अकेला है, उसके वालिदैन उसके लिए लड़की देखते हैं और वो हर लड़की में अनम. अब कुदरत इंसानों की कॉपी तो बनाती नही, पर ये बात अनीस मियां को समझाए कौन.
अनीस मियां ठीक ठाक कमा लेते हैं और मामूली पैसों में अपना गुज़र करते हुए बाकी पैसों से जरूरतमंद बच्चों की पढाई में मदद करते हैं, वो उनकी काउंसलिंग भी करते हैं जिससे वो सही वक्त पर अपने पैरों पर खड़े हो सकें. हो सकता है इससे कुछ अनीसों को उनकी अनाम मिल जाये
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