एक मूर्तिकार को एक खूबसूरत पत्थर की चट्टान मिली, उसकी पारखी नज़र ने पत्थर को संभावना भरी नज़रो से नापा तौला और उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी मूर्तिकार ने पत्थर के इस टुकड़े में कुछ देख लिया था जिसे वो दुनिया के सामने लाना चाहता था. उसको बस एक ही काम आता था ..उबड़ खाबड़ पत्थरों से मूर्तियां अनावृत्त करना। वो अपने औजार लेकर काम में जुट गया। दिन पर दिन गुजरते रहे और वह अपने औजारों के साथ पत्थर काटता रहा , पत्थर धीरे धीरे एक खूबसूरत स्त्री की मूर्ति में तब्दील होने लगा। कई साल लगे जब पत्थर का ये टुकड़ा एक खूबसूरत मूर्ति में तब्दील हुआ। मूर्तिकार हर पल बस अपनी इस कृति को निहारा करता.. ! मूर्ति ही खूबसूरत कि जो उसे देखता, देखता ही रह जाता। मूर्ति की कीर्ति देवताओं तक पहुंच गयी । देवतागण भी मूर्ति देख कर प्रसन्न हुए और मूर्तिकार की प्रशंसा करते हुए उससे वर मांगने को कहा...! मूर्तिकार अपने ही कृति के प्रेम पड़ गया था, उसने देवताओं से कहा कि वे मूर्ति में जान डाल दें ! देवताओं ने कहा कि कल सूर्योदय के साथ इसमें जान आ जायेगी, मूर्तिकार पूरी रात इस खुशी में सो न सका , सूर्योदय के पहले ही इस चमत्कार को देखने के लिए लोंगो की भीड़ इकट्ठी हो गयी। सूर्य की पहली किरण के साथ ही मूर्ति में हरक़त शुरू हुई और चंद पलों में ही मूर्ति की जगह एक सुन्दर स्त्री खड़ी थी। मूर्तिकार ने स्त्री को गोद में उठा लिया और ख़ुशी से नाचने लगा । नई नई जन्मी स्त्री ने चारों ओर कौतूहल से देखा फिर मूर्तिकार पर उसकी नज़रे ठहर गयी... जिसके चेहरे पर खिचड़ी दाढ़ी थी, सिर पर चाँद दिखाई देने लगा था और चेहरे पर कुछ लकीरें उग आयीं थी। स्त्री मूर्तिकार की गोद से उतर गई और रंग बिरंगी दुनिया को कौतूहल से देखा और एक ओर चल पड़ी । मूर्तिकार ने कई बार उसे अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश की पर सब बेकार ... वो चली गयी । मूर्तिकार को शायद पता ही नही था की जिंदा मूरत अपनी नज़र से दुनिया को देखती है. आखिर इस रंग बिरंगी दुनिया में एक मूर्तिकार ही तो नही हैं न !
... अब मूर्तिकार एक बेजान पत्थर की मूरत है जिसकी ओर कोई नहीं देखता ।
एक मूर्तिकार को एक खूबसूरत पत्थर की चट्टान मिली, उसकी पारखी नज़र ने पत्थर को संभावना भरी नज़रो से नापा तौला और उसके चेहरे पर मुस्कान तैरने लगी मूर्तिकार ने पत्थर के इस टुकड़े में कुछ देख लिया था जिसे वो दुनिया के सामने लाना चाहता था. उसको बस एक ही काम आता था ..उबड़ खाबड़ पत्थरों से मूर्तियां अनावृत्त करना। वो अपने औजार लेकर काम में जुट गया। दिन पर दिन गुजरते रहे और वह अपने औजारों के साथ पत्थर काटता रहा , पत्थर धीरे धीरे एक खूबसूरत स्त्री की मूर्ति में तब्दील होने लगा। कई साल लगे जब पत्थर का ये टुकड़ा एक खूबसूरत मूर्ति में तब्दील हुआ। मूर्तिकार हर पल बस अपनी इस कृति को निहारा करता.. ! मूर्ति ही खूबसूरत कि जो उसे देखता, देखता ही रह जाता। मूर्ति की कीर्ति देवताओं तक पहुंच गयी । देवतागण भी मूर्ति देख कर प्रसन्न हुए और मूर्तिकार की प्रशंसा करते हुए उससे वर मांगने को कहा...! मूर्तिकार अपने ही कृति के प्रेम पड़ गया था, उसने देवताओं से कहा कि वे मूर्ति में जान डाल दें ! देवताओं ने कहा कि कल सूर्योदय के साथ इसमें जान आ जायेगी, मूर्तिकार पूरी रात इस खुशी में सो न सका , सूर्योदय के पहले ही इस चमत्कार को देखने के लिए लोंगो की भीड़ इकट्ठी हो गयी। सूर्य की पहली किरण के साथ ही मूर्ति में हरक़त शुरू हुई और चंद पलों में ही मूर्ति की जगह एक सुन्दर स्त्री खड़ी थी। मूर्तिकार ने स्त्री को गोद में उठा लिया और ख़ुशी से नाचने लगा । नई नई जन्मी स्त्री ने चारों ओर कौतूहल से देखा फिर मूर्तिकार पर उसकी नज़रे ठहर गयी... जिसके चेहरे पर खिचड़ी दाढ़ी थी, सिर पर चाँद दिखाई देने लगा था और चेहरे पर कुछ लकीरें उग आयीं थी। स्त्री मूर्तिकार की गोद से उतर गई और रंग बिरंगी दुनिया को कौतूहल से देखा और एक ओर चल पड़ी । मूर्तिकार ने कई बार उसे अपनी ओर आकृष्ट करने की कोशिश की पर सब बेकार ... वो चली गयी । मूर्तिकार को शायद पता ही नही था की जिंदा मूरत अपनी नज़र से दुनिया को देखती है. आखिर इस रंग बिरंगी दुनिया में एक मूर्तिकार ही तो नही हैं न !
... अब मूर्तिकार एक बेजान पत्थर की मूरत है जिसकी ओर कोई नहीं देखता ।
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