Monday, 6 February 2017

मेरी खुशबुएँ

मैं बस फूल हूँ, मेरा वजूद बस सूरज के उगने से दिन चढ़ने तक है। लेकिन इतनी देर में मैं फ़ज़ा में बिखेर देता हूँ अपनी खुशबुएँ। दरअसल ये सिर्फ खुशबुएं नहीं है, ये मेरी मोहब्बत है। तुम्हारे दूर बहुत दूर चले जाने के बाद मैंने महसूस किया कि तुम्हारी महक मेरी सांसो में मौजूद है, मैंने अपनी उंगलियों को हवा के नर्म मुलायम जिस्म पर तैरा कर देखा तो मुझे तुम्हारे जिस्म की हरारत महसूस हुई। बस, उस रोज़ से मैंने अपनी खुशबुएँ हवा के हवाले ये सोच कर कर दिया कि अगर इसके पास तुम्हारा जिस्म और उसकी खुश्बू है तो मुझे भी इस हवा के साथ मिल जाना चाहिए। मेरी जड़ें हालात की मिट्टी में कहीं गहरे गड़ी हुई हैं लेकिन खुशबुओं पर वक्त और हालात का कोई पहरा नही। तो बस तब से मेरी मोहब्बत खुशबुओं की शक्ल में हवा के परों पर सवार तुम तक पहुँच रही है। है न वस्ल का ये भी एक नायाब तरीका.!!

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