फूल कमल के
-डॉ सलमान अरशद
हम जिस दुनिया में
रहते हैं वो ऊपर ऊपर सिर्फ एक दुनिया नज़र आती है. पर क्या यही सच है? आइये थोडा
सोचते हैं कि हम हमारी दुनिया से कितना वाकिफ़ हैं. यहाँ यह कहना जरूरी है, कि मैं
जिस और जितनी दुनिया की बात करूंगा वही सच हो ये जरूरी नही है. बस मैं कोशिश कर
रहा हूँ कि जो कुछ मुझे दिखाई दे रहा है उस तरफ इशारा कर दूँ तो हो सकता है आप भी
उसे देख सकें. अगर हम सब उस तरफ़ देख सकें तो उसको बेहतर करने की दिशा में भी मिल
कर सोचा जा सकता है.
हमारी दुनिया में बड़े
बड़े उद्योगपति रहते हैं जिनके बारे हर साल हम अख़बारों में पढ़ते हैं कि उनकी दौलत
और कितनी बढ़ गयी. इसी दुनिया में किसान रहते हैं जो अनाज पैदा करते हैं, अनाज के
बिना हम एक रोज़ भी नही जी सकते, अनाज न हो तो शेयर मार्किट, बैंक, कलकारखाने और
विलासिता की तमाम चीज़ें बेमानी हो जएगी, फिर भी किसान रोज़ रोज़ मर रहे हैं.
कारखानों में आपनी हड्डियाँ पिघला कर विभिन्न वस्तुओं को आकार देने वाले मजदूर भी इसी
दुनिया में रहते हैं. इसी दुनिया में स्टेशनों और शहर की तमाम सड़कों पर बिना किसी
खास सुविधा के लोग रहते हैं, जो शायद जनगणना के रजिस्टर में दर्ज भी नही होंगे. हमारी
ही दुनिया में ऐसे बच्चे भी रहते हैं जिनके माँ बाप का या तो पता ही नही है या फिर
अब वो इस दुनिया में नही रहते.
ये सभी लोग जिनका
ज़िक्र ऊपर किया गया है, एक ही दुनिया में रहते जरूर हैं लेकिन सबकी अपनी अलग अलग
दुनिया है. कमाल तो ये है इनका आपस में मेल जोल न के बराबर है, वो भी तब जब कि एक
दुसरे की रोटी के लिए ये एक दुसरे पर निर्भर है. आज हम आपसे बात करेंगे ज्योतिमाला
की और उसकी उस दुनिया की जो हमारी ही दुनिया का हिस्सा है.
ज्योतिमाला कहाँ
पैदा हुई, उसके माँ बाप कौन थे, जब वो पैदा हुई थी तब किसी ने सोहर गया था कि नही,
उसके पडोसी कौन थे, वो पैदा ही क्यों हुई? इन तमाम सवालों का जवाब किसी के पास नही
है, यहाँ तक कि खुद ज्योतिमाला के पास भी नही. सच तो ये है कि ज्योतिमाला नाम भी
उसे एक भिखारिन ने दिया है. बस इतना पता है कि एक रोज़ कोई मंदिर में दो बच्चिओं को
छोड़ गया था. जिनमे से एक ज्योतिमाला भी है. एक बच्ची जो इससे थोड़ी बड़ी थी उसे कोई
और ले गया. कहाँ ले गया और क्यूँ ले गया इसका कोई जवाब मौजूद नहीं है. मालूम है तो
बस इतना कि ज्योतिमाला को एक भिखारिन ने पाला. भिखारिन सुबह शाम दातून बेचती थी और
बाकी वक्त भीख मांगती थी. जिस दिन ज्योतिमाला भिखारिन को मिली उस दिन दिवाली थी,
चूँकि चारो ओर उजाला था इसलिए भिखारिन ने बच्ची को उसी उजाले से प्रेरित होकर एक
नाम दिया. हो सकता है इससे सचमुच भिखारिन की ज़िन्दगी में उजाले का एहसास हुआ हो,
हो सकता है भिखारिन को लगा हो कि ये बच्ची दुनिया में रौशनी बिखेरेगी या शायद उसने
ये ख्वाब देख लिया हो के ये बच्ची दुनिया को रोशन करे. जो भी हो हर बच्चे की तरह
इस बच्चे को एक नाम मिला.
मैं सोचता हूँ क्या
पहले भी उसका कोई नाम रहा होगा ! क्या पहले भी उसे प्यार से पुकारा गया होगा ! अगर
हाँ तो फिर किस नाम से ! क्या हर बच्चे का ये हक़ नही है कि उसका एक नाम हो, उसको
प्यार से पुकारा जाए, उसको प्यार से जीने का हक़ मिले, उसे इस खूबसूरत दुनिया में
कुछ और खूबसूरती जोड़ने का अवसर मिले ! पर क्या ये सब हर बच्चे को मिल पाता है, अगर
नही तो फिर ऐसा क्यों है, क्या ये दुनिया इतनी कंजूस है कि इसके पास एक मासूम
बच्चे को देने के लिए थोडा सा प्यार भी नहीं है ! हाँ ये दुनिया कंजूस तो है. किसी
के पास इतना ज़्यादा है कि वो संभाल नही पा रहा है और किसी के पास इतना भी नही कि
वो ज़िन्दा रह सके. लेकिन इस दुनिया की बदसूरती के बीच आज भी खूबसूरत लोग रहते हैं.
जैसे कि ये भिखारिन. इस भिखारिन का नाम भी है, पर नाम से होगा भी क्या. फिर भी
आपकी सुविधा के लिए हम उसे एक नाम देते हैं, सोना देवी. तो सोना देवी ने इस बच्ची
को अपनी उंगली पकड़ा दी और उसे अपनी बदसूरत दुनिया का हिस्सा बना लिया, पर शयद इस
बच्ची ने उसकी बदसूरत दुनिया को थोडा तो सुन्दर बना ही दिया था. यही वजह थी उसने
मरते दम तक उसे अपनी ऊँगली पकडाए रखा और जब इस दुनिया से जाने लगी तो इस मासूम
बच्ची को अपने भाई की ऊँगली पकड़ाकर गयी. भिखारन बुढिया एक सरकारी भवन के सामने
खाली पड़े ज़मीन के टुकड़े पर एक झोपडी में रहती थी. वैसे तो उसने इस बेकार पड़े ज़मीन
दे टुकडो को एक अर्थ दिया था, उस टुकड़े को उपयोगी बनाया था, उस बेकार पड़े जमीन के
टुकड़े को आबाद किया था. लेकिन हमारी दुनिया की सभ्य भाषा में इसे अतिक्रमण कहा
जाता है.
अजीब बात है, जब एक
अमीर और अधिक दौलत कमाने के लिए गरीब की दुनिया पर क़ब्ज़ा करता है तो इसे तरक्की
कहते हैं, विकास कहते हैं लेकिन जब एक गरीब बस रोटी, कपडा और मकान के लिए बेकार
पड़ी ज़मीनों को आबाद कर देता है तो इसे अतिक्रमण कहते हैं. खैर सोना की झोपडी में
एक दिन आग लग गयी. इसमें कुछ भी नया नही था, प्रकृति हो या इस दुनिया का “पुरुष”
सभी की मार हमेशा गरीब पर ही पड़ती है. सोना जो एक मासूम बच्ची की ज़िन्दगी में
उजाले की उम्मीद पाले इस छोटी सी झोपडी में एक पूरी दुनिया आबाद किये हुए रहती
थीं, वो दुनिया जल चुकी थी. सोना के पास कोई और ठिकाना नही था तो वो स्टेशन पर आ
गईं. स्टेशन वैसे तो सभ्य दुनिया के बासिंदों के लिए बस एक पड़ाव भर है जहाँ उन्हें
न चाहते हुए भी कभी- कभार कुछ पल मजबूरी में गुजरना पड़टा है, लेकिन सोना और ज्योतिमाला
जैसों के लिए ये उनकी दुनिया है. एक दुनिया जहाँ से वो कभी कचरा चुन कर, कभी भीख
मांगकर, कभी जूठन चुनकर, छोटे-मोटे सामान बेचकर तो कभी चोरियां करके अपना पेट भरते
हैं. पेट जिससे वो हमेशा हारते आये हैं और जो उन्हें वह सब करने को मजबूर करता है
जिसके लिए वो सभ्य दुनिया की उपेक्षा और नफरत सहते हैं.
ज्योतिमाला अभी
स्टेशन पर ही थी जब एक दिन सोना इस खूबसूरत या बदसूरत दुनिया को अलविदा कह गयी.
बच्ची अकेली थी लेकिन तभी उसे एक पापा मिल गये. ये थे सोना के भाई बलवीर जो उसी की
तरह छोटी-छोटी चीज़ें स्टेशन पर बेचकर अपना गुज़ारा करते थे. सोना ने मरने से पहले ज्योतिमाला
की जिम्मेदारी अपने भाई को दे दी थी. ज्योतिमाला को उम्र की गणित तो ठीक से नहीं
आती, लेकिन वो कहती है कि उस वक्त वो यही कोई पांच साल की रही होगी. मम्मी यानि कि
सोना मर चुकी थी. बलवीर ज्योतिमाला को अपने साथ सीतामढ़ी ले गये. जहाँ वो करीब एक
साल रही. यहाँ वो खेतों में जाती थी और बकरियां भी चराती थी. लेकिन उसे ये नही
मालूम कि पापा के पास अपना खेत था कि नही, जिस घर में वो रही थी वो भी उन्ही का था
या किसी और का.
पापा के बेटा और बहु
भी थे. हाँ, ऐसे लोग भी हमारी इस दुनिया में बेघरबार ज़िन्दगी गुज़ारने को विवश हैं
जिन्होंने ने अपने जीवन भर की पूँजी अपने बेटों को दे दी है. .....खैर वो ज्योतिमाला
को घरेलु कामों के लिए अपने साथ ले गये. छ: साल की बच्ची घर के कितने और कैसे काम
कर पायेगी, इसका अनुमान लगाना कोई मुश्किल काम नही है. ज्योतिमाला कहती है कि उसे
यहाँ खाना तो पूरा नही मिलता था पर पिटाई भरपूर होती थी. आज भी उसके जिस्म पर उस
मारपीट के निशानांत मौजूद हैं. ज्योतिमाला यहाँ से भाग कर एक बार फिर स्टेशन पर आ
गयी और पापा के साथ रहने लगी.
स्टेशन पर उसे अपने
जैसी और लड़कियां मिल गईं, ये लड़कियां कचरे के डिब्बे से एसी चीज़ें चुनती थी जिनसे
अभी भी कुछ बन सकता है. इन्हें कबाड़ी वाले के पास बेच दिया जाता था. कबाड़ी वाला इनका
बैंकर भी था. पैसे उसी के पास जमा रहते थे और ज़रूरत पर लड़कियां उससे पैसे लेती
थीं. उसका हिसाब सही था या गलत इस बारे में ज्योतिमाला को कुछ नही मालूम. खाने पर
अक्सर पैसा खर्च नही किया जाता था. ये ज़रूरत मंदिर के प्रसाद या फिर यूँ ही मिले
खाने की चीज़ों से पूरी हो जाती थी. इस पैसे को कपडे और सजने-संवरने वाले सामानों
को लिए खर्च किया जाता था. ज्योतिमाला झिझकते हुए ये भी बताती है कि इस पैसे का
बड़ा हिस्सा नशा करने में जाता था. नशे के लिए इनकी दुनिया में शराब या अमीरों की
दुनिया की चीज़ें नहीं हैं. यहाँ नशे के लिए व्हाइटनर या फिर सेलुशन (जिससे पंचर
जोड़ा जाता है) का इस्तेमाल किया जाता है.
आप स्टेशन पर थोडा वक्त गुजारें और आवारा घुमते
हुए बच्चों को गौर से देखें तो आप देखेंगे कि कुछ बच्चे कपडे की एक पोटली बार बार
मुंह में लगाते हैं. अगर आप ध्यान से न देखे और पहले से इसके बारे में मालूम न हो
तो आप जान भी नही पाएंगे. लेकिन इसके नशे की लत वाले ये बच्चे बहुत जल्दी ही अपनी
ज़िन्दगी से हाथ धो बैठते हैं. पापा चाहते थे कि ज्योतिमाला इस दुनिया का हिस्सा न
बने. शायद यही वजह थी कि अपने बेटे और बहु की मांग पर उन्होंने तीन बार ज्योतिमाला
को उनके पास भेजा और हर बार ज्योतिमाला वहां से भाग आयी. आखिर में पापा ने ज्योतिमाला
को अपनी बहन के पास रखा जहाँ वो लगभग दो साल तक रही लेकिन उसको ये दुनिया भी रास
नहीं आयी और एक दिन फिर वो भाग कर स्टेशन आ गयी. अब तक वो जीवन कि प्रथम दहाई पार कर
चुकी थी.
एक रोज़ जब वो स्टेशन
पर मंदिर परिसर में बैठी थी तभी कुछ लोग उसे उठा ले गये. उसे एक बाज़ार में बेच
दिया गया. बाज़ार का नाम नहीं लिखा जा रहा है. लेकिन आप सभी इस बाज़ार को जानते हैं.
पापा जो इस बदसूरत दुनिया के हर गली मोहल्ले से वाकिफ थे, उन्हें अपनी बेटी को
ढूँढने में कोई समस्या नही हुई. वो वहां पहुँच गये, स्थानीय लोगों का समर्थन हासिल
किया और सौभाग्य से पुलिस ने भी इनकी मदद की और बच्ची को छुड़ा लिया गया.
ज्योतिमाला ऐसी
बच्चिओं के बारे में बताती है जिन्हें अलग अलग मौकों पर एक खास औरत ने किसी को
बेचा है. ये लड़कियां आज अगर होंगी तो कहाँ होंगी और हमारी सभ्य दुनिया के लोग उनके
साथ क्या कर रहे होंगे, इसका बस अनुमान लगाया जा सकता है.
पापा को एक स्वम्
सेवी संस्था, रेनबो होम फाउंडेशन इंडिया के बारे में पता चला जहाँ बेघर-बार और
गरीब लड़किओं को आवास, भोजन और शिक्षा उपलब्ध कराया जाता है. आज ज्योतिमाला उसी
संस्था में कक्षा 8 की छात्रा है. उम्र के अनुसार तो उसे अब तक 12 वीं में होना
चाहिए था लेकिन ये नियम उस दुनिया में लागु नही होते हैं जिसकी अब तक वह रहवासी
थी. मैंने पूछा कि वो यहाँ से निकल कर क्या करेगी तो बताया कि वो अपने कुछ दोस्तों
के साथ मिलकर होटल खोलेगी. ये दोस्त भी वहीँ पढ़ती हैं, इस होटल की कमाई से एक घर
बनाएगी जहाँ उसके जैसी दुनिया से आने वाले लड़के लड़किओं को रखा जायेगा.
ये हम सबके सोचने की
बात है कि क्या हम ये ज़िम्म्देदारी ज्योतिमाला और उसके दोस्तों को अकेले उठाने
दें, क्या हम एक ऐसी दुनिया बना सकते हैं जिसमे इसकी जरूरत ही न हो? सोचियेगा.
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